केजरीवाल का जनलोकपाल
दिल्ली में सतारूढ आम आदमी पार्टी सरकार के जनलोकपाल बिल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने ही पुराने साथियों का जबरदस्त विरोध झेलना पड रहा है। भाजपा और कांग्रेस तो “आप“ सरकार के जनलोकपाल बिल को पहले ही खारिज कर चुकी हैं। अन्ना हजारे के नेतृत्व में लडे गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे-से- कंधा मिलाकर चलने वाले प्रशांत भूषण ने दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल को “जोकपाल“ बिल बताया है। 2011 में अन्ना हजारे ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संसद में पेश लोकपाल बिल को “जोकपाल“ करार दिया था। 2011 में जनलोकपाल बिल का प्रारुप तैयार करने में प्रशांत भूषणऔर उनके पिता पूर्व मंत्री शांति भूषण की अग्रणी भूमिका रही थी। इस बात का ख्याल करते हुए प्रशांत भूषण के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वस्तुतः शांति भूषण को “लोकपाल बिल“ की परिकल्पना का आर्किटेक्ट माना जा सकता है। 1968 में शांति भूषण ने ही पहली बार लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया था और 1969 में चौथी लोकसभा ने इसे पारित भी किया था। मगर इससे पहले कि बिल को राज्यसभा द्वारा पारित किया जाता, लोकसभा को भंग कर दिया गया और यह बिल लैप्स हो गया। तब से 2013 तक लोकपाल बिल 11 बार संसद में पेश किया गया मगर अततः 17 दिसंबर 2013 को राज्यसभा और 18 दिसंबर को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। जनवरी 2014 में बिल को राष्ट्रपति स्वीकृति मिलने पर 16 जनवरी 2014 से देश में लोकपाल अस्तित्व में तो आ गया है मगर इसकी नियुक्ति आज तक नहीं हो पाई है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा विधान सभा में पेश जनलोकपाल बिल लोकपाल बिल से काफी अलग है। संसद द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त बिल से क्योंकि आम आदमी पार्टी संतुष्ट नहीं थी, इसलिए अरविंद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में अलग से बिल पेष किया है। दिल्ली से पहले उतराखंड में भाजपा सरकार जन लोकपाल की तर्ज पर 2011 मे लोकायुक्त बिल को अमली जामा पहना चुकी है। और इस राज्य में लोकायुक्त काम भी कर रहा है मगर अभी तक भ्रष्टाचार से संबंधित कोई बडा मामला सामने नहीं आया है। दिल्ली में आप सरकार का जनलोकपाल बिल भी उतराखंड की तर्ज पर बनाया गया है। उतराखंड की भाजपा सरकार के इस बिल की टीम अन्ना ने काफी तारीफ भी की थी मगर दिल्ली सरकार ने इसमें भी कुछ बदलाव किए हैं। प्रशांत भूषण का कहना है कि दिल्ली का जनलोकपाल बिल तो उतराखंड से भी बदतर है। अरविंद केजरीवाल ने जानबूझकर जनलोकपाल को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा है। दिल्ली के जनलोकपाल के पास जांच के लिए स्वायत संस्था का भी प्रावधान नहीं है। इससे जनलोकपाल को सरकार की जांच एजेंसी पर निर्भर रहना पडेगा। प्रशांत भूषण के मुताबिक कहने को जनलोकपाल की नियुक्ति में सरकार का कोई दखल नहीं होगा मगर तीनों चयनकर्ता चूंकि सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, इसलिए दिखावा किया जा रहा है। दरअसल, विवाद इस बात को लेकर है कि दिल्ली जनलोकपाल बिल उतराखंड लोकायुक्त बिल से भी कमजोर है जबकि अरविंद केजरीवाल से इससे भी ज्यादा ताकतवर जनलोकपाल की उम्मीद की जा रही थी। नवंबर 2011 में बतौर टीम अन्ना सदस्य अरविंद केजरीवाल ने उतराखंड में लोकायुक्त बिल पारित किए जाने पर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की यह कहकर चुटकी ली थी कि अगर केन्द्र का लोकपाल बिल राज्य से कमजोर हुआ तो इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। अब यही बात दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल पर भी लागू होती है। केन्द्र सरकार को अगर लगता है कि दिल्ली में जनलोकपाल उसके लोकपाल से कमतर है तो इसे अस्वीकार भी किया जा सकता है। दिल्ली के जनलोकपाल बिल को उपराज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी। उपराज्यपाल वही करेंगे जो मोदी सरकार कहेगी। बहरहाल, दिल्ली में जनलोकपाल के अस्तित्व में आने से पहले ही विवादाग्रस्त होना शुभ संकेत नहीं हैं।
