भारत और चीन ने डोकलाम विवाद को कूटनीतिज्ञ प्रयासों से सुलझा लिया है। लगभग तीन महीने से भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर जबरदस्त तनाव बना हुआ था। भूटान के डोकलाम पठार की विवादित जमीन पर चीन द्वारा सडक निर्माण का भारत ने कडा विरोध करते हुए विवादित क्षेत्र में अपनी सेना तैनात कर दी थी। लगभग तीन माह से भारत और चीन की सेनाएं डोकलाम में आामने-सामने खडी हैं। इस दौरान चीन ने कई बार भारत को युद्ध की गीदड भभकियां भी दीं। 1962 के भयावह युद्ध की कडवीं यादें भी दिलाईं। मगर भारत अपने स्टैंड से टस-से-मस नहीं हुआ। चीन अब तक इस बात पर अडा हुआ था कि भारत पहले डोकलाम से सेना हटाए, उसके बाद ही बातचीत होगी। अतंतः, चीन को झुकना पडा और अब इस बात पर सहमति बनी है कि दोनों देश डोकलाम के विवादित क्षेत्र से अपनी-अपनी सेनाए हटा लेंगे। सोमवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस समझौते की जानकारी दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी इसकी पुष्टि की है हालांकि अपनी नाक बचाने के लिए यह भी कहा है कि वह डोकलाम मे पेट्रोलिंग बदस्तूर जारी रखेगा। कुछ दिन पहले भी चीन ने अपनी सेना डेढ सौ मीटर पीछे हटाने की पेशकश थी मगर भारत चीनी सेना के अढाई सौ मीटर पीछे हटने पर अडा हुआ था। इसीलिए, तब बात नहीं बनी मगर बीजिंग और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिज्ञ प्रयाास जारी रहे। कहते हैं कूटनीतिज्ञ में ऐसी स्थिति पैदा की जाती हैं कि संबंधित पक्ष को एक-एक कदम आगे बढाए।ताजा समझौते तहत दोनों देश एक -एक कड़ा आगे बड़े हैं. चीन को इस बात की शिकायत रही है कि भारत ने डोकलाम विवाद पर कूटनीति तौर पर प्रयास किए बिना ही डोकलाम में सीधे अपनी सेना भेज दी। भारत का कहना है कि चीन विवादित क्षेत्र में सडक का निर्माण कर रहा था, इसलिए उसे ऐसा करना पडा। चीन का दावा है कि भारत को इस सडक निर्माण की बाकायदा सूचना दी गई थी मगर तब भारत ने कूटनीति तौर पर इसका संज्ञान हीं नहीं लिया। बहरहाल, डोकलाम विवाद सुलझाए जाने से सीमा पर तनाव खत्म होगा और दोनों देशों पर युद्ध के जो बादल मंडरा रहे थे, फिलहाल छंट गए हैं। मगर चीन की विस्तारवादी भूख का ख्याल करते हुए उस पर भरोसा नही किया जा सकता। भारत और चीन ब्रिक्स, चीन और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइाजेश न जैसे मंचों पर बार-बार साथ-साथ बैठते हैं। अगले महीने सितंबर के पहले सप्ताह (3 से 5 सितंबर) चीन के जियामेन में ब्रिक्स सम्मेलन हो रहा है। भारत की मौजूदगी के बगैर इस सम्मलेन की कोई अहमियत नहीं रह जाती है। इसी संभावना के दृष्टिगत चीन डोकलाम विवाद को ब्रिक्स सम्मलेन से पहले सुलझा लेना चाहता था। डोकलाम मूल रुप से भूटान का क्षेत्र है और तिब्बत की तरह विस्तारवादी चीन की नजर इस क्षेत्र को हथियाने पर भी टिकी हुई हैं। डोकलाम में सडक बनाने से चीन के लिए भारत के पूर्वोतर राज्य में घुसपैठ करना भी आसान हो जाएगा। चीन की यह सामरिक विवषता हो सकती है। थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने भी माना है कि चीन के साथ डोकलाम जैसे विवाद आगे भी जारी रह सकते हैं। डोकलाम के विवादित क्षेत्र में चीन सडक बनाने से पीछे नहीं हट सकता। चीन 1890 में ब्रितानवी सरकार के साथ हुई संधि का हवाला देते हुए अभी भी डोकलाम क्षेत्र को अपना इलाका बता रहा है। भूटान चीन के इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। बहरहाल, डोकलाम विवाद के कूटनीति बातचीत से हल होने से भारत की प्रतिष्ठा में खासा इजाफा हुआ है। भारत शुरु से ही इस विवाद के बातचीत से शान्तिपूर्वक हल का पक्षधर रहा है जबकि चीन डराने-धमकाने पर उतर आया था। भारत के पक्ष में बोलने पर चीन ने जापान तक को भी धमकाया था। अतंतः, सत्यमेव जयते।
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