बुधवार, 30 अगस्त 2017

स्वंयभू बाबा, धर्मभीरु लोग

भारत ने सामाजिक क्षेत्र में भी  वाकई  तरक्की की  है। कुछ  साल पहले तक  पश्चिम  में भारत की छवि “सपेरों“ के देश  वाली हुआ करती थी। और अब भारत को “बाबाओं और स्वयंभू विधाताओं“ के देस  के रुप में जाना जाता है। यह तरक्की ही है। बाबाओं के महलनुमा आश्रम, विशाल  डेरे और “मायावी“ ठिकाने देश  के कोने-कोने में पाए जाते हैंं।  भारत की धर्मभीरु एवं अंधविश्वासी  जनता बरबस इन “स्वंयभू विधाताओं की ओर खींची चली आती है। प्राचीन काल से ही भारत में गुरुओं की आराधना का चलन रहा है। पहले परम  ज्ञानी  ऋषि -मुनि हुआ करते थे और अब विशुद्ध कारोबारी । हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के सर्वेसर्वा गुरमीत राम रहीम का मामला इस बात की ताजा  मिसाल है कि धर्मभीरु भारत के लोगों की आस्था और रूढिवादी भावनाओं पर किस तरह से बिजनेस साम्राज्य खडा किया जाता है। और भक्तों की आस्था को किस तरह जानवरों की तरह कुचला जाता है। खुद को राम रहीम और इंसा बताने वाले इस बाबा के अपने सिनेमा, होटल, स्कूल-कालेज, फार्म हाउसिस, ब्रांड तक हैं। बाबा फिल्मे बनाकर उनमें नायक का किरदार भी निभाता है। उसके पांच करोड से ज्यादा भक्तजन बाबा की इन अदाओं पर जी-जान से इस कद्र फिदा हैं कि उसके “मायावी“ महल मे बहन-बेट्टियों से बलात्कार किए जाने के बावजूद कोई भी अपनी जुबान तक नहीं खोलता। इस तरह  का जघन्य कृत्य करने वाला गुरमीत राम रहीम पहला बाबा नहीं है। बरसों से यह सिलसिला जारी है। स्वंयभू “भगवान“ बापू आसाराम बलात्कार के आरोप में जेल की हवा खा रहे है। बाप तो बाप आसाराम के बेटे नारायण साईं को भी बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है।  हाल ही में केरल के  कोलाम आश्रम में स्वंयभू बाबा हरि स्वामी उर्फ गंगानन्द थिथेपथा पर एक छात्रा से पांच साल तक बलात्कार करने का मामला सामने आया था। मई, 2009 में केरल की एक अदालत ने स्वामी अमृत चैतन्य को तीन नाबालिग लडकियों से बलात्कार करने के संगीन अपराध में सोलह साल की जेल की सजा दी थी। अगस्त, 1997 में तिरुचिरापल्ली की अदालत ने स्वामी परमानंद को नाबालिग लडकियों का यौन  शोषण करने के लिए जेल भेज दिया था। अप्रैल, 2016 में मुंबई की एक अदालत ने बाबा मेंहदी कासिम को चार बहनों से छल-कपट करके बलात्कार करने के आरोप में उमर कैद की सजा सुनाई थी। 2010 में बंगलुरु के निकट एक आश्रम के संचालक स्वामी नित्यानंद पर तमिल नाडु की एक अभिनेत्री के साथ मौज-मस्ती करते हुए पकडा गया था। बहरहाल, इन सब घटनाओं के बावजूद बाबाओं और स्वंयभू विधाताओं पर से  लोगों की आस्था कम नहीं हुई है। और यह सवाल अभी भी प्रासंगिक बना हुआ है कि आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि बदनामी के बावजूद  अनुयायियों को बाबाओं में आस्था टूटती नहीं है। भारत में राजनीतिक और सामााजिक नेतृत्व आम आदमी की सामाजिक-धार्मिक आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए हैं। जात-पात, ऊंच नीच का भेदभाव, आार्थिक समानता और सामाजिक, प्रशासनिक अन्याय से पीडित अवाम को बाबाओं, आश्रमों और डेरों में त्वरित  सामाजिक-आर्थिक न्याय मिलता है और इसी वजह पीडित लोग बाबाओं की शरण में जाते हैं। डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी अभी भी जोर देकर कहते हैं कि “पिता गुरमीत राम रहीम ने उन्हें अच्छी  शिक्षा दी है, रहन-सहन, नैतिक दायित्व सिखाया है और इंसानियत का पाठ पढाया है। डेेरा के अनुयायी गुरमीत राम रहीम को पिता से संबोध्ति करते हैं।  समाज क्या मांगता है, बाबा लोग और धार्मिक गुरु यह बात अच्छी तरह जानते हैं।  स्पष्ट   है कि जो दायित्व राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व को निभाने चाहिए थे, वह आश्रम और डेरे निभा रहे हैं। राजनीतिक नेताओ ने बाबाओं कौ लोकप्रियता को अपनी रजनीतिक स्वार्थ  के लिए खूब भुनाया है और आश्रमों और डेरों ने सियासी नेताओं का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस अपवित्र गठजोड ने सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाया है। डेरा प्रेमियों की हिंसा भी इसी निहित स्वार्थी गठजोड का नतीजा है।