बुधवार, 23 अगस्त 2017

तलाक, तलाक,,, तलाक निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार देकर इस पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंधित  कर दिया है। आजादी के 70 बाद ही सही,  अतंत:,  भारत की मुस्लिम महिलाओं को अन्यायपूर्ण सामंती रिवायत से मुक्ति मिल ही गई  । सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 3-2 के बहुमत से तीन बार तलाक कहकर वैवाहिक ंसंबंधों को विच्छेद करने की जुबानी रिवायत गैर-कानूनी बताते हुए इसे तुरंत ख्त्म करने के आदेश  दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट  ने यह भी कहा है कि अगर इस्लामिक देशों  में तीन तलाक पर प्रतिबंध है तो लोकतांत्रिक भारत में क्यों नही? 15 अप्रैल, 2015 को उत्तराखंड की काशीपुर निवासी  शायरा बानो नाम की महिला को उसके पति ने चिठ्ठी में तीन बार तलाक कहकर छोड दिया था। इस पर  शायरा बानो को सामाजिक-आर्थिक के साथ-साथ भारी मानसिक प्रताडना से जूझना पडा था।  शायरा बानो  ने फरवरी  2016 में  तीन तलाक, हलाला और बहु-पत्नी प्रथा  के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट  में याचिका दायर की थी ।  शीर्ष  अदालत ने 11 से 18 मई तक इस मामले में लगातार सुनवाई की थी। शायरा ने अपनी याचिका में कहा था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था का।  शायरा ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि उसमें भी तीन तलाक को गुनाह बताया गया है। तीन तलाक की विवादित रिवायत पर सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग धर्मों से संबंधित पांच जजो की पीठ गठित की थी। सुनवाई करने वाले जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई हैं, आरएफ नरीमन पारसी, अब्ब्दुल नजीर मुस्लिम, यूयू ललित हिंदू और चीफ जस्टिस जेएस खेहर सिख हैं। जस्टिस अब्ब्दुल नजीर ने बहुमत के खिलाफ तीन तलाक पर व्यवस्था दी है। चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने अपने फैसले में कहा है कि सभी राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर  छह महीने के अंदर तीन तलाक पर कानून बनाना चाहिए । एक प्रश्न  अवाम को बार-बार खाए जा रहा है कि अगर पाकिस्तान और सउदी अरब जैसे कट्टर मुस्लिम मुल्कों  में भी तीन तलाक की रिवायत पर प्रतिबंध है, तो भारत में इस सामंती प्रथा को बंद क्यों नहीं किया गया ? इस्लाम की चार विचारधाराओं में हनफी प्रमुख है। भारत में हनफी धारा मानने वालों का बहुमत है और हनफी धारा को मानने वाले मुसलमान तीन बार तलाक को गलत नहीं मानते हैं। हनफी धारा में एक ही सांस में तीन बार तलाक को वैध माना गया है। बाकी तीन धाराओं में अलग अलग समय में कुछ अंतराल के बाद तीन बार तलाक कहने के बाद ही तलाक वैध माना जाता है। इस्लामिक विद्धानों का भी मत है कि एक सांस में तीन बार तलाक कहना कुरान के खिलाफ है। कुरान के सुराह बकरा में एक सांस में तीन बार तलाक को मुकद्दस किताब के खिलाफ बताया गया है। मुस्लिम समाज में हलाला नाम की एक और सामंती प्रथा है। इस प्रथा के तहत अगर कोई आदमी तलाक देने के बाद अपनी पत्नी से फिर निकाह  करना चाहता है तो महिला को किसी दूसरे मर्द  से  शादी करनी पडती है। फिर यह  महिला खुले अथवा तलाक से अलग हो जाने पर अपने पहले पति से निकाह कर सकती है। शायरा ने इस प्रथा को भी सुप्रीम कोर्ट  में चुनौती दी थी। वैसे यह प्रथा अब खत्म होती जा रही है। संवैधामिक पीठ ने हलाला पर कुछ नहीं कहा है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर मुस्लिम समाज और नेताओं की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं।  इससे यही  निष्कर्ष  निकलता है कि मुस्लिम महिलाओं को अभी भी लंबी लडाई लडनी पडेगी। भारत में कानून अथवा अदालती  फैसले का कितना सम्मान किया जाता है, इस सच्चाई को सभी जानते हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही तीन तलाक को गैर-कानूनी  बता चुका है। इसके बावजूद भी तीन तलाक की रिवायत रुकी नहीं है। तथापि,  1986 के  मुस्लिम वूमेन एक्ट ( प्रोटेक्शन  ऑफ राइटस ऑन डाइवोर्स) की तरह तीन तलाक को रोकने के लिए संसद को कानून बनाने की जरुरत है।