भारत में आधार कार्ड क्या वाकई ही देशहित और जनहित में अनिवार्य है? और क्या आधार से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोका जा सकता है? देश की अवाम इन सवालों का उत्तर तलाश रही है। मोदी सरकार ने तो साफ कह दिया है कि देश के हर नागरिक के लिए “आधार कार्ड “ जरुरी है। और इतना जरुरी कि अगले साल से आधार कार्ड के बगैर बैंकों में आपके खाते बंद कर दिए जाएंगें। अगर ऐसा होता है तो भारत दुनिया का पहला ऐसा देश होगा जहां मात्र एक औपचारिकता के लिए बेंकों के खाते न तो खोले जाएंगें और न ही जारी रह पाएंगें। आधार कार्ड अनिवार्य होना चाहिए या नहीं, इस पर देश की शीर्ष अदालत का फैसला आना अभी बाकी है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ इस माह (नवंबर) के अंतिम सप्ताह इस मामले पर सुनवाई करेगी और साल खत्म होने से पहले फैसला आने की उम्मीद की जा सकती है। हर देश अपने नागरिकों का डेटा बेस तैयार करने के लिए पुख्ता व्यवस्था विकसित करता है। भारत में संप्रग सरकार के समय देश के सभी नागरिकों की विशिष्ट पहचान के लिए 12 अंकों के आधार कार्ड तैयार करने के वास्ते भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) का गठन किया गया था। तब भारतीय जनता पार्टी ने सरकार की इस पहल को “लोगों की जासूसी“ करने का कदम करार दिया था। देश के हर नागरिक का बायोमेट्रिक डेटा एकत्रित करके आधार कार्ड बनाना प्राधिकरण की प्रमुख जिम्मेदारी है। अब तक 118 करोड (118,92,73,436) से ज्यादा लोगों का डेटा एकत्रित करके आधार कार्ड बनाया जा चुका है। यूआईडीएआई की यह उपलब्धि वास्तव में काबिले तारीफ है। निसंदेह, आधार आर्ड आम आदमी के लिए काफी सुविधाजनक है। इससे पासपोर्ट बनाने, बैक खाता खोलने से लेकर डीबीटी जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ लेना काफी आसान हो गया है। प्रधानमंत्री ने वीरवार को इंटरनेशनल साइबर स्पेस सम्मेलन में आधार कार्ड से आम आदमी को मिलने वाली सुविधाएं गिनाईं और कहा कि आधार-मोबाइल ने लोगों के लिए नए रास्ते खोले हैं। बहरहाल, साइबर एक्सपर्ट भी इस बात को मानते है कि यूआईडीएआई का डेटा बेस कतई सुरक्षित नहीं है और इसके हैक किए जाने की पूरी संभावना है। दुनिया में याहू से लेकर टैक्सी ऑपरेटर्स उबर की ताजा डेटा हैकिंग के मामले साफ संकेत दे रहे हैं कि यूआईडीएआई का डेटा बेस भी चुराया जा सकता है। आधार कार्ड को क्योंकि बैंक खाते और अन्य महत्वपूर्ण लेनदेन से जोडा गया है, इसलिए लोगों के बैक खाते तक भी सुरक्षित नहीं है। सख्त नियमों के बावजूद मोबाइल नंबर और ईमेल आसानी से निजी हाथों में पहुंच जाते हैं और मोबाइल और ईमेल पर बेमतलब के संदेश आते हैं। और इस बात की पूरी संभावना है कि जिस तरह आपके मोबाइल नंबर और ईमेल निजी हाथों मे पहुंच जाते हैं, उसी तरह यूआईडीएआई में आपका बायोमेट्रिक डेटा भी निजी हाथों के पास पहुंच सकता है। इसी सप्ताह यह सनसनीखेजपूर्ण समाचार प्रकाशित हुआ है कि यूआईडीएआई ने आधार डेटा को प्राइवेट कंपननियों के साथ साझा किया है। यह नागरिक की निजता के अधिकार का घोर उल्लघंन है। आधार कार्ड से निजता के अधिकार का सरासर उल्लघंन हुआ है और अगर सरकार ही लोगों की निजता में तांक-झांक करे, तो लोकतंत्र और तानाशाही में क्या फर्क रह जाता है? इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत लोगों की निजता के मौलिक अधिकार से कोई छेडछाड नहीं की जा सकती। देश के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि आधार कार्ड निजता के अधिकार में सरकार का खुला दखल है। बहरहाल, लोगों के काले करनामों पर नजर रखने के लिए पैन कार्ड प्रर्याप्त है। आधार कार्ड को कारोबारी लेनदेन के लिए अनिवार्य बनाना जनहित में नहीं है। सरकार अपनी सवा सौ करोड जनता की निजी जानकारी को खतरे में डाल रही है।
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