फेड रिजर्व का छींका फूटा
अततः लगभग एक दशक बाद अमेरिका सेंट्रल बैंक फेडेरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढाकर मार्केटस में व्याप्त अनिश्चितता को कुछ हद तक दूर कर दिया है। लंबे समय से अमेरिकी सेंट्रल बैंक के मूव को लेकर “ अब-तब“ का असमंजस व्याप्त था। दो दिन की जद्दोजेहद के बाद बुधवार को अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने ब्याज में 0.25 फीसदी की बढोतरी करके यह संकेत दिए हैं कि दुनिया की सबसे बढी अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार आया है और यह महंगे कर्ज को सहने की क्षमता रखती है। वैसे सहमे-सहमे सेंट्रल बैंक ने ब्याज में नाममात्र की वृद्धि तो कर दी है मगर वह अभी भी 2007-09 के वित्तीय संकट के भय से उबरा नहीं है। यही वजह है कि ब्याज में मामूली से बढोतरी करने के लिए भी फेडेरल रिजर्व के अधिकारियों को दो दिन तक माथा-पच्ची करनी पडी। 1930 की “भीषण मंदी“ के बाद पूरी दुनिया 2008 में भी रिसेशन की चपेट में आ गई थी। अगस्त 2007 में शुरु हुई इस मंदी से देखते-देखते पूरे विश्व में हाहाकार मच गया था। बडे बैंक भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे। तब संबंधित देश की सरकार को बेल आउट पैकेज देकर वित्तीय संस्थाओं को बचाना पडा था। और इस मंदी का कारण था: अमेरिका हाउसिंग उद्योग। 2004 आते-आते अमेरिका में रियल इस्टेट का कारोबार चरम पर था मगर इसके बाद तेजी का बुलबुला ऐसा फूटा कि अमेरिका के समूचे वित्तीय प्रबंध को पल भर में धराशायी कर गया। अमेरिका रियल इस्टेट की प्रतिभूतियां (सिक्यूरिटीज) का मूल्य इतना गिर गया कि पूरी दुनिया में नामी-गिरामी वित्तीय संस्थाएं भी दिवाला होने के कगार पर पहुंच गई। अगस्त, 2007 में अमेरिका का अग्रणी बैंक बीएनपी परिबास नकदी (लिक्विडिटी) के संकट का हवाला देकर तीन बडे ग्राहकों को केश (विदड्राल) देने से मुकर गया। इसके बाद तो पूरा बैंकिंग सिस्टम ही चर्रामरा गया। तब मंदी का संकट इतना गहराया गया था कि बैंकों ने कर्जा देना बंद कर दिया, स्टॉक मार्केटस में अफरा-तफरी फैल गई और निवेशकों का बाजार से भरोसा ही उठ गया था। मंदी से उबरने के लिए तरह-तरह के वित्तीय प्रलोभन दिए गए। कर्जा बेहद सस्ता किया गया। तब कहीं जाकर 2013 में दुनिया कुछ हद तक मंदी से उबर पाई। इसी मंदी का असर है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक दस साल से ब्याज दरों को स्थिर रखे हुए था। बुधबार को ब्याज बढाते समय फेड अध्यक्ष जेनेत येलेन ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की आशातीत रिकॉवरी के दृष्टिगत ही ब्याज बढाया जा रहा है। बेरोजगारी 5 फीसदी से आसपास है और अगले साल इसके 4.75 फीसदी तक गिरने की उम्मीद है। डिफ्लेशन से निपटना अमेरिका की सबसे बडी चुनौती है। इस समय मुद्रा स्फीति शून्य से भी कम है। इसका मतलब है कि अमेरिकी उपभ्भोक्ताओं की क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) भारतीयों से कहीं ज्यादा सषक्त हैं। इस स्थिति में उपभोक्ता अधिकाधिक खर्च करने की क्षमता रखता है। जितनी ज्यादा मुद्रा-स्फीति होगी, क्रय शक्ति उतनी ही कम। फेडेरल रिजर्व अगले साल तक इसे 2 फीसदी तक लाना चाहता है। ब्याज दरें बढने से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। बहरहाल, अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशक अमेरिका की ओर आकर्षित हो सकते हैं। येलेन ने आगे भी ब्याज दरें बढाने के संकेत दिए हैं मगर यह इस बात पर निर्भर करता है कि बुधवार की बढोतरी क्या रंग लाती है। अमेरिका की देखा-देखी यूरोपियन सेंट्रल बैंक भी ब्याज दरें बढा सकता है। अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशकों (फॉरेन इंस्टिटूशनल इनवेस्टर्स ) का रुख अमेरिका की ओर बढ सकता है। अभी संस्थागत निवेशकों को अमेरिका और यूरोप की अपेक्षा भारतीय पूंजी बाजार में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। संस्थागत निवेशकों का भारतीय स्टॉक मार्केटस में 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। डॉलर की तुलना में कमजोर रुपया निवेशकों को और ज्यादा हतोत्साहित कर सकता है। इन हालात में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें और ज्यादा घटाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहेगा।
