भारत-पाक सौजन्यता
भारतीय सिनेमा के एक लोकप्रिय गीत के बोल कुछ इस तरह से हैं“ खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को; मिलते हैं दिल यहां, मिल के बिछडने को“। भारत और पाकिस्तान के बीच प्रकारांतर से जारी द्धिपक्षीय वार्ता पर यह गीत सही मायने में चरितार्थ होता है। विभाजन के बाद से आज तक दोनों पडोसी देशों के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए वार्ताओं के कई दौर हो चुके हैं। तीन बार-शिमला, आगरा और लाहौर- शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। तीन बार -1965, 1971 और 1999 में कारगिल- दोनों का युद्ध में भी सामना हो चुका है। पाकिस्तान ने हर वार्ता अथवा शिखर सम्मेलन के बाद भारत का भरोसा तोडा है। 1971 में भारत से रणभूमि में बुरी तरह से मुंह की खाने और बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने पर खिसखिसाए पाकिस्तान ने जुलाई, 1972 में शिमला समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने पुराने संबंधों की कडुवाहट भुलाकर अमन-चैन से रहने का संकल्प लिया था। इसी के फलस्वरुप 1976 में दोनों देशों के बीच रेल सेवाएं भी शुरु की गईं। मगर पाकिस्तान लौटते ही भुट्टो ने भारत के साथ “हजार साल तक युद्ध लडने“ का ऐलान कर डाला। 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर गए और लाहौर समझौता हुआ मगर इसके तत्काल बाद कारगिल में अचानक आक्रमण करके पाकिस्तान ने संबंधों की होली जला डाली। फिर 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा में शिखर वार्ता हुई और एक नया समझौता हुआ। अभी इस समझोते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान की शह पर आतंकियों ने दिसंबर, 2001 को भारत की सवोच्च संस्था संसद पर ही हमला करने की कोशिश की। इस हमले के नतीजतन भारत और पाकिस्तान के बीच न्युक्लियर वार का खतरा तक मंडराने लग पडा था। तब जैसे-तैसे मामला शांत हुआ और कुछ काँफिडेंस बिल्डिंग कदम उठाए गए। 2003 में युद्ध विराम को लेकर समझौता हुआ। संबंध सुधारने के लिए लाहौर-दिल्ली बस चलाई गई। इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान से हमारे संबंध सुधरे नहीं । अस्सी के दशक के बाद से तो दोनों देशों के बीच संबंध बिगडते ही गए । पहले सियाचिन पर टकराव, फिर 1989 में कश्मीर को आतंक की दस्तक, पाकिस्तान का न्युक्लियर टेस्ट, कारगिल युद्ध, संसद पर हमला, मुंबई में नरसंहार जैसी कई ऐसी त्रासदियां हैं, जिनमें स्पष्ट रुप से पाकिस्तान का हाथ रहा है। विभाजन के बाद से अब तक झेलम में इतना पानी बह चुका है कि दोनों देशों की अवाम के बीच भी उतरोत्तर दूरियां बढती ही जा रही हैं। बीबीसी द्वारा 2014 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 49 फीसदी भारतीय पाकिस्तान को भरोसेमंद नहीं मानते हैं। मात्र 19 फीसदी ही पाकिस्तान को अच्छा मानते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान की 58 फीसदी अवाम भारत के प्रति दुर्भावना रखती हैं। केवल 21 फीसदी पाकिस्तान भारत से मधुर संबंध रखने के पक्ष में है। अस्सी के दशक में यह स्थिति अलग थी। तब 45 फीसदी पाकिस्तानी भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध के पक्ष में थे और 48 फीसदी भारतीय भी यही चाहते थे। भारत के जनमानस की राय ली जाए तो वे यही कहेंगे कि पाकिस्तान कतई भरोसेमंद लायक नही है। उसकी नीयत में खोट है और उसकी मित्रता भी “मुंह में राम, बगल में छुरी“ जैसी है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भले ही पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढाया है, मगर वे भी बखूबी जानती है कि पाकिस्तान पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। जब तक पाकिस्तान आतंकियों को भारत में हिंसा फैलाने के लिए उकसाने से बाज नहीं आएगा, बेहतर संबंध की उम्मीद नहीं की जा सकती। पडोसी कितना भी कुटिल क्यों न हो, उससे उलझाए रखना सामरिक विवशता होती है। एक-दूसरे को वार्ता में उलझाए रखना दोनों देशों की सामरिक विवशता है। 2016 में पाकिस्तान 19वीं सार्क शिखर सम्मेलन का मेजबान है और भारत के बिना यह सम्मेलन अर्थहीन है। भारत मार्च-अप्रैल में टी20 वर्ल्ड का मेजबान है। पाकिस्तान के बगैर यह कप नीरस हो जाएगा। यही विवशता, संभवतय, दोनों को वार्ता के द्धार पर खींच लाई है।
