शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

“भारत छोडो“ आज भी प्रासंगिक

भारत छोडो आंदोलन के 75 साल पूरा होने पर बुधवार को संसद में आयोजित  विशेष  चर्चा की गरिमा से ही अनुमान लगाया जा सकता है हम आज कहां खडे हैं। इस आंदोलन ने भारत में अंतिम सांसे ले रही फिरंगी सरकार के कफन में अंतिम कीलें ठोंकी थी। 1942 में भारत छोडो आंदोलन की शुरुआत करते हुए महात्मा गांधी ने “ करेगें या मरेगें“ का आहवान किया था और इसका इतना जबरदस्त  प्रभाव  हुआ था कि फिरंगियों ने अविलंब भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना  शुरु कर दिया था। 1947 में भारत को आजादी मिलने में “ भारत छोडो आंदोलन“ का अहम योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1942 से 1947 के पांच साल की अहमियता पर जोर डालते हुए देसवासियों का आहवान किया है कि अगले पांच साल भी  1942 से 1947 के जज्बे वाले होने चाहिए। और भारत छोडो आंदोलन के 75 साल बाद जो हालात हैं, उसके  मद्देनजर   वाकई ही देश  को इस तरह के आंदोलन की सख्त दरकार है। बडी पुरानी कहावत है,“ यथा राजा, तथा प्रजा“। यह कहावत सामंती व्यवस्था में प्रासंगिक थी। लोकतंत्र में “यथा प्रजा, तथा राजा“ वाली कहावत चरितार्थ  होती है। देश  के मौजूदा हालात के लिए समकालीन नेताओं को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अगर भगवा पार्टी के कुछ लोग असहिष्णु  हो गए है तो लोग-बाग उनसे भी ज्यादा असहिष्णु  है। बात-बात पर लडना और अपनी गलती न मानकर दूसरे पर दोषारोपण करना हमारी फितरत है।  राष्ट्रीय   संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर अपनी संपत्ति बनाना, हमारी आदत बन चुकी है। वैसे इमानदार बने रहने का नाटक करेगें, मगर मौका हाथ लगे तो बेइमानी करने से भी नहीं चूकेंगे। आजादी के सात दशक बाद इतिहास को बदलने की कोशिश   की जा रही है। संस्थानों तक के नाम बदले जा रहे हैं। संविधान से छेडछाड करने की  पृष्ठभूमि   बनाई जा रहा है। सरदार पटेल, भगत सिंह और बीआर अंबेडकर किसके हैं, इस पर बहस की जा रही है। भारत छोडो आंदोलन का श्रेय लेने की होड़ लगी हुई  है। मगर इतिहास को बदला नहीं जा सकता और  कुछ अध्याय हटा देने से ऐतहासिक घटनाओं को मिटाया नहीं जा सकता।  समकालीन युवा पीढी को  शायद इस बात का ज्ञान नहीं है कि  “भारत छोडो आंदोलन“ और स्वधीनता आंदोलन में   राष्ट्रीय  स्वंय सेवक की कोई भूमिका नहीं रही है। इतिहास को तोड-मरोड पेश  करने के  बावजूद वस्तु स्थिति को बदला नहीं जा सकता। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि  1925 सेे .2000 तक “ स्वत्रंतता आंदोलन“ को  राजनीतिक लडाई मानने वाले राष्ट्रीय   स्वंय सेवक से जुडे लोग भारत छोडो आंदोलन के 75 साल बाद देश  के तीन शीर्ष   पदों पर पदस्थ हैं। आजाद भारत ने वास्तव में  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक को बुलंदियों तक पहुंचाया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सच्चाई को स्वीकारा भी है। इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि राष्ट्रीय   स्वंय सेवक की आजादी के बाद  राष्ट्र   निर्माण में अहम भूमिका रही है। प्राकृतिक आपदाओं और आपतकाल में पीडितों की मदद करने में राष्ट्रीय   स्वंय सेवकों का अहम योगदान रहा है। और इस सच्च्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता है कि  भारत छोडो आंदोलन और स्वधीनता आंदोलन में देश  के कमजोर तबकों की भागीदारी में जो फासला रह गया था, आजाद भारत ने उसे काफी हद तक दूर कर दिया है। फासलें  आज भी हैं मगर आजादी से पहले से एकदम अलग हैं।  भारत छोडो आंदोलन के दौरान हिंदू और मुसलमानों में इतना फासला नहीं था जितना आज है। भारत छोडो आंदोलन के समय का  राष्ट्रवाद  भले ही हमारा अधिकृत राष्ट्रवाद बन गया हो, मगर   1942-47 के समय स्वंत्रतता सेनानियों और  अवाम में जो जज्बा था, वैसा आज ढंूढे भी नहीं मिलता है। समकालीन भारत को, निसंदेह, भारत छोडो जैसे आंदोलन की जरुरत है। मौजूदा  अविश्वास  और असहिष्णुता  का मौजूदा माहौल देश  के सर्वागीण विकास  में बडी रुकावट डाल रहा है।