मंगलवार, 22 अगस्त 2017

खटौली रेल हादसा

एक और रेल हादसा और 23 यात्रियों की मौत। मोदी सरकार के तीन साल के   शासन में 27 रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और इनमें  259 लोग बेमौत मारे जा चुके है। और पिछले पांच साल में हुई 586 रेल दुर्घटनाओं मेंसे  53 फीसदी हादसे रेल डिब्बों के पटरियों से उतरने ( ड्रिरेलमेंट) के कारण हुए हैं। शनिवार को उत्तर प्रदेश  में मुजफ्फरागर के पास खटौली के निकट एक और रेल हादसा  हुआ । इसमें  23 लोग मारे गए और 203 गंभीर रुप से घायल हो गए। हरिद्धार से पुरी जा रही उत्कल एक्सप्रैस के चौदह डिब्बे ट्रैक के क्षतिग्रस्त होने की वजह से पटरी से उतर गए। शुक्र है समीपवर्ती गांव के लोग तत्काल घायलों की मदद के लिए आगे आए और कई जानें बच गईं। प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि  पटरी  के दाएं किनारे को मरम्मत के लिए हैक्सा ब्लेड से काटा गया था और इसे आनन-फानन में जोडा गया था। मरम्मत कर रहे रेलकर्मियों ( परमानेंट वे इंस्पेक्टर्स-पीड्ब्लयूआई) ने काम ख्तम करने से पहले ट्रैक जांयट की फिश  प्लेटस और नटस एंड बोल्टस को कसा तक नहीं। इसकी वजह से सौ किलोमीटर की रफ्तार से भाग रही  ट्रैन  के डिब्बे जैसे ही इस फ्टरी से गुजरे, यह बिखर गई और चौदह डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हो गए। रिपोर्ट  में यह भी कहा गया है कि रेलवे का मेंटेनेंस स्टाफ अक्सर बगैर सूचना दिए और आनन-फानन में रेल पटरियों की मरम्मत करता है। यानी रेलवेकर्मी रेल यात्रियों की जान जोखिम में डालने का काम अक्सर करते रहते हैं। इससे ज्यादा गैर-जिमेदाराना काम हो ही नहीं सकता। सरकार ने मामले की गंभीरता भांपते हुए  चार अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया है और तीन को जबरन छुट्टी पर भेज दिया है।  उत्तरी रेलवे के चीफ ट्रैक इंजीनियर का तबादला कर दिया गयाा है। उत्तर प्रदेष में एक साल में यह दूसरी बडी रेल दुर्घटना है। पिछले साल (2016) 20 नवंबर को उत्तर प्रदेश  में कानपुर के पुखरांया में रेल डिब्बों के पटरियों से उतरने के कारण बहुत बडा हादसा हुआ था और इसमें 150 से ज्यादा यात्री मारे गए थे। इस साल 22 जनवरी को आंध्र प्रदेश  के विजयनगरम जिले में हीराखंड एक्सप्रैस के आठ डिब्बे पटरी से उतर गए थे और इस हादसे में 39 लोग माए गए थे।  रेल दुर्घटना होते ही सरकार जांच कमेटी बैठाकर हादसों को टालने के लिए बडे-बडे दावे करती है। फिर हादसा होता है और पुनः वही रटे-रटाए बोल बाहर आते हैं।। मगर रेल हादसे नही टलते हैं। इस साल बजट में रेलवे सेफ्टी के लिए “रेलवे संरक्षण कोष “ स्थापित किया गया है और इसके लिए एक लाख करोड रु का आवंटन किया गया है। इस कोष   का प्रमुख मकसद देश  में रेल पटरियों को को चुस्त-दुरुस्त बनाना है। रेलवे मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश  में 87 फीसदी से भी अधिक रेल दुर्घटनाएं मानवीय चूक से होती हैं और रेल पटरियों का उचित रख-रखाव इसमें प्रमुख है। पिछले साल दुनिया में हुई कुल रेल दुर्घटनाओं मेंसे  प्रदंह फीसदी भारत में हुईं थी। भारत में  रेल गाडियां अपनी क्षमता से 16 फीसदी अधिक यात्रियों का बोझ वहन  करती हैं। और कई बार क्षमता से अधिक यात्री भार भी दुर्घटना का कारण बनता है। भारतीय रेलवे हर रोज 16,000 से भी अधिक रेल गाडियों का संचालन करती हैं और इनमें दो करोड के करीब यात्री सफर करते हैं। निसंदेह, यात्रियों की इतनी विशाल संख्या का रात-दिन के सफर में पूरा ख्याल रखना और यात्रा को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना आसान नहीं है। देश  में रेल का इफंरास्ट्रक्चर आज भी फिरंगी के जमाने जैसा है। इसमें कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किए  गए  हें  ।  सरकार सुधार की बडी-बडी बातें तो करती  हैं, पर उन पर संजीदगी से अमल नहीं हो पाता है। जनता हर बार यही पूछती है“ आखिर कब आएंगे रेल यात्रियों के अच्छे दिन“।