शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

Suspending Kirti Azad May Not Help BJP

                आजाद की “आजादी”


भारतीय जनता पार्टी ने बिहार से पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद को निलंबित करके बागी नेता को आजाद कर दिया है। अब न रही  पार्टी और न ही उसका अनुषासन। कीर्ति आजाद के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करके भाजपा ने कोई बडा तीर नहीं मार लिया है, अलबत्ता अपने पैरों पर कुल्हाडी मारी है। इससे जनमानस में यह संदेश  जाता है कि भाजपा में भी सच्ची आवाज को दबा दिया जाता है। यानी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। भाजपा वही पार्टी है जो एक जमाने में गला फाड-फाड कर कांग्रेस पर आंतरिक लोकतंत्र का गला घोंटने और शीर्ष  कांग्रेस नेताओं को “तानाशाह“ बताया करती थी। आज भी कांग्रेस पर पार्टी यही आरोप लगाती है। कांग्रेस में भी नेहरु और गांधी परिवार के खिलाफ आवाज उठाने पर बागी को फौरन बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। मगर लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में थोडा-बहुत आंतरिक लोकतंत्र लौटा है और पार्टी के वयोवृद्ध नेता जब-तब शीर्ष  नेतृत्व की कार्यशैली  के खिलाफ बागी सुर बोल रहे हैं। इसके विपरीत कीर्ति आजाद प्रकरण से स्पष्ट  गया है कि भाजपा में अब आंतरिक लोकतंत्र जरा भी बर्दाश्त   नहीं है। न्याय का तकाजा यह था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व  कीर्ति आजाद की बातों को गौर से सुनता और फिर उस पर कोई फैसला लेता है। कोई भी व्यक्ति कानून और जनहित से ऊपर नहीं होता। अरुण जेटली भी नहीं। कीर्ति आजाद को दिल्ली  क्रिकेट बॉडी (डीडीसीए- देहली क्रिकेट एंड डिस्ट्रिक एसोसिएशन) में कथित अनियमितताओं को उजागर करने का पूरा अधिकार है। आजाद न केवल  क्रिकेटर हैं, बल्कि सांसद भी हैं।  कीर्ति आजाद काफी दिनों से डीडीसीए में कथित अनियमितताओं का मामला उठा रहे थे और इस संदर्भ में उन्होंने अरुण जेटली को कई चिठ्ठियां भी लिखीं। जेटली लगभग 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष रहे हैं। कीर्ति आजाद अरुण जेटली पर निशाना साध कर “सियासी पासे“ फेंक रहे हैं, जनमानस को इससे कोई सरोकार नहीं है। यह बात जगजाहिर है कि सियासी नेताओं के हर मूव के पीछे कोई-न-कोई स्वार्थ छिपा होता है और कीर्ति आजाद भी अपवाद नहीं है। मगर उन्होंने जो मुद्दा उठाया है, उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। भाजपा अगर ऐसा करने की कोशिश  करती भी है, तो इसके लिए पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड सकती है।  कीर्ति आजाद के साथ-साथ दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भी डीडीसीए में अरुण  जेटली के कार्यकाल में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए आयोग का गठन  किया है। अरुण जेटली ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत “आप“ नेताओं पर अदालत में मानहानि का दावा कर रखा है। कुल मिलाकर, डीडीसीए में कथित अनिमितताओं का मामला इतना आगे बढ चुका है कि भाजपा और अरुण जेटली चारों तरफ से  घिर चुके हैं। इस स्थिति में कीर्ति आजाद के आप और अरुण जेटली विरोधियों के साथ मिलकर जेटली के खिलाफ मोर्चा  खोलने से भाजपा का ही नुकसान होगा। जेटली अगर निर्दोष  हैं तो  न ही उन्हें और न ही पार्टी को डरने की जरुरत  है। मगर पार्टी के शीर्ष   नेताओं को इस बात का डर था कि “घर का भेदी, लंका ढहा सकता है“। अरुण जेटली पर अगर शुरुआती जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो उन पर इस्तीफे का दबाव बढ सकता है। भाजपा  हिमाचल प्रदेश  के मुख्यंमंत्री वीरभद्र सिंह पर भी इन्हीं हालात में इस्तीफे के लिए दबाव डाल रही है। भाजपा नैतिकता की दुहाई देकर वीरभद्र सिंह से बराबर इस्तीफे की मांग करती रही है। और अगर अरुण जेटली पर कथित अनियमिताओं के आरोपों में जांच आयोग को कुछ मिलता है, तो कांग्रेस भी वही करेगी जो भाजपा हिमाचल प्रदेश  में कर रही है। दुखद स्थिति यह है कि पिछले कुछ समय से समकालीन राजनीति “बदले की भावना“ से हांकी जा रही है। बहरहाल, कीर्ति आजाद की आजादी भाजपा पर भारी पड सकती है।