बेफिक्री और लापरवाही इंसान की फितरत होती है। और कुदरत की बार-बार चेतावनी के बावजूद इससे अनजान बने रहने उसकी सबसे बडी भूल। यही वजह है कि भूकंप को लेकर बार-बार चेताए जाने के बावजूद तबाही के मुहाने पर पहुंचे हिमालय के अधिकांश शहर मजाल है कि अपनी गलतियों से कोई सबक लें। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की राजधानी दिल्ली, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और ”सिटी ब्यूटीफुल“ चंडीगढ समेत 29 शहर भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं। इन शहरों में तीन करोड से भी ज्यादा की आबादी बसती है। भूकंप का तेज झटका आने पर इन शहरों में भारी तबाही हो सकती है। इनमें अधिकांश शहर हिमालयन क्षेत्र में स्थित है। हिमालय को भूकंप की दृष्टि से दुनिया में अति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यह पहली बार नहीं है कि भूकंप को लेकर इस कद्र भयावह चेतावनी दी गई हो। इससे पहले कई बार इस तरह की चेतावनी दी जा चुकी है और भूकंप से भारी तबाही भी हो चुकी है। 25 अप्रैल, 2015 को हिमालय की तलहटी में बसे नेपाल में 8.1 (रिक्टर स्केल) की तीव्रता वाले भूकंप से राजधानी काठमांडू और आसपास के कई क्षेत्रों में भारी तबाही हुई थी। इसमें 9000 से अधिक लोग मारे गए और 22000 के करीब गंभीर रुप से जख्मी हुए थे। इस भूकंप के झटके भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी महसूस किए गए थे और इन देशों मे दो सौ से अधिक लोग मारे गए थे। भूकंप से काठमांडू स्थित विश्व धरोहर 18वीं शताब्दी की धरहरा मीनार पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। बहरहाल, उन्नत प्रोद्योगिकी और विज्ञान के जमाने में भी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। दुनिया में हर रोज 50 से 55 और लगभग बीस हजार सालाना भूकंप आते हैं । इनमें साल में एक-आध की ही तीव्रता आठ से ज्यादा होती है। साल में 15 के लगभग भूकंपों की तीव्रता 7 और 7.9 के बीच रहती है। जनवरी, 2001 मे गुजरात में 7.7 तीव्रता वाले भूकंप में बीस हजार से अधिक लोग मारे गए थे और कई शहर ध्वस्त हो गए थे। आठ से अधिक तीव्रता वाला भूकंप तो 7 और 7.9 तीव्रता वाले से तीस गुना अधिक शक्तिशाली होता है। अधिकाश भूकंप की तीव्रता 2 से 2.9 के बीच रहती है। इसीलिए दुनिया सही-सलामत बची हुई है। वैज्ञानिकों का भी मानना है कि कम तीव्रता वाले भूकंप यूनाटेडिट स्टेट्स जियोजिक्ल सर्वे की नजरों से भी छूट जाते हैं। अनुमानत, साल में 2 से 2.9 तीव्रता वाले 13 लाख भूंकप आते हैं। भूकंप निरंतर भूगर्भीय प्रकिया है और धरती की संरचना का अभिन्न हिस्सा है। पूरी धरती बारह टैक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है और उसके नीचे तरल पदार्थ लावा है। टैक्टोनिक प्लेटें इसी लावे पर तैर रहीं हैं और इनके टकराने से जो उर्जा रिलीज होती है, उसके कारण भूकंप आते है। इन्हें किसी भी सूरत में टाला नहीं जा सकता। लेकिन भूकंप से जानमाल के नुकसान को जरुर टाला जा सकता है। और इसके लिए भूकंप-रोधी भवन निर्माण तकनीक अपनाने की जरुरत है। बेतरतीब निर्माण, कमजोर बुनियादी ढांचा और आर्किटेक्चर खामियों के कारण नेपाल और गुजरात के भूकंप से ज्यादा नुकसान हुआ था। हिमालय की तलहटियों में बसी आबादी के लिए भूकंप रोधी भवन निर्माण की दरकार है। पुराने जमाने में हिमालय के क्षेत्रों में धज्जी शैली वाले भवनों का निर्माण किया जाता है। भूकंप आने पर धज्जी शैली में बने भवन आसानी से ध्वस्त नहीं होते थे और अगर ढहते भी तो बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होता था क्योंकि इनमें प्रत्युक्त साम्रगी हल्की होती थी। आधुनिक कंकरीट भवन निर्माण शैली में ईंट, सीमेंट और सरिये का इस्तेमाल किया जाता है और यह अपेक्षाकृत भारी होता है। भूकंप रोधी भवन निर्माण की इस प्राकृतिक कहर से बचने का एकमात्र विकल्प है। पुराने भवनों को भी रेट्रोफिटिंग से भूकंप रोधी बनाया जा सकता है।
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