जीएसटी बिल पर असमंजस
लंबे समय से लंबित गुडस एंड सर्विस टैक्स बिल इस बार भी लटकता नजर आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत में घसीटे जाने से पार्टी तिलमिलाई हुई है। दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड की संपति को कथित तौर पर हडपने के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को 19 दिसंबर को पेशी पर तलब किया है। कांग्रेस इस मामले को मोदी सरकार की “बदले की कार्रवाई“ बता रही है जबकि अदालत में यह मामला भाजपा नेता सुब्रह्यण्यम स्वामी ने दायर किया है। कांग्रेस का आरोप है कि मामला सौ फीसदी “राजनीतिक“ है, इसलिए पार्टी इसका जबाव भी राजनीतिक अंदाज में ही देगी। कांग्रेस के पास सरकार को झुकाने का बहृास्त्र भी है। मोदी सरकार को राज्यसभा में जीएसटी बिल को पारित करवाने के लिए कांग्रेस के समर्थन की दरकार है। सरकार के पास राज्यसभा में दो-तिहाई तो क्या, स्पष्ट बहुमत भी नहीं है। इसी कारण जीएसटी बिल राज्यसभा से पारित नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस के पास यही बहृास्त्र है और इसका इस्तेमाल करके पार्टी मोदी सरकार से मोल-तोल करने की फिराक में है। लोकसभा इस बिल को काफी पहले पारित कर चुकी है। जीएसटी का मामला पिछले 15 सालों से लटका पडा है। साल 2000 में अटल बिहारी सरकार ने पपश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी सरकार के वित्त मंत्री असीम गुप्त की अध्यक्षता में जीएसटी की रुपरेखा तैयार करने के लिए समिति का गठन किया था। इस समिति की रिपोर्ट आने के बाद 28 फरवरी 2006 को अपना बजट पेश करते समय तत्कालीन वित मंत्री पी चिंदबरम ने 1 अप्रैल, 2010 से जीएसटी को लागू करने का ऐलान किया था। इसे समय पर लागू करने के लिए 2007 में राज्यों के वित्त मंत्रियों की एमपावर्ड कमेटी भी बनाई गई। नवंबर, 2007 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी। अप्रैल, 2008 को इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी मगर छह साल तक मामला लटका रहा। 19 दिसंबर, 2014 को जीएसटी बिल लोकसभा में पेश किया गया और सदन ने 6 मई, 2015 को इसे ध्वनि मत से पारित भी कर दिया मगर राज्यसभा में यह बिल आज तक पारित नहीं हो पाया है। सरकार ने जीएसटी को एक अप्रैल, 2016 से लागू करने का ऐलान कर रखा है। मगर ताजा हालात बताते हैं कि जीएसटी बिल मौजूदा शीतकालीन सत्र में पारित होने से रहा। कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि ताजा स्थिति में वह इस बिल का फिलहाल समर्थन नहीं करेगी। पिछले सप्ताह कांग्रेस ने जीएसटी बिल पर पार्टी समर्थन के लिए कुछ शर्तें रखीं थीं। इनमें जीएसटी में कर की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था और उत्पादकों पर एक फीसदी शुल्क न लगाने की शर्तें प्रमुख थीं। मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्यण्यम पैनल ने भी उत्पादकों पर एक फीसदी कर को निरस्त करने की सिफारिश की है मगर यह जीएसटी की अधिकतम संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में नहीं है। पैनल जीएसटी कर को 18 फीसदी से कम रखने के पक्ष में है। सरकार ने इन्हें मान लिया और इसके बाद लग रहा था कि जीएसटी बिल चालू सत्र में पारित हो जाएगा। कांग्रेस के अलावा हालात की नजाकत देखकर भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना भी जीएसटी बिल पर अपना विरोध दर्ज किया है। शिवसेना का कहना है कि जीएसटी से मुंबई महानगर पालिका जैसी समृद्ध स्थानीय निकाओं को खासा राजस्व का नुकसान हो सकता है। मुबंई महानगरपालिका (मनपा) को इस समय चुंगी से ही सालाना 8000 करोड रु का राजस्व मिल रहा है। इस नुकसान की भरपाई कैसे होगी, शिवसेना इस पर स्पष्ट व्यवस्था की पक्षधर है। बहरहाल, संसद का शीतकालीन सत्र 23 दिसंबर को समाप्त हो रहा है और तब तक अगर कांग्रेस इसी तरह संसद की कार्यवाही बाधित करती रही, तो जीएसटी बिल का पारित होना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के अगले वित्तीय साल से लागू नहीं होने की स्थिति में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी का नुकसान हो सकता है। कांग्रेस को यह बात समझनी होगी।