दिल्ली में सतारूढ आम आदमी पार्टी सरकार के जनलोकपाल बिल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने ही पुराने साथियों का जबरदस्त विरोध झेलना पड रहा है। भाजपा और कांग्रेस तो “आप“ सरकार के जनलोकपाल बिल को पहले ही खारिज कर चुकी हैं। अन्ना हजारे के नेतृत्व में लडे गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे-से- कंधा मिलाकर चलने वाले प्रशांत भूषण ने दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल को “जोकपाल“ बिल बताया है। 2011 में अन्ना हजारे ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संसद में पेश लोकपाल बिल को “जोकपाल“ करार दिया था। 2011 में जनलोकपाल बिल का प्रारुप तैयार करने में प्रशांत भूषणऔर उनके पिता पूर्व मंत्री शांति भूषण की अग्रणी भूमिका रही थी। इस बात का ख्याल करते हुए प्रशांत भूषण के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वस्तुतः शांति भूषण को “लोकपाल बिल“ की परिकल्पना का आर्किटेक्ट माना जा सकता है। 1968 में शांति भूषण ने ही पहली बार लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया था और 1969 में चौथी लोकसभा ने इसे पारित भी किया था। मगर इससे पहले कि बिल को राज्यसभा द्वारा पारित किया जाता, लोकसभा को भंग कर दिया गया और यह बिल लैप्स हो गया। तब से 2013 तक लोकपाल बिल 11 बार संसद में पेश किया गया मगर अततः 17 दिसंबर 2013 को राज्यसभा और 18 दिसंबर को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। जनवरी 2014 में बिल को राष्ट्रपति स्वीकृति मिलने पर 16 जनवरी 2014 से देश में लोकपाल अस्तित्व में तो आ गया है मगर इसकी नियुक्ति आज तक नहीं हो पाई है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा विधान सभा में पेश जनलोकपाल बिल लोकपाल बिल से काफी अलग है। संसद द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त बिल से क्योंकि आम आदमी पार्टी संतुष्ट नहीं थी, इसलिए अरविंद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में अलग से बिल पेष किया है। दिल्ली से पहले उतराखंड में भाजपा सरकार जन लोकपाल की तर्ज पर 2011 मे लोकायुक्त बिल को अमली जामा पहना चुकी है। और इस राज्य में लोकायुक्त काम भी कर रहा है मगर अभी तक भ्रष्टाचार से संबंधित कोई बडा मामला सामने नहीं आया है। दिल्ली में आप सरकार का जनलोकपाल बिल भी उतराखंड की तर्ज पर बनाया गया है। उतराखंड की भाजपा सरकार के इस बिल की टीम अन्ना ने काफी तारीफ भी की थी मगर दिल्ली सरकार ने इसमें भी कुछ बदलाव किए हैं। प्रशांत भूषण का कहना है कि दिल्ली का जनलोकपाल बिल तो उतराखंड से भी बदतर है। अरविंद केजरीवाल ने जानबूझकर जनलोकपाल को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा है। दिल्ली के जनलोकपाल के पास जांच के लिए स्वायत संस्था का भी प्रावधान नहीं है। इससे जनलोकपाल को सरकार की जांच एजेंसी पर निर्भर रहना पडेगा। प्रशांत भूषण के मुताबिक कहने को जनलोकपाल की नियुक्ति में सरकार का कोई दखल नहीं होगा मगर तीनों चयनकर्ता चूंकि सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, इसलिए दिखावा किया जा रहा है। दरअसल, विवाद इस बात को लेकर है कि दिल्ली जनलोकपाल बिल उतराखंड लोकायुक्त बिल से भी कमजोर है जबकि अरविंद केजरीवाल से इससे भी ज्यादा ताकतवर जनलोकपाल की उम्मीद की जा रही थी। नवंबर 2011 में बतौर टीम अन्ना सदस्य अरविंद केजरीवाल ने उतराखंड में लोकायुक्त बिल पारित किए जाने पर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की यह कहकर चुटकी ली थी कि अगर केन्द्र का लोकपाल बिल राज्य से कमजोर हुआ तो इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। अब यही बात दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल पर भी लागू होती है। केन्द्र सरकार को अगर लगता है कि दिल्ली में जनलोकपाल उसके लोकपाल से कमतर है तो इसे अस्वीकार भी किया जा सकता है। दिल्ली के जनलोकपाल बिल को उपराज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी। उपराज्यपाल वही करेंगे जो मोदी सरकार कहेगी। बहरहाल, दिल्ली में जनलोकपाल के अस्तित्व में आने से पहले ही विवादाग्रस्त होना शुभ संकेत नहीं हैं।






