चुनाव के समय सियासत से जुडे लोग भाव न दिखाएं और मोल-तोल न करें, ऐसा हो नहीं सकता। गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन से राज्य की सियासत के केन्द्रबिंदु बने हार्दिक पटेल इस सच्चाई को बखूबी जानते हैं कि चुनाव की गहमा-गहमी में इस समय राजनीतिक दलों से जो ले लिया, सो हासिल कर लिया। चुनाव खत्म होते ही उनकी अहमियत जाती रहेगी। इसीलिए, हार्दिक पटेल कांग्रेस से “लुका-छिपी“ खेल रहे हैं। कांग्रेस से मोल-तोल के लिए एक कदम आगे बढाते हैं, तो दूसरे कदम में पीछे हट जाते हैं। बुधवार रात को कांग्रेस नेताओ से मुलाकात तय थी मगर हार्दिक पटेल नहीं पहुंचे। इससे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की बात को भी सिरे से खारिज कर चुके हैं हालांकि सीसीटीवी फुटेज में साफ-साफ दिख रहा है कि हार्दिक अहमदाबाद के एक होटल में राहुल से मिल चुके है। उनका यह सियासी मिजाज साफ संकेत दे रहा है कि पाटीदार नेता अधिकाधिक मोल-तोल की फिराक में है। कांग्रेस के लिए हार्दिक पटेल का समर्थन बहुत मायने रखता है। गुजरात में पाटीदार (पटेल समुदाय) की राजनीति मे बहुत अहम भूमिका रही है। सत्तारूढ दल भाजपा के 122 विधायकों मेंसे एक-तिहाई पाटीदार है। राज्य की करीब बीस फीसदी आबादी भी पटेलों की है। अब तक पाटीदार भाजपा के कट्टर समर्थक रहे हैं। मगर हार्दिक पटेल ने पहली बार राज्य में पाटीदारों को आरक्षण के लिए मंच पर लाकर भाजपा के इस ठोस जनाधार में सेंध लगाई है और भाजपा इससे बौखलाई हुई भी है। 2015 से हार्दिक पटेल ने पाटीदारों के लिए जो आरक्षण आंदोलन शुरु किया था, आज तक जारी है। इसके लिए हार्दिक पटेल को नौ माह में जेल में और छह माह तक ं राज्य से “तडी पार“ रहना पडा है। भाजपा के लिए सबसे बडा सरदर्द 24-वर्षीय हार्दिक पटेल की युवाओं में लोकप्रियता है। गुजरात की आबादी में 50 फीसदी युवा (35 साल से कम) हैं और इन्ही युवाओं के ठोस समर्थन से भाजपा अब तक गुजरात में सत्ता में आती रही है। पाटीदारों में कदव समुदाय हार्दिक पटेल के कट्टर समर्थक हैं। हार्दिक भी इसी समुदाय से संबंधित है। उत्तर गुजरात में कदव पाटीदारों का ज्यादा रसूख है। कदव पाटीदार मूलतः छोटे किसान और कृषि उपज के कारोबारी है। इस समुदाय को अब लगता है कि कृषि में कोई भविष्य नहीं है। इसलिए यह समुदाय सरकारी नौकरियों में पाटीदारों के लिए ओबीसी की तरह आरक्षण की मांग कर रहा है। पाटीदारों में लेहिया समुदाय अभी भी भाजपा के साथ है और यह समुदाय हार्दिक पटेल के साथ नहीं है। यह समुदाय अपेक्षाकृत आर्थिक रुप से सपन्न है और उनके लिए आरक्षण ज्यादा मायने नहीं रखता है। गुजरात में पाटीदारों की आरक्षण की मांग लंबे समय से चल रही है। 1981 में पाटीदारों ने दलितों और आदिवासियों को दिए जा रहे आरक्षण के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाया था। फिर 1985 में अन्य पिछडा वर्गों (ओबीसी) के आरक्षण के खिलाफ। पांच माह तक इस आंदोलन में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। 2015 में पाटीदारों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग में 15 युवक मारे गए थे। इस घटना के बाद हुए पंचायती संस्थाओ के चुनाव में कांग्रेस को 31 जिला पंचायतों में से 22 और 230 ताल्लुक पंचायतों मेंसे 126 में प्रचंड जनादेश मिला था। चुनाव से पहले 31 जिला पंचायतों मेंसे 30 और 220 ताल्लुकों मेंसे 194 में भाजपा का परचम लहरा रहा था। कांग्रेस के लिए 22 साल में पहली बार जबरदस्त जनादेश मिला है। कांग्रेस इससे उत्साहित है। विधान सभा में भी पंचायतों जैसा जनादेश पाने के लिए कांग्रेस को हार्दिक पटेल का समर्थन बेहद जरुरी है। गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने पाटीदारों को दस फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था मगर पाटीदारों ने इसे नहीं माना। बहरहाल, हार्दिक पटेल को मनाना और पाटीदारों को आरक्षण देना कांग्रेस के लिए टेढी खीर साबित हो सकती है।
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