गुरुवार, 3 अगस्त 2017

जरा सी राहत काफी नहीं

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को रेपो रेट में 0.25 फीसदी कटौती करके इस साल पहली बार कर्जदारों को कुछ तो राहत दी है। लगभग दस माह पहले अक्टूबर, 2016 में आरबीआई ने रेपो रेट में इतनी ही कटौती की थी। ताजा कटौती से रेपो रेट 6.25 फीसदी से घटकर 6 फीसदी पर आ गया है। ग्रोथ को तेज करने के लिए  रिजर्व बैंक ने यह कदम उठाया है।  रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से होम, कार  और बिजनेस लोन सस्ता होने की उम्मीद की जा सकती है  बशर्ते   बैंक सस्ते ब्याज का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाएं। अब तक का अनुभव यह कहता है कि रेपो रेट बढते ही  बैंक ब्याज बढाने में जरा भी देर नहीं करते मगर रेपो रेट में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने में, जब तक संभव हो, आनाकानी करते हैं। आरबीआई ने इस बार रिवर्स  रेपो रेट और बैंक रेट में भी  0.25 फीसदी की कटौती की है। ताजा कटौती से रिवर्स रेपो रेट 5.75 फीसदी और बैंक रेट  6.25 फीसदी पर आ गए हैं। अभी रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी और बैंक रेट 6.50 फीसदी है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों से बांड्स और सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद करता है। आरबीआई द्वारा बैंकों को उनकी जमा रा पर अदा किए जाने वाली ब्याज दर को रिवर्स  रेपो रेट कहते हैं। बैंकों को आरबीआई द्वारा दिए जाने वाले कर्ज  और एडंवासिस पर जो ब्याज लिया जात है, वह बैंक रेट होता है।  ब्याज दरों में ताजा कटौतियों से देष में 2010 जैसी सस्ते कर्ज की स्थिति  लौट सकती है। जिस तरह रेपो रेट की ऊंची दर बाजार से नगदी (लिक्विडिटी) को सोख लेती है, उसी तरह ब्याज दरों में कटौती से बाजार में अतिरिक्त नगदी उपलब्ध होती है।  रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से बाजार में एकमुष्त बीस हजार करोड रु की अतिरिक्त नगदी मिलती है। इससे पहले ब्याज दरों को यथावत रख आरबीआई महंगाई को तीन फीसदी के आस-पास लाने का प्रयास करता रहा है और केन्द्रीय बैंक इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल भी रहा है। जून में खुदरा महंगाई न्यूनतम 1.54 फीसदी के स्तर पर थी। इसी कारण आरबीआई को ब्याज दरों में कटौती करनी पडी। बुधवार को जारी मौद्रिक नीति में आरबीआई ने आषंका व्यक्त की है कि अगले साल के अंत तक खुदरा महंगाई फिर चार फीसदी तक पहुंच सकती है।  किसानों की कर्ज माफी और कर्मचारियों को नए वेतन आयोग की सिफारिषों के अनुरुप बढा हुआ वेतन महंगाई को बढा सकता है। इस साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेष और अगले साल 2018 में राज्स्थान,  कर्नाटक, मध्य प्रदेष, छतीसगढ, नगाालैंड, त्रिपुरा और मेघालय  में विधानसभा चुनाव होने हैं। और फिर  मई  2019 में लोकसभा मे आम चुनाव। इन राज्यों और लोकसभा चुनाव के दृश्टिगत केन्द्र और राज्यों की सरकारें किसानों को कर्ज  माफी की सौगात दे सकती है। उत्तर प्रदेष, महाराश्ट्र, पंजाब और कर्नाटक पहल ही किसानों के कर्ज  माफी की घोशणा कर चुके हैं। किसानों के ऋण माफी पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि  मई  2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक देष में किसानों के कर्ज माफी की राषि 2,57,000 करोड रु अथवा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी तक पहुंच सकती है। इसके अलावा  2018 में आठ राज्यों के विधानसभा और   2019 में लोकसभा चुनाव में काले धन के प्रवाह से कीमतों पर दबाव पडना तय है। चुनावों से पहले विभिन्न राज्य अपने कर्मचारियों को नए वेतनमान की सौगात दे सकते हैं। ये सब कारक  महंगाई बढाने के लिए काफी है़ं।  अगर ऐसा हुआ तो महंगाई पर नियंत्रण पाने के आरबीआई के प्रयासों पर पानी फिर सकता है। आरबीआई की यही सबसे बडी चिंता है। बाजार में बैंकों की लिक्विडीटी को तो सोखा जा सकता है, मगर महंगाई बढाने वाले समकालीन षासकों के लोक-लुभावने वायदों को कैसे रोका जाए?