पहाडी राज्यों के लिए जीएसटी व्यवस्था में भी टैक्स छूट को अगले दस साल तक बढाए जाने से पूर्वोतर और जम्मू-कष्मीर को बडी राहत मिली है। औद्योगिकरण में अपेक्षाकृत पिछडे पहाडी राज्यो को सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, और आयकर में छूट दी जाती है। पूर्वोतर असम, मेघालय, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश , मणिपुर, त्रिपुरा और सिक्किम में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी राहत सुविधा की मियाद 31 मार्च 2017 को खत्म हो चुकी है। जम्मू-कष्मीर में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी राहत छूट की मियाद 2020 तक है। केन्द्र सरकार के ताजा पैकेज से पूर्वोतर राज्यों में 31 मार्च 2017 तक स्थापित की गई औद्योगिक यूनिटस को अगले दस साल यानी 2027 तक यह छूट मिलती रहेगी। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में स्थापित किए गए उद्योगों को ताजा रियायत का कोई बहुत फायदा मिलने वाला नहीं है। केन्द्र सरकार ने मार्च, 2010 में ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को दी जारी रही रियायतें बंद कर दी थी। औद्योगिकरण को बढाने के मकसद से केन्द्र सरकार पहाडी राज्यों को विशेष रियायतें देती हैं। इनमें सेंट्रल एक्साइज ड्यूटीे में 8 से 12 फीसदी छूट, पांच साल के लिए आयकर में सौ फीसदी छूट और अधिकतम तीस लाख रु तक प्रोजेक्ट लागत की 15 फीसदी नगद सब्सिडी शामिल है। इन रियायतों से पहाडी राज्यों के औद्योगिकरण में वास्तव में तेजी आई है। रियायतों के कारण ही हिमाचल प्रदेश का पंजाब की सीमा से सटा बद्दी-बरोटीवाला, नालागढ (बीबीएन) आज एशिया का अग्रणी दवा उत्पादक क्षेत्र बन चुका है। इस क्षेत्र में सालाना 35,000 करोड रु से भी अधिक की दवाओं का उत्पादन किया जा रहा है और दो सौ से ज्यादा देशों को 150 बल्क ड्रग का निर्यात किया जाता है। बद्दी-बरोटीवाला, नालागढ क्षेत्र में अब तक 15,300 करोड रु से भी अधिक निवेश से 2,202 उधोग स्थापित किए जा चुके हैं और इनसे 73,392 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। और यह सब 2003 में केन्द्र की दस साल की रियायतों के कारण संभव हो पाया है। मगर पडोसी राज्यों के सख्त विरोध के कारण हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए दिए जा रहे विशेष औद्योगिक पैकेज को 2010 में ही समाप्त कर लिया गया था जबकि पैकेज 2013 तक के लिए दिया गया था । इससे, इन राज्यों के औद्योगिकरण को धक्का लगा है । पैकेज समाप्त किए जाने के कारण हिमाचल प्रदेश में चालीस फीसदी उधोग भी 2010 में ही स्थापित किए गए। नियमानुसार, 2010 में स्थापित किए जाने वाले उधोगों को दस साल तक रियायतें जारी रहेगी। 2013 में केन्द्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए अधिकतम तीस लाख रु तक की 15 फीसदी सब्सिडी वाली रियायत तो बहाल करदी मगर आयकर और सेंट्रल एक्साइज ड्यूटीे में आठ फीसदी छूट को बहाल नहीं किया गया। हिमाचल और उत्तराखंड जैसे कठिन भोगोलिक स्थिति वाले राज्यों में उधोग लगाना और उन्हें चलाना इतना आसान नहीं है जितना मैदानी क्षेत्रों में। पहाडी राज्यों को जब-तब प्राकृतिक कहर का सामना करना पडता है और उत्पाद की लागत भी यहां मैदानी क्षेत्रों से कहीं ज्यादा है। कदम-कदम पर तरह-तरह की बाधाएं हैं। इन हालात में पूर्वोतर राज्यों और जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और उत्तरखंड के लिए भी विशेष औद्योगिक पैकेज की निहायत जरुरत है। हिमाचल प्रदेश के मामले में राहत वाली बात यह है कि रियायतें बंद होने के बावजूद राज्य में निवेश प्रवाह में ज्यादा फर्क नहीं पडा है। तथापि बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ के उधोगों में जीएसटी को लेकर खासी शं काएं हैं। 2010 से पहले स्थापित किए गए जो उधोग जीएसटी के तहत सेंट्रल एक्साइज ड्युटी में रियायत के पात्र हैं, उन्हे खासी समस्याओं का सामना करना पड रहा है। मौजूदा नीति के तहत 58 फीसदी एक्साइज ड्यूटी की रिइंबस्मेंट केन्द्र सरकार को करनी है तो 42 फीसदी राज्य सरकार को। इस प्रकिया में खासा समय जाया हो सकता है। जीएसटी से यह प्रकिया और भी जटिल हो सकती है।
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