पेरिस सम्मेलन
फ्रांस की राजधानी पेरिस में लगभग 190 देश सोमवार से 11 दिसंबर तक इस बात पर माथा-पच्ची करेंगे कि दुनिया को ग्लोवल वार्मिंग के खतरों से कैसे बचाया जाए। जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इस सम्मेलन में 25,000 अधिकारियों समेत लगभग 50, 000 लोगों का जमावडा जुटा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा समेत 150 देशों के राज्याध्यक्ष भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। औधोगिक क्रांति के बाद पिछले करीब दो सौ साल के दौरान जहरीली गैसों का उत्सर्जन करके मानव जाति ने पर्यावरण संतुलन को बुरी तरह से बिगाड डाला है। संयुक्त राष्ट्र संघ मौसम एजेंसी द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि 2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। 2015 तक पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री फॉरेनहाइट के खतरनाक स्तर से भी ज्यादा बढ चुका है और अब तक तापमान में 1.8 डिग्री फॉरेनहाइट की वृद्धि दर्ज हो चुकी है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगला साल (2016) और ज्यादा गर्म हो सकता है और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। यानी अगर तापमान का बढना इसी तरह जारी रहा तो अगले सौ साल में तापमान 3.5 फॉरेनहाइट (2 डिग्री सेलसिस) तक बढ सकता है। मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि तामपान के 2 डिग्री सेलसिस की सीमा पार करते ही इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। 2100 तक वायु में सीओ2 की मात्रा 700 पीपीएम (पाटर्स पर मिलियन) तक बढ सकती है। इस मात्रा में मानव का सांस लेना और जिंदा रहना मुश्किल हो सकता है। भूमि बंजर हो सकती है और जल स्त्रोत सूख सकते हैं। इस समय वायु में सीओ2 की अधिकतम मात्रा 350 के आसपास है। प्री-इंडस्ट्रियल युग में यह स्तर 280 से भी कम था। और अगर हम जैसे-तैसे वायु में सीओ2 की मात्रा को अपेक्षा के अनुरुप 500 पीपीएम तक नियंत्रित कर भी लेते हैं, तो भी अमेरिका का औसत ताममान 5 से 10 डिग्री फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे कई क्षेत्रों में जमीन बंजर हो जाएगी और लोगों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है। और अगर हम जहरीली गैस उत्सर्जन (सीओ2) को रोक नहीं पाते हैं और 2100 तक वायु में पीपीएम का स्तर 1100 को पार कर जाता है, तो अमेरिका का तापमान 15 से 20 फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे इसका 50 फीसदी उपजाऊ क्षेत्र बंजर हो जाएगा। मध्य-पूर्व एषिया (अरब) अफ्रीकी महाद्धीप जैसे गर्म क्षत्रों में तो 2050 तक ही 3 डिग्री सेलिसिस तक बढ सकता है। दुनिया के बडे-छोटे देशों सब की यही चिंता है। ग्लोबल वार्मिंग ने मानव के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि ग्लोबल वार्मिंग को कैसे कम किया जाए। औधोगिकरण और पेट्रोल-डीजल के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहरीली गैसों का बेहिसाब उत्सर्जन हो रहा है। विकासशील देशों का कहना है कि पिछले दो सौ सालों में जहरीली गैस उत्सर्जन में विकसित देशों का बडा हाथ रहा है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग को घटाने के लिए विश्व स्तरीय प्रयासों में समृद्ध देशों को ज्यादा वित्तीय स्त्रोत जुटाने चाहिए। विकसित देश बराबरी के सहयोग पर जोर दे रहे हैं। अब तक इसी बात पर मगजखपाई हो रही है की कौन ज्यादा दोषी है। भारत का भी यही स्टैंड है कि समृद्ध देशों को विकासशील मुल्कों की तुलना में ज्यादा वित्तीय संसाधन जुटाने चाहिए। लगभग 183 देशों ने ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए ऐक्शन प्लान पेश की है। पेरिस सम्मलेन में इस पर चर्चा भी हो सकती है। तथापि, यह प्लान इतनी पुख्ता नहीं है कि इससे तापमान में दो डिग्री सेलसिस की संभावित वृद्धि रोकी जा सके। यद्यपि पूरी दुनिया का जनमानस इस समय ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए एकजुट हो रहा है, मगर विश्व नेताओं के मतभेद ठोस कार्रवाई के मार्ग में आडे आ रहे हैं। विश्व नेताओं पर दबाव डालने के लिए रविवार को जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। पेरिस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं।
