अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के शिया मुस्लिम सेंट्रल वक्फ बोर्ड का सुझाव काबिलेगौर है। इसी सप्ताह 11 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई होनी है। शिया वक्फ बोर्ड ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करते हुए सुझाव दिया है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को विवादित 2.77 एकड स्थल से हटकर किसी मुस्लिम बहुल आबादी वाले स्थान पर बनाया जा सकता है। बोर्ड के अनुसार 70 साल से दो समुदायों के बीच जारी विवाद का यही एकमात्र सर्वमान्य हल हो सकता है। बोर्ड ने अयोध्या विवाद के अविलंब सर्वमान्य हल के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवा निवृत जज की अगुवाई में हाई-पॉवर्ड न्यायिक-राजनीतिक पैनल गठित करने का सुझाव दिया है। इसके अलावा बोर्ड का कहना है कि मामले के सर्वमान्य हल के लिए एक कमेटी का गठन भी किया जाए। इस कमेटी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मामले की सुनवाई कर चुके दो सेवानिवृत जज, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री का नुमाइंदा और संबंधित पक्षों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट इन सुझावों को 11 अगस्त से मामले की सुनवाई करने वाली तीन सदस्यीय बेंच के हवाले कर सकता है। शिया वक्फ बोर्ड के ताजा स्टैंड से अयोध्या विवाद के सर्वमान्य हल की उम्मीद की जा सकती है मगर प्रतिद्धंद्धी सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड शिया बोर्ड के इस सुझाव से सहमत होगा, इस पर संदेह है। सतही तौर पर शिया वक्फ बोर्ड के सुझाव प्रतिद्धंद्धी सुन्नी मुस्लिम समुदाय को घेरने की रणनीति नजर आ रही है। शिया बोर्ड ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की चुटकी लेते हुए अदालत से आग्रह किया है कि “कठमुल्लों, धार्मिक उन्मादों और शांतिपूर्ण सर्वमान्य हल के “कट्टर दुश्मन “ प्रतिद्धंद्धी सुन्नी वक्फ बोर्ड को मामले से बाहर रखा जाए। भारत में सुन्नी मुसलमानों की आबादी शिया से कहीं ज्यादा है और बाबरी मस्जिद समेत अधिकांश मस्जिदों पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का ही आधिपत्य है। तथापि, पहली बार देश में किसी धार्मिक संगठन ने विवादित मामले को हल करने के लिए विचारणीय सुझाव दिए हैं। सुन्नी बोर्ड के लिए भी इन सुझावों की काट करना आसान नहीं होगा। मगर मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित जमीन का हकदार बताया है, इस स्थिति में सुन्नी वक्फ बोर्ड को दरकिनार भी नहीं किया जा सकता। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मामला 2010 से सुप्रीम कोर्ट में है। सितंबर, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड जमीन को राम लला, निर्मोही अखाडा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर हिस्सों में बांटा था। इस फैसले से शिया बोर्ड को जबरदस्त धक्का लगा था। 1945 से शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बाबरी मस्जिद के स्वामित्व को लेकर अदालती लडाई जारी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद शिया वक्फ बोर्ड का बाबरी मस्जिद पर दावा खारिज हो चुका है मगर शिया बोर्ड ने अन्य संबंधित पक्षों के साथ उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ फौरन सुप्रीम कोर्ट की शरण में चले गए। तब से इस मामले की सुनवाई लटक-लटक कर चल रही है। पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए 11 अगस्त निर्धारित की है। बहरहाल, कोई भी पक्ष विवादित जमीन से अपना हक छोडने को तैयार नहीं है और राम मंदिर और मस्जिद साथ-साथ बन नहीं सकती। शिया वक्फ बोर्ड की इस दलील में वजन है कि मस्जिद और मंदिर के साथ-साथ बनाए जाने से दोनो समुदायों को खासी परेशानी हो सकती है। शिया बोर्ड ने सर्वमान्य हल की दिशा में सकारात्मक सुझाव दिए हैं बशर्ते अन्य संबंधित पक्ष भी इसी तरह अपना अडियल रवैया त्यागकर एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें। अयोध्या में विवादित भूखंड को लेकर अदालत के बाहर संबंधित पक्षों के बीच समझौता ही एकमात्र सर्वमान्य हल हो सकता है। धार्मिक विवाद सर्वमान्य हल से ही सुलझाए सकते हैं।
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