बुधवार, 2 अगस्त 2017

बंटवारे से भी गहरे जख्म

1947 के बंटवारे के  जख्म इतने  गहरे  और पीडादायक नहीं है, जितने  आधुनिक भारत को जात-पात, हिन्दू-मुसलमान, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम  में बांटने वाली सियासत  के घाव ।  1947 में दोनों तरफ दुख और त्रासदी का जो मंजर देखा गया था, कालान्तर में उसे तो भुलाया जा सकता है मगर आजादी के बाद सत्तहर साल के दौरान सियासी नेताओं ने देश  को जिस तरह से जात-पात, महजबी  और क्षेत्रवाद में बांटा है, उस नुकसान की भरपाई  शायद हीं की जा सकती है। जिस तरह आजादी से पहले अखंड भारत के दो सबसे बडे सूबों-पंजाब और बंगाल- को महजबी आबादी के आधार पर बांटा गया था, ठीक उसी तरह देश  के कई सूबों को आज सियासी दल “वोट“ की खातिर बांट रहे हैं। अगले सप्ताह भारत अपनी आजादी की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहा है। इसी बीच देश  की संसद के भीतर और बाहर “ मॉब लींचिग“ पर चर्चा  हो रही है। असहिष्णुता  की इंतहा हो गई है। गो रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों का सरेआम उत्पीडन किया जा रहा है। राष्ट्रवाद  को तोते की तरह रटाया जा रहा है  और इतिहास को तोड-मरोड कर उसके भगवाकरण के प्रयास किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश  में लोकतंत्र की जडों में “ साम्प्रदायिकता ” का तेजाब डालकर इन्हें  खोखला किया जा रहा है। आजादी की  सत्तरवीं  वर्षगांठ  पर देश  में जो  हालात हैं, उन पर करीब 114 पूर्व  सैन्य अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गहरी चिंता व्यक्त की है। इससे पहले इसी साल जून माह में 65 रिटायर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों ने भी प्रधानमंत्री से देश  में व्याप्त असहिष्णुता और बढते  विजिलेटिज्म पर गहरी चिंता जाहिर की थी। ताजा पत्र में भारतीय सशस्त्र सेनाओं से रिटायर सैनिकों ने हिंदुत्व की रक्षा करने वालों के बर्बरतापूर्ण एवं कायराना हमलों की कडी भर्त्सना करते हुए मौजूदा डरावनी और नफरतभरी स्थिति पर गहरी निराशा  व्यक्त की है। पत्र में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि मौजूदा परिवेश  में बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, सिविल राइटस ग्रुप  और अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता को भी बख्शा  नहीं जा रहा है। पूर्व सैनिकों के अनुसार मौजूदा हालात से देश  की सशस्त्र सेनाओं और संविधान को भी गहरा धक्का लगा है। भारतीय सशस्त्र सेना “ अनेकता में एकता“ पर भरोसा करती है और अगर इसका पालन नहीं किया गया तो सशस्त्र सेना का मनोबल भी टूटता है। भगवा संगठनों के समर्थक भले ही इन राष्ट्रीय  सरोकारों को हल्के में नकार दें मगर देश  के समक्ष जो ज्वलंत चुनौतियां हैं, उन्हे सिरे से नकारा नहीं जा सकता। सोमवार को संसद में “मॉब लींचिग“ पर चर्चा के दौरान सांसदों ने मौजूदा स्थिति का कोई हल ढूंढने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए। संविधान में जिन मूल्यों और सिद्धांतों का  स्पष्ट  उल्लेख है, उन का सम्मान नहीं किया जा रहा है। इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि केन्द्र में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हिन्दुत्व और गो रक्षा की आड में दलितों और मुसलमानों पर अत्याचार बढे हैं। खासकर भाजपा  शासित मध्यप्रदेश  और झारखंड में “मॉब लींचिग“ के मामलों में खासा इजाफा हुआ है। 2015 में दादरी लीचिंग के बाद से इस तरह की घटनाओं में बढोतरी हुई है। अब तक तीस से अधिक लोग “मॉब लीचिंग“ में मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री की बार-बार चेतावनी के बावजूद  “मॉब लीचिंग“ की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है। संसद में सोमवार को सरकार ने  “मॉब लीचिंग“ की घटनाओं से यह कहकर अपना पल्ला झाड लिया कि कानून एवं व्यवस्था राज्यों का मामला है। देश  की यही सबसे बडी समस्या है। अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडकर दूसरे के सर मढ देना और  समस्या से भागना सियासी दलों की फितरत है। भारत इस समय चौतरफा  दुश्मनो  से घिरा हुआ है। केद्र में भगवा पार्टी की  सरकार आने के बाद से खतरा और बढा है। सरकार को सतर्क  रहने की जरुरत है।