साहसिक फैसला
सालाना 10 लाख से ज्यादा कमाने वाले उपभोक्ताओं को सस्ती (सब्सिडाइजड) रसोई गैस (एलपीजी) सुविधा से बाहर रखना, देर से ही सही, मगर मोदी सरकार का साहसिक फैसला है। सरकार के इस फैसले से लगभग 20 लाख उपभोक्ताओं को सस्ती रसोई गैस नहीं मिलेगी। आयकर विभाग में दायर आयकर रिटर्न के अनुसार देश में सालाना दस लाख से अधिक कमाने वाले 20 लाख लोग हैं। इससे सरकार को सालाना 400 करोड से अधिक की बचत होगी। यद्यपि केन्द्र सरकार की भारी भरकम सब्सिडी बजट की तुलना में यह रकम “ऊंट के मुंह में जीरा“ समान लग रही है मगर कहते हैं “बूंद-बूंद से ही घडा भरता है“। सरकार के खर्चे बढ्ते ही जा रहे हैं। कमाई उस अनुपात में नहीं हो रही है। इस स्थिति में बचत के सिवा कोई चारा नहीं है। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही अनाप-शा प सब्सिडी को बंद करके सकारात्मक पहल की है। चालू वित्तीय साल 2015-16 के सब्सिडी बजट में कटौती करके इसे 2.27 लाख करोड रु ( 37 अरब डॉलर) रखा गया है। इससे पहले वित्तीय साल 2014-15 में सब्सिडी का बजट 2.54 लाख करोड रु था। इस बजट मेंसे सरकार 1.24 लाख करोड रु तो फूड सब्सिडी पर ही खर्च करती है। लगभग 970 अरब रु की सब्सिडी फ्यूल (रसोई गैस एवं केरोसिन) पर दी जाती है और 660 अरब रु की सब्सिडी रासायनिक खाद (फर्टीलाइजर) पर दी जा रही है। वित्तीय वर्ष 2014-15 के दौरान रसोई गैस सब्सिडी पर सरकार को 40, 551 करोड रु खर्च करने पडे थे। इस वित्तीय वर्ष में रसोई गैस सब्सिडी के और कम होने की संभावना है। सब्सिडी रेट पर 14.2 किलो का रसोई गैस सिलेंडर 419 रु में दिया जाता है मगर मार्केट रेट पर यह 608 रु में बेचा जा रहा है। इस तरह सरकार हर सिलेंडर पर लगभग 189 रु की सब्सिडी दे रही है। औसतन एक आम परिवार महीने में एक ही सिलेंडर की खपत कर सकता है क्योंकि साल में सब्सिडी वाले 12 सिलेंडर ही मिलते हैं। इस हिसाब से देश का हर एलपीजी उपभोक्ता परिवार सरकार से हर माह 189 रु की सब्सिडी ले रहा है। गरीब और आर्थिक रुप से पिछडे लोगों के लिए तो महीने में 189 रु मायने रखते हैं मगर साधन सपन्न और धनाढय वर्ग के लिए इस सब्सिडी के कोई मायने नहीं हैं। रसोई गैस सब्सिडी का जमकर दुरुपयोग भी किया जाता रहा है। इसे रोकने के लिए सरकार ने 2013 से सब्सिडी की रकम सीधे उपभोक्ता के खाते में जमा करनी शुरु कर दी है। इस समय देश के कुल 16.35 करोड एलपीजी उपभोक्ताओं मेंसे 14.78 करोड उपभोक्ताओं के बैंक खाते में एलपीजी सब्सिडी जमा की जा रही है। न्याय का तकाजा है कि एलपीजी सब्सिडी केवल उन्हीं उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए जो इसके वास्तव में हकदार है मगर निहित सियासी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल मध्यम वर्ग को एलपीजी सब्सिडी से बाहर रखने का साहस नहीं जुटा पाए हैं। देश में एलपीजी के आने से पहले चूल्हों पर खाना पकाया जाता था। इन चूल्हों को जलाने के लिए लकडी का इस्तेमाल किया जाता था। इससे अमूल्य वन संपदा नष्ट हो रही थी। तब सरकार ने वन संपदा बचाने के लिए गांव-गांव एलपीजी को लोकप्रिय बनाने के लिए सस्ती दरों पर रसोई गैस मुहैया कराई। इसी वजह निजी क्षेत्र रसोई गैस बेचने का कारोबार नहीं कर पाया और एलपीजी का पूरा कारोबार आज भी सरकारी तेल कंपनियों के पास है। एलपीजी के लोकप्रिय होने से निश्चित तौर पर वन संपदा संरक्षित हुई है और अगर इस बात का ख्याल किया जाए तो सरकार ने एलपीजी पर सब्सिडी देकर अमूल्य वन संपदा को संरक्षित किया है। विभिन्न सब्सिडी देने वाला भारत अकेला मुल्क नहीं है। यूरोप का 40 फीसदी बजट कृषि और मत्स्य पालन सब्सिडी पर ही खर्च किया जाता है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों में भी बजट का अच्छा-खासा भाग सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च होता है। सबसिडी और टैक्स किसी भी सरकार के बजट का अहम पहलू होते हैं। सरकार अगर कर लगाकर, इस हाथ लेती है तो सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा देकर उस हाथ देती भी है। बस, सब्सिडी का दर्शन न्यायसंगत होना चाहिए। जो लोग सब्सिडी के पात्र ही नहीं, उन्हें यह क्यों दी जाए?
