जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेताओं की अथाह संपत्ति को लेकर सनसनीखेज खुलासों से राज्य की अवाम को अब तो सतर्क हो जाना चाहिए। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहां सरेआम राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अलगाववादियों को सरकार पाल-पोस रही हो। अलगाववादी कश्मीरी नेताओं की निष्ठा को लेकर पूरी दुनिया जानती है कि वे खाते भारत का हैं मगर गीत पाकिस्तान के गाते हैं। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं और पाकिस्तानी आतंकियों में जरा भी अंतर नहीं है। सच कहा जाए तो अलगाववादी नेताओं को भी आतंकी ही कहा जाना चाहिए । दोनों मे अंतर बस इतना है कि आतंकियों को केवल पाकिस्तान से ही मदद मिलती है, मगर अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान के साथ-साथ भारत से भी भरपूर मदद मिलती है। कश्मीर घाटी में आजादी के बाद से ही अलगाववाद और पाकिस्तान में विलय के पक्षधरों का तबका सक्रिय रहा है।और समकालीन सरकार ने इन्हें रोकने की बजाए, शह दी है। कश्मीर भारत का एकमात्र मुस्लिम बहुल आबादी वाला राज्य है। इसी पृष्ठभूमि के कारण जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया है। इतना विशेष कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की जगह राज्यपाल शासन लगता है और वहां राज्य विधानमंडल की स्वीकृति के बगैर कोई कानून लागू नहीं होता है। देश के किसी भी अन्य राज्य को ऐसा विशेष दर्जा नहीं मिला है। यह संवैधानिक व्यवस्था कश्मीर के मुस्लिम बहुल आबादी को बरकरार रखने के लिए की गई थी। आजादी के बाद राज्यों के विलय के समय कश्मीर की अवाम को आशंका थी कि हिंदू बहुल राष्ट्र में शामिल होने पर अतोगत्वा कश्मीर भी हिंदू बहुल आबादी वाला राज्य बन जाएगा। राज्य की मुस्लिम अवाम की इस आशंका को दूर करने के लिए संविधान में 35-ए की व्यवस्था की गई थी। इसके तहत कश्मीर में बाहर का आदमी न तो संपति खरीद सकती है और न ही यहां स्थायी तौर पर बस सकता है। 35-ए के तहत राज्य विधानसभा को “स्थायी नागरिकों“ की मिलने वाली सुविधाओं को तय करए का अधिकार भी दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को शुरु से ही इस व्यवस्था पर सख्त ऐतराज रहा है और वह इसका मुखर विरोध करती रही है। यहां तक कि भाजपा की पूर्वज जनसंघ के संस्थापक शयामा प्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 के खिलाफ लडते-लडते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। तब से भाजपा अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने की मांग कर रही है और हर चुनाव में यह उसका प्रमुख मुद्दा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र मे भी इस मुद्दे का उल्लेख था हालांकि इसी साल ( 2014) के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुददे पर चुप्पी साध ली थी। बाद में कुर्सी की खातिर भाजपा ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अलगाववादीयों से बातचीत की प्रबल समर्थक पीडीपी के साथ मिलकर सरकार भी बना ली। कश्मीर में राजनीतिक दलों के परम “सत्ता प्रेम” की वजह से ही राज्य में लोकप्रिय आवाज करीब-करीब मृतप्राय हो चुकी है। बहरहाल, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा का अनुच्छेद 370 विरोध कश्मीरी अवाम को और ज्यादा सशंक्ति कर रहा है। भाजपाइयों द्वारा बार-बार अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने की मांग और हालिया घटनाएं कश्मीर में अलगाववादियों को अवाम को भारत के खिलाफ भडकाने में मददगार हो रही हैं। कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को भी कहना पडा कि अगर 35-ए के साथ छेडछाड की गई तो घाटी में हालात और ज्यादा खराब हो सकते हैं। बहरहाल, कश्मीर के अलगावादी नेताओं को सलाखों के पीछे भेजने से घाटी में कोई खास हलचल नहीं होगी मगर 35-ए और अनुच्छेद 370 के साथ छेडछाड करने के गभीर परिणाम हो सकते हैं।
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