चेन्नई पर प्राकृतिक कहर
तमिल नाडु की राजधानी चेनई में सोमवार से जारी बरसात ने हमें फिर सचेत किया है कि कुदरत के बनाए नियम- कायदों को तोडने के किस कद्र गंभीर परिणाम हो सकते हैं। चेन्नई में हो रही इस बार की बारिश ने पिछले सौ साल के रिकार्ड तोड दिए हैं। पिछले माह भी बरसात ने चेन्नई समेत तमिल नाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी और जन-जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। अभी चेन्नई इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि मौसम की ताजा मार ने लोगों की पीडा और कष्ट को और ज्यादा बढा दिया है। राजधानी के अधिकांश क्षेत्र जलमग्न है। बिजली और पेयजल व्यवस्था चरमर्रा गई है। खाने-पीने की चीजों की भारी किल्लत है क्योंकि अधिकतर व्यापारिक प्रतिष्ठान , दुकानें और फल-सब्जी विक्रेता बाढ की चपेट में आ चुके है। यातायात व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प है, न बसें, टैक्सियां अथवा ऑटो-रिक्षा चल रहें, न ही रेलगाडियां। और-तो- और एयरपोर्ट के बाढग्रस्त हो जाने के कारण हवाई सेवाएं भी बंद है। लोगों को स्मरण नहीं है कि अपने जीवन में उन्होंने चेन्नई में बरसात का इस कद्र कहर झेला हो। सौ साल पहले कभी ऐसी बारिश हुई होगी मगर ऐसा चेन्नईवासियों ने सिर्फ बुजुर्गों से सुना या किताबों में पढा था। मौसम विभाग का आकलन है कि अगले एक सप्ताह तक बरसात जारी रह सकती है। इस स्थिति में स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि तटवर्ती होने की वजह से राज्य की जमीन पानी कम सोखती है। लगातार बारिश होने से चेन्नई में जमीन सुपर-सेचुरेटिड हो गई है और इस कारण शहर से निकलने वाले नदी-नालों में पानी उल्टा चढने लग पडा है। निकासी की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से पानी दूसरी और तीसरी, फिर चौथी मंजिल तक चढ सकता है। चेन्नई के ताजा हालात ने सितंबर 2014 में बाढग्रसत श्रीनगर, जुलाई 2005 में पानी में डूबी मायानगरी मुंबई और जून, 2013 में उत्तराखंड की त्रासदी की याद तरोताजा कर दी है। यानी कुदरत का कहर कश्मीर से कन्याकुमारी और उतर से पश्चिम तक बराबर जारी है। भारत में मानसूनी बरसात दो बार सक्रिय होती है। एक बार जून से सितंबर और फिर अक्टूबर से नवंबर में। अमूमन, दक्षिण भारत में अक्टूबर-नवंबर में मानसून सक्रिय होती है। अक्टूबर में साउथ-वेस्ट हवाओं का रुख दक्षिण की ओर बहने से तमिल नाडु, आंध्र प्रदेष और पुडुचेरी में भारी पानी बरसता है मगर इतना नहीं जितना इस बार बरस रहा है। मौसम विभाग ने एक माह पहले ही चेता दिया था कि इस बार दक्षिण की बरसात भारी तबाही मचा सकती है मगर सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। देश की सबसे बडी त्रासदी भी यही है। समकालीन सरकारें जनहित के मामलों पर केन्द्रित होने की बजाय राजनीतिक तिगडमें भिडाने और वोट की राजनीति को ज्यादा अहमियत देतीे हैं। देश पर कई बार कुदरत का कहर बरप चुका है। मगर न तो उत्तराखंड से, न ही 2005 की मुंबई बाढ और न ही कश्मीर त्रासदी से केन्द्र और राज्यों की सरकार ने कोई सबक सीखा है। पर्यावरण शास्त्री भी हमें बराबर चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण मानव को अत्याधिक बारिश और सूखे की असामान्य स्थिति का सामना करना पड सकता है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी इन दिनों दुनिया भर से 50,000 के करीब विषेज्ञय जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर माथा-पच्ची कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के अलावा बेेहिसाब बढती आबादी के कारण भारत में शहरों और कस्बों का बेतरतीब फैलाव भी बाढ की समस्या को और जटिल करती है। अधिकांश महानगरों, शहरों और कस्बों में पानी निकास की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। और अगर कहीं है भी तो रख-रखाव नईं होने से यह समय आने पर चरमर्रा जाती है। इस स्थिति में असामान्य बरसात पडने पर अधिकांश शहर बाढग्रस्त हो जाते हैं। माना की मौसम की अति को टालना मानव के वश में नहीं है, मगर इससे बचने के सुरक्षित उपाय तो किए जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी बनाने की बडी-बड़ी बातें म बेमानी लगती हैं अगर हम घर में ही सुरक्षित न रह पाए।
