मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

Stop Deriving Political Mileage Out Of Every Tragedy

                                               हर मामले में सियासत बंद होनी चाहिए 

दिल्ली की  शकुर बस्ती में अतिक्रमण हटाने के मामले में भी सियासी दलों द्वारा “राजनीतिक रोटियां“ सेंकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। समकालीन राजनीतिक दलों को तो जैसे हर छोटे-बडे मामले को सियासी रंगत देने की लत पड गई हो। शनिवार रात पश्चिम  दिल्ली की शकूर बस्ती में अवैध झुग्गियों को हटाने के दौरान एक बच्ची की मौत हो गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसके लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया है।  रेलवे का स्पष्टीकरण  है कि बच्ची की मौत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई  शुरु करने से  दो घंटे पहले ही हो गई थी। मगर पोस्ट-मॉर्टम  रिपोर्ट साफ़  बताती है कि  बच्ची की मौत अतिक्रमण कार्रवाई के बाद हुई है ।केजरीवाल ने इस बात पर दुख जताया है कि भीषण  सर्दी में देर रात को अतिक्रमण हटाए गए। यह अमानवीय कार्रवाई है। हाई कोर्ट ने भी इसकी  निंदा की है।सारी रात 2000 परिवार खुले आसमान के नीचे सर्दी में ठिठुरते रहे। रेलवे को बच्चों पर भी तरस नहीं आया। केजरीवाल ने पीडितों को समय पर खाने-पीने की वस्तुएं मुहैया नहीं कराने में विफल रहने पर दो एसडीएम समेत तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। सोमवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के बीच इस घटना को लेकर वाक युद्ध जारी रहा। इस बार भी राहुल गांधी दौडे-दोडे शकुर बस्ती पहुंचे और इस घटना के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराया। राहुल का आरोप था कि झुग्गियां गिराने में दिल्ली सरकार की भी भूमिका रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष के आरोप से तिलमिलाए मुख्यमंत्री केजरीवाल ने राहुल गांधी को “ राजनीति में बच्चा (किड) तक कह डाला। हमेशा  की तरह, इस बार भी मूल मुद्दा दरकिनार कर सभी राजनीतिक दल पीडितों की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं। सोमवार को संसद में भी यह मामला उठाया गया और इस पर हंगामा भी हुआ। केन्द्रीय मंत्री वैंकेया नाडु ने भी संसद में माना कि अतिक्रमण हटाने के लिए गलत समय चुना गया। सर्दी में हजारों लोगों को बेघर करना कोई जनहित कार्रवाई नहीं है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी राजनीतिक जमीन पक्की करने के लिए हर घटना पर पीडितों का दुख-दर्द  (?) बांटने सबसे पहले पहुंच जाते हैं। शकुर बस्ती के पीडित परिवारों के समक्ष राहुल दहाडे “ जब कभी कोई स्लम  बस्ती तोडी जाए, मेरे पास आ जाइएगा, तोडने नहीं दूंगा“। इससे पता चलता है कि देश  के समकालीन नेता “वोट बैंक“ पक्का करने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की झुग्गियों में खासी पैठ है, इसलिए पार्टी को पीडितों की ज्यादा चिंता सता रही है। एक जमाने में झुग्गी-झोपड बस्ती वाले कांग्रेस के पक्के वोटर हुआ करते थे मगर “ आम आदमी पार्टी“ के उदय के बाद कांग्रेस का यह जनाधार भी खिसक गया। इसी बात के दृष्टिगत  राहुल गांधी शकुर बस्ती गए और वहां भाजपा की बजाय “आप“ को आडे हाथ लिया। भाजपा का झुग्गी वालों से ज्यादा समर्थन नहीं मिला, इसलिए इस बस्ती से अतिक्रमण हटाने को हरी झंडी दे दी। बहरहाल, शकुर बस्ती प्रकरण ने फिर वही सवाल खडा कर दिया है कि इस तरह की अवैध बस्तियों को बसने ही क्यों दिया जाता है? शकुर बस्ती रेलवे की प्राइम प्रॉपर्टी है। इस समय इसकी कीमत 6000 करोड रु बताई जाती है। रेलवे तो क्या कोई भी विभाग इतनी बेशकीमती संपति को जाया नहीं रहने दे सकता। शकूर बस्ती की तरह  दिल्ली में रेलवे की जमीन पर करीब 52 अवैध बस्तियां है और इनमें 50,000 के करीब लोग  रहते हैं। हैरानी इस बात की है कि इन बस्तियों को बाकायदा बिजली के कनेक्शंस  दिए गए हैं। अगर ये बस्तियां रेलवे की जमीन पर अवैध तरीके से बनाई गई हैं, तो इन्हें बिजली के कनेक्शंस क्योंकर दिए गए?  जाहिर है झुग्गियों को बसाने में सियासी दलों की अहम भूमिका रहती है। वैसे दिल्ली सरकार अपनी जगह सही है। आप सरकार ने रेलवे से तब तक अवैध बस्तियों से अतिक्रमण नहीं हटाने का अनुरोध कर रखा है, जब तक वह झुग्गियों में रहने वालों की पुख्ता पुनर्वास व्यवस्था न हो जाए। केजरीवाल सरकार ने अगले पांच साल में स्लम में रहने वालों के लिए पक्के मकान  बनाने का वायदा कर रखा है। इस स्थिति के  मद्देनजर  शकुर बस्ती से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में भी राजनीति की “बू“ आ रही है।  हर बात में सियासी फायदा लेने की प्रवृति बंद होनी चाहिए।