निजता (प्राइवेसी) पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अवाम के लिए बहुत बडी सौगात है। देश की शीर्ष अदालत ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से व्यवस्था दी है कि निजता संविधान के अनुच्छेद के तहत प्रदत जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रतता के अधिकार का अहम हिस्सा है। और निजता के इस संवैधानिक आधार को कोई भी ताकत नागरिक से छीन नहीं सकती है। सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था से मोदी सरकार को झटका लगा है। ष अदालत के ताजा फैसले से यह भी स्पष्ट है कि निजता का अधिकार सरकार की जागीर नहीं है। तथापि, सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि निजता का अधिकार संपूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं है और विशेष परिस्थितियों में राज्य कुछ हद तक इस पर रोक लगा सकता है। सरकार भी यह कह रही है कि निजता के अधिकार को संपूर्ण नही माना जा सकता हालांकि मोदी सरकार निजता को मौलिक अधिकार ही मानती है। सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था से यह भी साफ है कि निजता के अधिकार भले ही संपूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं हैं मगर नागरिक के जीने और व्यक्तिगत स्वत्रंतता के मौलिक अधिकार अपने आप में सम्पूर्ण हैैंं और सरकार नागरिक के इस अधिकार को छीन नहीं सकती। माननीय जजों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जीने और निजी स्वतंत्रता के अधिकार को एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते हैं। ये वे अधिकार् हैं जो मानव के गरिमापूर्ण अस्तित्व के अभिन्न अंग हैं। संविधान में इन्हें बाकायदा मान्यता दी गई है। मानव के जीने के अधिकार में काफी सारी बातें हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में किसी के साथ साझा नहीं किया जा सकता। निजता से जुडी बातें हर आदमी बखूबी जानता है मगर वह दूसरे से साझा नहीं करता। किसी से यह नहीं पूछा जा सकता कि बैडरुम में क्या होता है जबकि यह बात हर बालिग-नाबालिग जानता है। आयकर अधिकारी अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करके किसी बैंक अकांउट को भले ही खंगाल ले, पर खाताधारक से पूछे जाने पर वह इसका जबाव नहीं देगा। परिवार को आगे बढाने, बीवी-बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए जो कुछ भी जरुरी है, वह सब निजता में आता है। निजता के अधिकार का मामला सरकार द्वारा आधार कार्ड को सरकारी स्कीमों का लाभ लेने, बैंक खाता खोलने, पैन कार्ड बनवाने, टिकट बुकिंग और कालेज एडमिषन के प्रबेश तक के लिए अनिवार्य किए जाने से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। देश में एक बडे तबके का मानना है कि सरकार आधार कार्ड की आड मे लोगों की निजता में सेंध लगा रही है। आधार कार्ड के लिए स्थायी घर का पता और उसका प्रमाण अनिवार्य है मगर सरकार आज तक इस बात का संतोषजनक जबाव नहीं दे पाई है कि बेघर लोग किस तरह से यह प्रमाण ला पाएंगे। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साढे चार लाख परिवार बेघर हैं और इनकी जनसंख्या 18 लाख के करीब है। आंकडे यह भी बताते हैं कि बेघरों की आबादी में पिछले छह साल में इजाफा हुआ है। इससे साफ है कि इन बेघर परिवारों का न तो आधार कार्ड बना है और न ही इन्हें सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है जबकि इन लोगों को सरकारी सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत है। बहरहाल, निजता के अधिकार की ताजा व्याख्या से आधार कार्ड की अनिवार्यता, बीफ पर प्रतिबंध और समलैंगिक संबंधों जैसे विवादस्पद मुद्दों पर असर पड सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आधार की अनिवार्यता को खारिज किए जाने के बावजूद सरकार इसे हर तरह की सेवाओं के लिए अनिवार्य करने पर आमादा है। देश में क्या खाए जाए और क्या नहीं, यह भी निजता के अधिकार का मामला है। सरकार का इसमें दखल निजता के अधिकारों का हनन है। भगवा पार्टी प्रत्यक्ष जैसे-तैसे हिंदू ऐजेंडे को अमल में ला रही है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले इसमें अडंगा डाल सकता है।
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