सालाना 10 लाख से ज्यादा कमाने वाले उपभोक्ताओं को सस्ती (सब्सिडाइजड) रसोई गैस (एलपीजी) सुविधा से बाहर रखना, देर से ही सही, मगर मोदी सरकार का साहसिक फैसला है। सरकार के इस फैसले से लगभग 20 लाख उपभोक्ताओं को सस्ती रसोई गैस नहीं मिलेगी। आयकर विभाग में दायर आयकर रिटर्न के अनुसार देश में सालाना दस लाख से अधिक कमाने वाले 20 लाख लोग हैं। इससे सरकार को सालाना 400 करोड से अधिक की बचत होगी। यद्यपि केन्द्र सरकार की भारी भरकम सब्सिडी बजट की तुलना में यह रकम “ऊंट के मुंह में जीरा“ समान लग रही है मगर कहते हैं “बूंद-बूंद से ही घडा भरता है“। सरकार के खर्चे बढ्ते ही जा रहे हैं। कमाई उस अनुपात में नहीं हो रही है। इस स्थिति में बचत के सिवा कोई चारा नहीं है। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही अनाप-शा प सब्सिडी को बंद करके सकारात्मक पहल की है। चालू वित्तीय साल 2015-16 के सब्सिडी बजट में कटौती करके इसे 2.27 लाख करोड रु ( 37 अरब डॉलर) रखा गया है। इससे पहले वित्तीय साल 2014-15 में सब्सिडी का बजट 2.54 लाख करोड रु था। इस बजट मेंसे सरकार 1.24 लाख करोड रु तो फूड सब्सिडी पर ही खर्च करती है। लगभग 970 अरब रु की सब्सिडी फ्यूल (रसोई गैस एवं केरोसिन) पर दी जाती है और 660 अरब रु की सब्सिडी रासायनिक खाद (फर्टीलाइजर) पर दी जा रही है। वित्तीय वर्ष 2014-15 के दौरान रसोई गैस सब्सिडी पर सरकार को 40, 551 करोड रु खर्च करने पडे थे। इस वित्तीय वर्ष में रसोई गैस सब्सिडी के और कम होने की संभावना है। सब्सिडी रेट पर 14.2 किलो का रसोई गैस सिलेंडर 419 रु में दिया जाता है मगर मार्केट रेट पर यह 608 रु में बेचा जा रहा है। इस तरह सरकार हर सिलेंडर पर लगभग 189 रु की सब्सिडी दे रही है। औसतन एक आम परिवार महीने में एक ही सिलेंडर की खपत कर सकता है क्योंकि साल में सब्सिडी वाले 12 सिलेंडर ही मिलते हैं। इस हिसाब से देश का हर एलपीजी उपभोक्ता परिवार सरकार से हर माह 189 रु की सब्सिडी ले रहा है। गरीब और आर्थिक रुप से पिछडे लोगों के लिए तो महीने में 189 रु मायने रखते हैं मगर साधन सपन्न और धनाढय वर्ग के लिए इस सब्सिडी के कोई मायने नहीं हैं। रसोई गैस सब्सिडी का जमकर दुरुपयोग भी किया जाता रहा है। इसे रोकने के लिए सरकार ने 2013 से सब्सिडी की रकम सीधे उपभोक्ता के खाते में जमा करनी शुरु कर दी है। इस समय देश के कुल 16.35 करोड एलपीजी उपभोक्ताओं मेंसे 14.78 करोड उपभोक्ताओं के बैंक खाते में एलपीजी सब्सिडी जमा की जा रही है। न्याय का तकाजा है कि एलपीजी सब्सिडी केवल उन्हीं उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए जो इसके वास्तव में हकदार है मगर निहित सियासी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल मध्यम वर्ग को एलपीजी सब्सिडी से बाहर रखने का साहस नहीं जुटा पाए हैं। देश में एलपीजी के आने से पहले चूल्हों पर खाना पकाया जाता था। इन चूल्हों को जलाने के लिए लकडी का इस्तेमाल किया जाता था। इससे अमूल्य वन संपदा नष्ट हो रही थी। तब सरकार ने वन संपदा बचाने के लिए गांव-गांव एलपीजी को लोकप्रिय बनाने के लिए सस्ती दरों पर रसोई गैस मुहैया कराई। इसी वजह निजी क्षेत्र रसोई गैस बेचने का कारोबार नहीं कर पाया और एलपीजी का पूरा कारोबार आज भी सरकारी तेल कंपनियों के पास है। एलपीजी के लोकप्रिय होने से निश्चित तौर पर वन संपदा संरक्षित हुई है और अगर इस बात का ख्याल किया जाए तो सरकार ने एलपीजी पर सब्सिडी देकर अमूल्य वन संपदा को संरक्षित किया है। विभिन्न सब्सिडी देने वाला भारत अकेला मुल्क नहीं है। यूरोप का 40 फीसदी बजट कृषि और मत्स्य पालन सब्सिडी पर ही खर्च किया जाता है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों में भी बजट का अच्छा-खासा भाग सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च होता है। सबसिडी और टैक्स किसी भी सरकार के बजट का अहम पहलू होते हैं। सरकार अगर कर लगाकर, इस हाथ लेती है तो सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा देकर उस हाथ देती भी है। बस, सब्सिडी का दर्शन न्यायसंगत होना चाहिए। जो लोग सब्सिडी के पात्र ही नहीं, उन्हें यह क्यों दी जाए?






