लोकतंत्र में जनमानस का भारी दबाव अक्सर काम कर ही जाता है। दिसंबर 2012 में देश की राजधानी दिल्ली में “निर्भय“ सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। तब जनमानस के दबाव का ही असर था कि मनमोहन सिंह सरकार को प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ओफ्फेंसस एक्ट में बदलाव करना पडा था। संशोधित एक्ट के तहत स्वेच्छिक संभोग की आयु 16 से बढाकर 18 साल की गई थी। और जनमानस के दबाव का ही असर था कि मोदी सरकार ने 2014 में लोकसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पेश किया और इस साल मई में इसे पारित भी कर दिया। राज्यसभा द्वारा संशोधित बिल को पारित नहीं किए जाने से यह कानून नहीं बन पाया है। अगर संशोधित जुवेनाइल बिल संसद से पारित हो जाता, तो निर्भय के जुवेनाइल बलात्कारी को भी अन्य बलात्कारियों की तरह कडी सजा मिलती। संशोधित जुवेनाइल जस्टिस बिल (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) के तहत 16 से 18 साल के यौन उत्पीडन आरोपियों को भी व्यस्क की तरह मुकदमा चलाने की व्यवस्था की गई है। दिल्ली “निर्भय“ सामूहिक बलात्कार कांड के बाद ही जुवेनाइल कानून में संशोधन की जरुरत महसूस हुई थी। दरअसल, निर्भय के छह बहशी बलात्कारियों में एक नाबालिग भी था। छह में से चार बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। पांचवे ने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। मगर छठा आरोपी अभी 18 साल से कम था, इसलिए उस पर अलग से जुवेनाइल कानून के तहत मुकदमा चलाया गया। जुवेनाइल कोर्ट ने नाबालिग बलात्कारी को तीन साल तक रिमांड होम में रखने की सजा दी। जनमानस का कहना है कि यह भी कोई न्याय हुआ। नाबालिग को करीब-करीब माफी और बाकियों को मौत की सजा? इस रविवार को युवा बलात्कारी रिमांड होम से बाहर आकर आजाद हो गया है। निर्भय के युवा बलात्कारी की रिहाई और मामूली सजा से पूरा देश , खासकर महिलाएं उबली हुई हैं और दिल्ली में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। दिल्ली महिला आयोग ने युवा बलात्कारी की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी दस्तक दी। मगर देश की सर्वोच्च अदालत ने यह कहकर अपना पल्लू झाड लिया कि “ न्यायालय के “हाथ बंधे हुए हैं“। वस्तुस्थिति भी यही है। न्यायपालिका कानून नहीं बनाती, अलबत्ता कानून की व्याख्या करके और उस पर अमल करवाकर उसकी रक्षा करती है। कानून बनाना सांसदों और विधायकों का काम है और अगर देश की बेट्टियों के बलात्कारी मामूली सी सजा पाकर छूट जाते हैं, तो इसके लिए वे दोषी हैं, न्यायपालिका नहीं। बहरहाल, ”निर्भय” के युवा बलात्कारी की रिहाई से उद्धेलित जनमानस के दबाव पर मंगलवार को राज्यसभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल 2015 पर चर्चा की और इस बिल को पारित भी कर दिया । देश का जनमानस भी यही चाहता है कि बलात्कारी, नाबालिग ही क्यों न हो, उसे कडी से कडी सजा दी जानी चाहिए। कानून अगर अव्यस्क बलात्कारियों से सख्ती नहीं बरतता है तो देश की बेट्टियों की अस्मत सरेआम लूटती रहेगी। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि यौन उत्पीडन करने वालों में 50 फीसदी अव्यस्क होते हैं और वे वस्तुस्थिति से बखूबी वाकिफ होते हैं कि कानून उन्हें इस अपराध के लिए कडी सजा नहीं देता। तथापि, बिल में 16 से 18 साल के यौन उत्पीडन आरोपियों को व्यस्क की तरह मुकदमा चलाने के प्रावधान पर सहमति नहीं है। विधि वेताओं को इस बात पर ऐतराज है कि पहली बार किसी देश में “जुडिशल वेवर“ की अवधारणा को लागू किया जा रहा है। इसे कानून सम्मत नहीं माना जा सकता। देश के चिल्ड्रन राइटस और वुमेन राइट्स एक्टिविस्ट भी प सशोधित कानून को प्रतिगामी (रेग्रेसिसव) कदम बता रहे हैं। विधि विशेयज्ञों का यह भी कहना है कि निर्भय सामूहिक बलात्कार कांड के बाद की घटनाएं विशुद्ध मीडिया की उपज है। सभ्य और सुसंस्कृति समाज अपने कानून को सुविधा अनुसार नहीं बनाता। निष्कर्ष यह है कि बाल यौन अपराधियों से कैसे निपटा जाए, इस पर अभी तक आम सहमति तक नहीं बन पाई थी मगर निर्भय के युवा बलात्कारी की रिहाई ने सांसदों को एकजुट कर दिया है और राज्यसभा ने मंगलवार को ध्वनि मत से बिल पारित भी कर दिया।
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