फ्रांस की राजधानी पेरिस में लगभग 190 देश सोमवार से 11 दिसंबर तक इस बात पर माथा-पच्ची करेंगे कि दुनिया को ग्लोवल वार्मिंग के खतरों से कैसे बचाया जाए। जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इस सम्मेलन में 25,000 अधिकारियों समेत लगभग 50, 000 लोगों का जमावडा जुटा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा समेत 150 देशों के राज्याध्यक्ष भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। औधोगिक क्रांति के बाद पिछले करीब दो सौ साल के दौरान जहरीली गैसों का उत्सर्जन करके मानव जाति ने पर्यावरण संतुलन को बुरी तरह से बिगाड डाला है। संयुक्त राष्ट्र संघ मौसम एजेंसी द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि 2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। 2015 तक पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री फॉरेनहाइट के खतरनाक स्तर से भी ज्यादा बढ चुका है और अब तक तापमान में 1.8 डिग्री फॉरेनहाइट की वृद्धि दर्ज हो चुकी है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगला साल (2016) और ज्यादा गर्म हो सकता है और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। यानी अगर तापमान का बढना इसी तरह जारी रहा तो अगले सौ साल में तापमान 3.5 फॉरेनहाइट (2 डिग्री सेलसिस) तक बढ सकता है। मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि तामपान के 2 डिग्री सेलसिस की सीमा पार करते ही इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। 2100 तक वायु में सीओ2 की मात्रा 700 पीपीएम (पाटर्स पर मिलियन) तक बढ सकती है। इस मात्रा में मानव का सांस लेना और जिंदा रहना मुश्किल हो सकता है। भूमि बंजर हो सकती है और जल स्त्रोत सूख सकते हैं। इस समय वायु में सीओ2 की अधिकतम मात्रा 350 के आसपास है। प्री-इंडस्ट्रियल युग में यह स्तर 280 से भी कम था। और अगर हम जैसे-तैसे वायु में सीओ2 की मात्रा को अपेक्षा के अनुरुप 500 पीपीएम तक नियंत्रित कर भी लेते हैं, तो भी अमेरिका का औसत ताममान 5 से 10 डिग्री फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे कई क्षेत्रों में जमीन बंजर हो जाएगी और लोगों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है। और अगर हम जहरीली गैस उत्सर्जन (सीओ2) को रोक नहीं पाते हैं और 2100 तक वायु में पीपीएम का स्तर 1100 को पार कर जाता है, तो अमेरिका का तापमान 15 से 20 फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे इसका 50 फीसदी उपजाऊ क्षेत्र बंजर हो जाएगा। मध्य-पूर्व एषिया (अरब) अफ्रीकी महाद्धीप जैसे गर्म क्षत्रों में तो 2050 तक ही 3 डिग्री सेलिसिस तक बढ सकता है। दुनिया के बडे-छोटे देशों सब की यही चिंता है। ग्लोबल वार्मिंग ने मानव के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि ग्लोबल वार्मिंग को कैसे कम किया जाए। औधोगिकरण और पेट्रोल-डीजल के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहरीली गैसों का बेहिसाब उत्सर्जन हो रहा है। विकासशील देशों का कहना है कि पिछले दो सौ सालों में जहरीली गैस उत्सर्जन में विकसित देशों का बडा हाथ रहा है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग को घटाने के लिए विश्व स्तरीय प्रयासों में समृद्ध देशों को ज्यादा वित्तीय स्त्रोत जुटाने चाहिए। विकसित देश बराबरी के सहयोग पर जोर दे रहे हैं। अब तक इसी बात पर मगजखपाई हो रही है की कौन ज्यादा दोषी है। भारत का भी यही स्टैंड है कि समृद्ध देशों को विकासशील मुल्कों की तुलना में ज्यादा वित्तीय संसाधन जुटाने चाहिए। लगभग 183 देशों ने ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए ऐक्शन प्लान पेश की है। पेरिस सम्मलेन में इस पर चर्चा भी हो सकती है। तथापि, यह प्लान इतनी पुख्ता नहीं है कि इससे तापमान में दो डिग्री सेलसिस की संभावित वृद्धि रोकी जा सके। यद्यपि पूरी दुनिया का जनमानस इस समय ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए एकजुट हो रहा है, मगर विश्व नेताओं के मतभेद ठोस कार्रवाई के मार्ग में आडे आ रहे हैं। विश्व नेताओं पर दबाव डालने के लिए रविवार को जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। पेरिस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं।






