बुधवार, 16 अगस्त 2017

आजादी के 70 साल

आजादी के  70 साल पूरे होने पर हमें आत्म मंथन और आत्म चिंतन करने की जरुरत है। निसंदेह, हमें  पीछे मुडकर देखने की बजाए आगे की ओर देखना चाहिए। लेकिन भारतीय संस्कृति और सभ्यता हमें पुरानी गलतियों से सबक लेकर उन्हें  न दोहराने की सीख भी देती है। तथापि, देश  में  गलती-दर-गलती कर उस पर पर्दा डालने की रिवायत है, गलतियों से सीख लेनी की नहीं। उत्तर प्रदेश  के गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में आक्सीजन न मिलने की वजह से 64 बच्चों की दर्दनाक मौत का मामला इस बात की ताजा मिसाल है। इस समाचार के ब्रेक होते ही उत्तर प्रदेश  सरकार की पहली त्वरित प्रतिक्रिया थी कि राज्य में दिमागी बुखार की महामारी कई सालों से है और अक्सर इससे ऐसी मौतें होती ही रहती है। इससे ज्यादा संवेदनहीनता और क्या हो सकती है? देश  के सबसे बडे राज्य में मासूम बच्चे समय पर आक्सीजन नहीं मिलने से बेमौत मारे जाते हैं मगर सत्ताधारियों की इसकी जरा भी परवाह नही हें। और जो लोग संवेदना जता रहे हैं, उनका मकसद त्रासदी से पीडित परिवारों का द्ख-दर्द बांटने की बजाए सियासी हित साधना कहीं ज्यादा है। दुनिया में अपनी जान से अधिक प्रिय संतान को खोने से बडा और कोई दर्द  नहीं हो सकता। सरकार ने 64 बच्चों की ंमौत के लिए केवल मात्र संबंधित मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को जिम्मेदार माना है। उत्तर प्रदेश  और  बिहार में दिमागी बुखार (इन्सेफाइलेटिस) का सबसे ज्यादा प्रकोप है जबकि साठ के दशक से ही इस महामारी के खिलाफ    अभियान षुरु किया जा चुका था, इसके लिए हर साल करोडों रुपए का बजट आवंटित किया जाता है। उत्तर प्रदेश  का गोरखपुर क्षेत्र दिमागी बुखार के प्रकोप से सबसे अधिक पीडित है। पिछले चार दशको में 20,000 से भी अधिक लोग  इन्सेफाइलेटिस  के कारण मारे जा चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बतौर सांसद बराबर इस समस्या को संसद में उठाते रहे हैं। अगर आजादी के सात दशक बाद भी देश  अपने बच्चों को दिमाग बुखार से सुरक्षित नही कर पाए, तो सात दशक की आजादी की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि अगर सरकार की  वर्षगांठ  पर 3000 करोड रु और योग दिवस पर 500 करोड रु खर्च किए जा सकते हैं तो अस्पताल में जीवनदायक आक्सीजन सप्लाई के लिए साठ-सतहर लाख की पेमेंट की अविलंब व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती? सात दशक की आजादी के बाद इस तरह के और भी कई सवाल हैं। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को अपने भाषण को और अधिक जमीनी बनाने के लिए देशवासियों से कुछ सुझाव मां थे जिनके जवाब में उन्हें लोगों ने उनसे पूछा है कि सरकार ने जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिए चीन की तरह कानून क्यों नहीं बनाया? बेतहाषा बढती जनसंख्या  देष की सबसे ज्वलंत समस्या है। आजादी के सात दषक में भी हम जनसंख्या वृद्धि को रोक नहीं पाए हैं। ताजा आकलन के मुताबिक भारत 2022 में जनसंख्या में चीन से भी आगे निकल जाएगा। प्रधानमंत्री से यह भी पूछा गया है कि देष भ्रश्टाचार से कब मुक्त होगा? विस्फोटक जनसंख्या अगर् देष की प्रगति और खुषाहली को ग्रहण लगा रही है, तो भ्रश्टाचार दीमक की तरह अर्थव्यवस्था को चाट रहा है। आजादी के सात दषक बाद  भी भ्रश्टाचार भयावह रुप से देष के सामने खडा है। बहरहाल, देष ने सात दषकों मे खासी तरक्की की है। भारत स्पेस विज्ञान का लीडर है। दुनिया की पांचवी बडी सैन्य षक्ति है और चीन भी उससे रंजिष करता है।  दुनिया की सबसे तेज बढती अर्थव्यवस्था है और युवातम प्रतिभा वाला सबसे बडा देष। और यह सब सियासी नेताओं के कारण  नहीं, अलबत्ता वैज्ञानिकों, मेहनतकष किसानों, कामगारों, प्रतिभाओं और आम आदमी की बदौलत है। आजादी के 70 साल पर लख-लख बधाईयां।