अततः लगभग एक दशक बाद अमेरिका सेंट्रल बैंक फेडेरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढाकर मार्केटस में व्याप्त अनिश्चितता को कुछ हद तक दूर कर दिया है। लंबे समय से अमेरिकी सेंट्रल बैंक के मूव को लेकर “ अब-तब“ का असमंजस व्याप्त था। दो दिन की जद्दोजेहद के बाद बुधवार को अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने ब्याज में 0.25 फीसदी की बढोतरी करके यह संकेत दिए हैं कि दुनिया की सबसे बढी अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार आया है और यह महंगे कर्ज को सहने की क्षमता रखती है। वैसे सहमे-सहमे सेंट्रल बैंक ने ब्याज में नाममात्र की वृद्धि तो कर दी है मगर वह अभी भी 2007-09 के वित्तीय संकट के भय से उबरा नहीं है। यही वजह है कि ब्याज में मामूली से बढोतरी करने के लिए भी फेडेरल रिजर्व के अधिकारियों को दो दिन तक माथा-पच्ची करनी पडी। 1930 की “भीषण मंदी“ के बाद पूरी दुनिया 2008 में भी रिसेशन की चपेट में आ गई थी। अगस्त 2007 में शुरु हुई इस मंदी से देखते-देखते पूरे विश्व में हाहाकार मच गया था। बडे बैंक भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे। तब संबंधित देश की सरकार को बेल आउट पैकेज देकर वित्तीय संस्थाओं को बचाना पडा था। और इस मंदी का कारण था: अमेरिका हाउसिंग उद्योग। 2004 आते-आते अमेरिका में रियल इस्टेट का कारोबार चरम पर था मगर इसके बाद तेजी का बुलबुला ऐसा फूटा कि अमेरिका के समूचे वित्तीय प्रबंध को पल भर में धराशायी कर गया। अमेरिका रियल इस्टेट की प्रतिभूतियां (सिक्यूरिटीज) का मूल्य इतना गिर गया कि पूरी दुनिया में नामी-गिरामी वित्तीय संस्थाएं भी दिवाला होने के कगार पर पहुंच गई। अगस्त, 2007 में अमेरिका का अग्रणी बैंक बीएनपी परिबास नकदी (लिक्विडिटी) के संकट का हवाला देकर तीन बडे ग्राहकों को केश (विदड्राल) देने से मुकर गया। इसके बाद तो पूरा बैंकिंग सिस्टम ही चर्रामरा गया। तब मंदी का संकट इतना गहराया गया था कि बैंकों ने कर्जा देना बंद कर दिया, स्टॉक मार्केटस में अफरा-तफरी फैल गई और निवेशकों का बाजार से भरोसा ही उठ गया था। मंदी से उबरने के लिए तरह-तरह के वित्तीय प्रलोभन दिए गए। कर्जा बेहद सस्ता किया गया। तब कहीं जाकर 2013 में दुनिया कुछ हद तक मंदी से उबर पाई। इसी मंदी का असर है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक दस साल से ब्याज दरों को स्थिर रखे हुए था। बुधबार को ब्याज बढाते समय फेड अध्यक्ष जेनेत येलेन ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की आशातीत रिकॉवरी के दृष्टिगत ही ब्याज बढाया जा रहा है। बेरोजगारी 5 फीसदी से आसपास है और अगले साल इसके 4.75 फीसदी तक गिरने की उम्मीद है। डिफ्लेशन से निपटना अमेरिका की सबसे बडी चुनौती है। इस समय मुद्रा स्फीति शून्य से भी कम है। इसका मतलब है कि अमेरिकी उपभ्भोक्ताओं की क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) भारतीयों से कहीं ज्यादा सषक्त हैं। इस स्थिति में उपभोक्ता अधिकाधिक खर्च करने की क्षमता रखता है। जितनी ज्यादा मुद्रा-स्फीति होगी, क्रय शक्ति उतनी ही कम। फेडेरल रिजर्व अगले साल तक इसे 2 फीसदी तक लाना चाहता है। ब्याज दरें बढने से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। बहरहाल, अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशक अमेरिका की ओर आकर्षित हो सकते हैं। येलेन ने आगे भी ब्याज दरें बढाने के संकेत दिए हैं मगर यह इस बात पर निर्भर करता है कि बुधवार की बढोतरी क्या रंग लाती है। अमेरिका की देखा-देखी यूरोपियन सेंट्रल बैंक भी ब्याज दरें बढा सकता है। अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशकों (फॉरेन इंस्टिटूशनल इनवेस्टर्स ) का रुख अमेरिका की ओर बढ सकता है। अभी संस्थागत निवेशकों को अमेरिका और यूरोप की अपेक्षा भारतीय पूंजी बाजार में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। संस्थागत निवेशकों का भारतीय स्टॉक मार्केटस में 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। डॉलर की तुलना में कमजोर रुपया निवेशकों को और ज्यादा हतोत्साहित कर सकता है। इन हालात में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें और ज्यादा घटाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहेगा।