तमिल नाडु की राजधानी चेनई में सोमवार से जारी बरसात ने हमें फिर सचेत किया है कि कुदरत के बनाए नियम- कायदों को तोडने के किस कद्र गंभीर परिणाम हो सकते हैं। चेन्नई में हो रही इस बार की बारिश ने पिछले सौ साल के रिकार्ड तोड दिए हैं। पिछले माह भी बरसात ने चेन्नई समेत तमिल नाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी और जन-जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। अभी चेन्नई इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि मौसम की ताजा मार ने लोगों की पीडा और कष्ट को और ज्यादा बढा दिया है। राजधानी के अधिकांश क्षेत्र जलमग्न है। बिजली और पेयजल व्यवस्था चरमर्रा गई है। खाने-पीने की चीजों की भारी किल्लत है क्योंकि अधिकतर व्यापारिक प्रतिष्ठान , दुकानें और फल-सब्जी विक्रेता बाढ की चपेट में आ चुके है। यातायात व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प है, न बसें, टैक्सियां अथवा ऑटो-रिक्षा चल रहें, न ही रेलगाडियां। और-तो- और एयरपोर्ट के बाढग्रस्त हो जाने के कारण हवाई सेवाएं भी बंद है। लोगों को स्मरण नहीं है कि अपने जीवन में उन्होंने चेन्नई में बरसात का इस कद्र कहर झेला हो। सौ साल पहले कभी ऐसी बारिश हुई होगी मगर ऐसा चेन्नईवासियों ने सिर्फ बुजुर्गों से सुना या किताबों में पढा था। मौसम विभाग का आकलन है कि अगले एक सप्ताह तक बरसात जारी रह सकती है। इस स्थिति में स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि तटवर्ती होने की वजह से राज्य की जमीन पानी कम सोखती है। लगातार बारिश होने से चेन्नई में जमीन सुपर-सेचुरेटिड हो गई है और इस कारण शहर से निकलने वाले नदी-नालों में पानी उल्टा चढने लग पडा है। निकासी की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से पानी दूसरी और तीसरी, फिर चौथी मंजिल तक चढ सकता है। चेन्नई के ताजा हालात ने सितंबर 2014 में बाढग्रसत श्रीनगर, जुलाई 2005 में पानी में डूबी मायानगरी मुंबई और जून, 2013 में उत्तराखंड की त्रासदी की याद तरोताजा कर दी है। यानी कुदरत का कहर कश्मीर से कन्याकुमारी और उतर से पश्चिम तक बराबर जारी है। भारत में मानसूनी बरसात दो बार सक्रिय होती है। एक बार जून से सितंबर और फिर अक्टूबर से नवंबर में। अमूमन, दक्षिण भारत में अक्टूबर-नवंबर में मानसून सक्रिय होती है। अक्टूबर में साउथ-वेस्ट हवाओं का रुख दक्षिण की ओर बहने से तमिल नाडु, आंध्र प्रदेष और पुडुचेरी में भारी पानी बरसता है मगर इतना नहीं जितना इस बार बरस रहा है। मौसम विभाग ने एक माह पहले ही चेता दिया था कि इस बार दक्षिण की बरसात भारी तबाही मचा सकती है मगर सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। देश की सबसे बडी त्रासदी भी यही है। समकालीन सरकारें जनहित के मामलों पर केन्द्रित होने की बजाय राजनीतिक तिगडमें भिडाने और वोट की राजनीति को ज्यादा अहमियत देतीे हैं। देश पर कई बार कुदरत का कहर बरप चुका है। मगर न तो उत्तराखंड से, न ही 2005 की मुंबई बाढ और न ही कश्मीर त्रासदी से केन्द्र और राज्यों की सरकार ने कोई सबक सीखा है। पर्यावरण शास्त्री भी हमें बराबर चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण मानव को अत्याधिक बारिश और सूखे की असामान्य स्थिति का सामना करना पड सकता है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी इन दिनों दुनिया भर से 50,000 के करीब विषेज्ञय जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर माथा-पच्ची कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के अलावा बेेहिसाब बढती आबादी के कारण भारत में शहरों और कस्बों का बेतरतीब फैलाव भी बाढ की समस्या को और जटिल करती है। अधिकांश महानगरों, शहरों और कस्बों में पानी निकास की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। और अगर कहीं है भी तो रख-रखाव नईं होने से यह समय आने पर चरमर्रा जाती है। इस स्थिति में असामान्य बरसात पडने पर अधिकांश शहर बाढग्रस्त हो जाते हैं। माना की मौसम की अति को टालना मानव के वश में नहीं है, मगर इससे बचने के सुरक्षित उपाय तो किए जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी बनाने की बडी-बड़ी बातें म बेमानी लगती हैं अगर हम घर में ही सुरक्षित न रह पाए।






