लंबे समय तक अमेरिकी सेना की तैनाती के बावजूद तालिबानी आतंक से जूह रहे अफगानिस्तान में शांति बहाली के दूर-दूर तक कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। लाख कोशिशों के बावजूद अफगानिस्तान में अमन-चैन स्थापित करने के प्रयास सिरे नहीं चढ रहे हैं। तालिबान और पाकिस्तान को अलग-थलग किए बिना अफगानिस्तान में शांति बहाली नही हो सकती और अमेरिका 15 साल की लंबी अवधि में यह नहीं कर पाया है। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी तालिबान को फूटी आंख नहीं सुहाती है। आतंकियों का यह संगठन अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान से वापस बुलाए बिना बातचीत के लिए कतई तैयार नहीं है। अमेरिका किसी भी सूरत से अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने पर राजी नहीं है। वाशिंगटन इस जमीनी सच्चाई से बखूबी परिचित है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के हटते ही तालिबान पाकिस्तान की मदद से फिर तख्ता पलट की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क की भरपूर नदद करके आग में घी डालने का काम कर रहा है। अमेरिका की बार-बार की चेतावनी के बावजूद पाकिस्तान आतंकियों की मदद करने से बाज नहीं आ रहा है। एक तरफ तालिबानी और हक्कानी आतंकियों को उकसा कर, तो दूसरी तरफ कश्मीर में लश्कर और हिजबुल आतंकियों की मदद कर पाकिस्तान क्षेत्र में आतंक का नंगा ताडंव करवा रहा है। यह बात दीगर है कि दूसरों के घर आग लगाते-लगाते पाकिस्तान खुद बुरी तरह से आतंक की आग में झुलस रहा है। अफगानिस्तान में जारी आतंकी संघर्ष में अब तक न तो तालिबान जीत पाया और न ही पाकिस्तान को सामरिक तौर पर जरा भी कोई एडवांटेज मिली है। इसके विपरीत अमेरिका समेत पूरी दुनिया में उसकी छवि काफी खराब हुई है और उसे आतंकी देश का तमगा दिया जा रहा है। 1973 में राजशाही के खत्म होते ही अफगानिस्तान में आतंक, तख्ता पलट और विदेशी सेनाओं का दखल बदस्तूर जारी है। पिछले 15 साल से अफगानिस्तान अमेरिका की मदद से मुल्क में अमन-चैन कायम करके विकास को तेज करने की हर संभव प्रयास कर रहा है। अफगानिस्तान की सरकार कुछ हद तक इसमें सफल भी रही है। मगर अमेरिकी सेना के रहते हुए भी अफगानिस्तान में शांति कायम नहीं हो पाई है। नतीजतन, अगर थोडा-बहुत विकास हो भी रहा है, आतंक की आग में वह भी भस्म हो रहा है। अफगानिस्तान सरकार की यही सबसे बडी विफलता भी है और चुनौती भी। अफगानिस्तान अगर फलता-फूलता है तो इससे पाकिस्तान को तुरंत मिर्जी लग जाती है। और वह अफगानिस्तान में तालिबानी और हक्कानी नेटवर्क को उकसा कर काबुल के प्रयास पर पानी फेरने में लगा हुआ है। पूरी दुनिया को आज भी इस बात पर नजर है कि आखिर अफगानिस्तान समस्या का राजनीतिक हल कब निकल पाएगा? अमेरिका की अफगानिस्तान नीति अब तक तालिबान पर केन्द्रित रही है। अमेरिकी नीतिकारों को लगता था कि तालिबान को हराकर या तालिबानियों को पाकिस्तान में धकेल कर अफगानिस्तान मे शांति बहाल हो जाएगा मगर ऐसा नहीं हुआ है। पाकिस्तान की भरपूर मदद से तालिबान और ज्यादा मजबूत हुआ है। इसीलिए अमेरिका अब पाकिस्तान पर दबाव डाल रहा है कि वह तालिबान की मदद करना बंद करे और अगर ऐसा नहीं करता है तो उसे दी जा रही सैन्य मदद बंद कर दी जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अफगानिस्तन पर नई अमेरिकी नीति की उम्मीद की जा रही है। ट्रप के सलाहकारों का मानना है कि तालिबान को पाकिस्तान मदद को काटे बिना इस आतंकी संगठन का खात्मा मुमकिन नहीं है। अमेरिका की ताजा अफगानिसतान नीति में पाकिस्तान से संचालित तालिबानी कमांडरों को वहां से खदेडने और तालिबान को दी जा रही मदद को बंद करने पर जोर दिया जा रहा है। अमेरिका अब अपगानिस्तान में भारत की और सक्रिय भूमिका पर जोर दे रहा है। भारत को पाकिस्तान के आतंकी चेहरे को पहचानने और नापाक मंसूबों को नेस्तानाबूद करने का ज्यादा अनुभव है।
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