शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

विदेश नीति की अग्नि परीक्षा

पाकिस्तान और चीन के बीच की गहरी मित्रता और नई दिल्ली के साथ दोनों के तल्ख संबंध इस समय भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा है। पाकिस्तान चीन से अपनी गहरी दोस्ती पर खूब  इतरा  रहा है और चीन से गहरे संबंधों का हवाला देकर भारत को जब-तब आंखें भी दिखाता है।  पाक सेनाध्यक्ष  जनरल कमर जावेद बाजवा ने गत सोमवार को  कश्मीर  समस्या और न्यूक्लियर सप्लाई (एनएसजी) पर पाकिस्तान का भरपूर साथ देने के लिए चीन का गहरा आभार व्यक्त किया। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री-सेनाध्यक्ष से लेकर आतंकी संगठनों के मुखिया तक सब-के-सब चीन की दोस्ती पर खूब इतराते हैं। चीन भी इस बात का बखूबी फायदा उठा रहा है। संयुक्त  राष्ट्र  समेत पूरी दुनिया जैश  के मुखिया  मसूद अजहर  और लश्कर  के संस्थापक और जमैत-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को आतंकी मानता है मगर चीन है कि खूंखार आतंकियों को भी देशभक्त बताकर भारत के जख्मों पर नमक छिडक रहा है। इस बार भी चीन ने जैश  प्रमुख मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र  में आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव को रोक दिया। मसूद अजहर पठानकोट आतंकी हमले का मुख्य आरोपी है और भारत में सबसे अधिक आतंकी वारदातों के लिए वांछित है। बहरहाल, पाकिस्तान के साथ-साथ इस समय भारत, चीन के साथ भी सिक्क्मि में डोकलाम सीमा विवाद को लेकर युद्ध के मुहाने पर है। 16 जून, 2017 को चीन जब डोंग लांग (डोकलाम) में विवादित जमीन पर सडक बनाने की तैयारी में था, भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया। तब से लगभग साढे तीन सौ भारतीय सैनिक इस क्षेत्र में डटे हुए हैं। चीन इस बात का विरोध कर रहा है और भारत से इस विवादित जमीन से सैनिकों को हटाने के लिए कह रहा है। बुधवार को चीन ने दावा किया कि भारत ने डोकलाम से अपने काफी सैनिक हटा लिए हैं और अब वहां चालीस के करीब ही भारतीय सैनिक हैं। भारत ने चीन के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अभी भी डोकलाम में 350 भारतीय सैनिक पिछले छह सप्ताह से डटे हुए हैं। दो दिन पहले ही चीन ने भारत को फिर धमकी दी थी कि वह डोकलाम से अपने सैनिक हटा ले वरना गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। और भारत ने जब सैनिक नहीं हटाए, चीन ने दुनिया को दिखााने के लिए झूठमूठ कह दिया कि भारत  उसकी धमकी के आगे झुक गया और उसने डोकलाम से अपने सैनिक हटा लिए हैं । दरअसल, चीन इस बार खुद भारत से डरा हुआ है। डोकलाम सीमा विवाद पर भारत ने जिस तरह से कडा रुख अखित्यार कर रखा है और भूटान की संप्रभुता की रक्षा के लिए भुटान का साथ दे रहा है, उससे चीन घबरा गया है। डोकलाम से पीछे हटने का मतलब है चीन की विस्तारवादी भूख के आगे समर्पण कर देना। डोकलाम ट्राईजंक्शन  भारत, चीन और  भूटान के बीच स्थित छोटा सा पठार है। यह क्षेत्र सामरिक दृश्टि से बेहद संवेदनशील है और तिब्बत स्वायत क्षेत्र के यबांग काउंटी और भूटान की हाई घाटी  वैली के करीब स्थित है। डोकलाम तिब्बत को भारत से जोडता है। 1890 में चीन और ब्रिटिश  सरकार के बीच संधि के अनुसार इस क्षेत्र को चीनी व्यापार के लिए खोला गया था।  1988 और 1998 में भूटान और चीन के बीच लिखित समझौते हुए थे कि दोनों देश  डोकलाम में यथास्थिति और शान्ति बनाए रखेंगे। अब चीन का कहना है कि भारत चीन और भूटान के बीच के मामले में खामख्वाह अपनी टांग अडा रहा है। मौजूदा तनावपूर्ण  स्थिति के मद्देनजर  इतन तय है कि चीन इस विवाादित क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को किसी भी सूरत में सहन नहीं करेगा।  अगर डोकलाम विवाद बातचीत से नहीं सुलझा तो संभवतय अक्टूबर-नवंबर में चीन भारत पर हमला कर सकता है। इस बार भारत दो तरफा घिरा हुआ है। भारत इसे कैसे टालता है, मोदी सरकार की विदेश  नीति की यही सबसे बडी अग्नि परीक्षा है।