भारत में सियासी दलों की मानसिकता “खुद मियां फजीहत, औरों को नसीहत“ जैसी है। आम आदमी के लिए सख्त कायदे-कानून मगर जब बात अपने पर आए तो कायदे-कानून हवा हो जाते हैं। राइट टू इन्फॉर्मेशन का मामला ही ले लीजिए। पूरे देश में आरटीआई लागू है मगर राजनीतिक दलों पर यह कानून लागू नहीं होता है। सरकार ने सत्ता में आते ही काले धन के खात्मे के लिए कई कदम उठाए हैं मगर राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए अभी तक कोई कायदे-कानून नहीं हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॅार्म्स की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012-2013 और 2015-16 के दौरान चार वर्षों में काँपोरेटस और व्यवसायी घरानों ने राजनीतिक दलों को 956.77 करोड रु चंदे के रुप में दिए और इसमें सबसे ज्यादा 705.81 करोड भारतीय जनता पार्टी को दिए गए। यह कुल चंदे का लगभग 90 फीसदी बनता है। राजनीतिक दलों ने यह चंदा मतदाताओं को रिझाने, जरुरत पडने पर विधायकों की खरीद-फरोख्त करने और राजनीतिक जोड-तोड के लिए इस्तेमाल किया । राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों को चुनाव लडने के लिए भी धन से मदद करते हैं । काँपोरेटस और व्यवसायी घरानें फोक्ट में राजनीतिक दलों को चंदा देने से रहे। “इस हाथ लेे, उस हाथ दे ” की तर्ज पर चंदा देने वाले राजनीतिक दलों से बदले में काफी कुछ वसूल कर लेते हैं। विडवंना यह है कि आम आदमी को तो अपनी कमाई के एक-एक पैसे का पूरा हिसाब आयकर विभाग को देना पडता है, मगर राजनीतिक दलों को चंदे का कोई हिसाब-किताब नहीं देना पडता और न ही आयकर चुकाना पडता है। भाजपा ने राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाने का वायदा कर रखा है और भगवा पार्टी अक्सर राजनीतिक सुचिता की बात भी करती है मगर सत्ता में आने के तीन साल बीत जाने के बावजूद चुनाव सुधार के लिए संजीदा प्रयास नहीं किए गए हैं। भारत में राजनीतिक दलों के वित्तीय प्रबंध के तीन अहम बिंदू हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण हैः राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को मिल रहा बेहिसाबी चंदा जिससे उनकी राजनीति फलती-फूलती है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू हैः चंदा किसने दिया, कितना दिया और यह कहां खर्च किया गया, इसका राजनीतिक दलों को कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं रखना पडता है। देश में हर छोटे-बडे व्यवसायी, कारोबारी, संस्था, उधोग का ऑडिट अनिवार्य है मगर राजनीतिक दलों के लिए नहीं। राजनीतिक चंदे का यह तीसरा महत्वपूर्ण बिंदू है। केन्द्रीय सूचना आयोग (सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन) ने कुछ समय पहले व्यवस्था दी थी कि राजनीतिक दलों पर भी आरटीआई लागू होता है। पर सरकार ने सीआईसी की इस महत्वपूर्ण व्यवस्था का तोड भी निकाल लिया। इस साल संसद के बजट सत्र में राजनीतिक चंदे को व्यवस्थित करने के लिए लोकसभा में फाइनेंस बिल पारित किया गया। फाइनेंस बिल को क्योंकि राज्तसभा से पारित करबाने की जरुरत नहीं पडती, इसलिए सरकार ने बडी चतुराई से इसे लोकसभा से पारित करवा लिया। इसके माध्यम से सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे की सीमा 20,000 से घटाकर 2,000 रु तय की है और बिल में “चुनावी बांड“ का विकल्प भी दिया गया है। बांड को बैंकों से खरीदकर राजनीतिक दलों को इस वैध माध्यम से चंदा दिया जा सकता हैं। यही दो बिंदू इस बिल की सबसे बडी खासियत है। सरकार ने आखिरी समय में बिल में दो संशोधन जोडे। पहले सशोधन में कॉर्पोरेट घराने और व्यवसायियों पर चंदा देने की जो सीमा थी, वह हटाई दी गई है। दूसरे संशोधन में कारोबारियों को प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट में राजनीतिक चंदे का जो उल्लेख करना पडता था, अब उन्हे ऐसा नही करना पडेगा। राजनीतिक दलों को आरटीआई में लाने और उनके वित्तीय प्रबंध को पारदर्शी बनाने का इस निल में कोई जिक्र नहीं था। बिल आराम से पारित भी हो गया है, विपक्ष ने कोई चूं तक नहीं की। इससे पता चलता है कि राजनीतिक दल काले धन को खत्म करने के प्रति कितने संजीदा है।
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