भारतीय सिनेमा के एक लोकप्रिय गीत के बोल कुछ इस तरह से हैं“ खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को; मिलते हैं दिल यहां, मिल के बिछडने को“। भारत और पाकिस्तान के बीच प्रकारांतर से जारी द्धिपक्षीय वार्ता पर यह गीत सही मायने में चरितार्थ होता है। विभाजन के बाद से आज तक दोनों पडोसी देशों के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए वार्ताओं के कई दौर हो चुके हैं। तीन बार-शिमला, आगरा और लाहौर- शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। तीन बार -1965, 1971 और 1999 में कारगिल- दोनों का युद्ध में भी सामना हो चुका है। पाकिस्तान ने हर वार्ता अथवा शिखर सम्मेलन के बाद भारत का भरोसा तोडा है। 1971 में भारत से रणभूमि में बुरी तरह से मुंह की खाने और बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने पर खिसखिसाए पाकिस्तान ने जुलाई, 1972 में शिमला समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने पुराने संबंधों की कडुवाहट भुलाकर अमन-चैन से रहने का संकल्प लिया था। इसी के फलस्वरुप 1976 में दोनों देशों के बीच रेल सेवाएं भी शुरु की गईं। मगर पाकिस्तान लौटते ही भुट्टो ने भारत के साथ “हजार साल तक युद्ध लडने“ का ऐलान कर डाला। 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर गए और लाहौर समझौता हुआ मगर इसके तत्काल बाद कारगिल में अचानक आक्रमण करके पाकिस्तान ने संबंधों की होली जला डाली। फिर 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा में शिखर वार्ता हुई और एक नया समझौता हुआ। अभी इस समझोते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान की शह पर आतंकियों ने दिसंबर, 2001 को भारत की सवोच्च संस्था संसद पर ही हमला करने की कोशिश की। इस हमले के नतीजतन भारत और पाकिस्तान के बीच न्युक्लियर वार का खतरा तक मंडराने लग पडा था। तब जैसे-तैसे मामला शांत हुआ और कुछ काँफिडेंस बिल्डिंग कदम उठाए गए। 2003 में युद्ध विराम को लेकर समझौता हुआ। संबंध सुधारने के लिए लाहौर-दिल्ली बस चलाई गई। इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान से हमारे संबंध सुधरे नहीं । अस्सी के दशक के बाद से तो दोनों देशों के बीच संबंध बिगडते ही गए । पहले सियाचिन पर टकराव, फिर 1989 में कश्मीर को आतंक की दस्तक, पाकिस्तान का न्युक्लियर टेस्ट, कारगिल युद्ध, संसद पर हमला, मुंबई में नरसंहार जैसी कई ऐसी त्रासदियां हैं, जिनमें स्पष्ट रुप से पाकिस्तान का हाथ रहा है। विभाजन के बाद से अब तक झेलम में इतना पानी बह चुका है कि दोनों देशों की अवाम के बीच भी उतरोत्तर दूरियां बढती ही जा रही हैं। बीबीसी द्वारा 2014 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 49 फीसदी भारतीय पाकिस्तान को भरोसेमंद नहीं मानते हैं। मात्र 19 फीसदी ही पाकिस्तान को अच्छा मानते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान की 58 फीसदी अवाम भारत के प्रति दुर्भावना रखती हैं। केवल 21 फीसदी पाकिस्तान भारत से मधुर संबंध रखने के पक्ष में है। अस्सी के दशक में यह स्थिति अलग थी। तब 45 फीसदी पाकिस्तानी भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध के पक्ष में थे और 48 फीसदी भारतीय भी यही चाहते थे। भारत के जनमानस की राय ली जाए तो वे यही कहेंगे कि पाकिस्तान कतई भरोसेमंद लायक नही है। उसकी नीयत में खोट है और उसकी मित्रता भी “मुंह में राम, बगल में छुरी“ जैसी है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भले ही पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढाया है, मगर वे भी बखूबी जानती है कि पाकिस्तान पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। जब तक पाकिस्तान आतंकियों को भारत में हिंसा फैलाने के लिए उकसाने से बाज नहीं आएगा, बेहतर संबंध की उम्मीद नहीं की जा सकती। पडोसी कितना भी कुटिल क्यों न हो, उससे उलझाए रखना सामरिक विवशता होती है। एक-दूसरे को वार्ता में उलझाए रखना दोनों देशों की सामरिक विवशता है। 2016 में पाकिस्तान 19वीं सार्क शिखर सम्मेलन का मेजबान है और भारत के बिना यह सम्मेलन अर्थहीन है। भारत मार्च-अप्रैल में टी20 वर्ल्ड का मेजबान है। पाकिस्तान के बगैर यह कप नीरस हो जाएगा। यही विवशता, संभवतय, दोनों को वार्ता के द्धार पर खींच लाई है।