लंबे समय से लंबित गुडस एंड सर्विस टैक्स बिल इस बार भी लटकता नजर आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत में घसीटे जाने से पार्टी तिलमिलाई हुई है। दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड की संपति को कथित तौर पर हडपने के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को 19 दिसंबर को पेशी पर तलब किया है। कांग्रेस इस मामले को मोदी सरकार की “बदले की कार्रवाई“ बता रही है जबकि अदालत में यह मामला भाजपा नेता सुब्रह्यण्यम स्वामी ने दायर किया है। कांग्रेस का आरोप है कि मामला सौ फीसदी “राजनीतिक“ है, इसलिए पार्टी इसका जबाव भी राजनीतिक अंदाज में ही देगी। कांग्रेस के पास सरकार को झुकाने का बहृास्त्र भी है। मोदी सरकार को राज्यसभा में जीएसटी बिल को पारित करवाने के लिए कांग्रेस के समर्थन की दरकार है। सरकार के पास राज्यसभा में दो-तिहाई तो क्या, स्पष्ट बहुमत भी नहीं है। इसी कारण जीएसटी बिल राज्यसभा से पारित नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस के पास यही बहृास्त्र है और इसका इस्तेमाल करके पार्टी मोदी सरकार से मोल-तोल करने की फिराक में है। लोकसभा इस बिल को काफी पहले पारित कर चुकी है। जीएसटी का मामला पिछले 15 सालों से लटका पडा है। साल 2000 में अटल बिहारी सरकार ने पपश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी सरकार के वित्त मंत्री असीम गुप्त की अध्यक्षता में जीएसटी की रुपरेखा तैयार करने के लिए समिति का गठन किया था। इस समिति की रिपोर्ट आने के बाद 28 फरवरी 2006 को अपना बजट पेश करते समय तत्कालीन वित मंत्री पी चिंदबरम ने 1 अप्रैल, 2010 से जीएसटी को लागू करने का ऐलान किया था। इसे समय पर लागू करने के लिए 2007 में राज्यों के वित्त मंत्रियों की एमपावर्ड कमेटी भी बनाई गई। नवंबर, 2007 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी। अप्रैल, 2008 को इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी मगर छह साल तक मामला लटका रहा। 19 दिसंबर, 2014 को जीएसटी बिल लोकसभा में पेश किया गया और सदन ने 6 मई, 2015 को इसे ध्वनि मत से पारित भी कर दिया मगर राज्यसभा में यह बिल आज तक पारित नहीं हो पाया है। सरकार ने जीएसटी को एक अप्रैल, 2016 से लागू करने का ऐलान कर रखा है। मगर ताजा हालात बताते हैं कि जीएसटी बिल मौजूदा शीतकालीन सत्र में पारित होने से रहा। कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि ताजा स्थिति में वह इस बिल का फिलहाल समर्थन नहीं करेगी। पिछले सप्ताह कांग्रेस ने जीएसटी बिल पर पार्टी समर्थन के लिए कुछ शर्तें रखीं थीं। इनमें जीएसटी में कर की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था और उत्पादकों पर एक फीसदी शुल्क न लगाने की शर्तें प्रमुख थीं। मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्यण्यम पैनल ने भी उत्पादकों पर एक फीसदी कर को निरस्त करने की सिफारिश की है मगर यह जीएसटी की अधिकतम संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में नहीं है। पैनल जीएसटी कर को 18 फीसदी से कम रखने के पक्ष में है। सरकार ने इन्हें मान लिया और इसके बाद लग रहा था कि जीएसटी बिल चालू सत्र में पारित हो जाएगा। कांग्रेस के अलावा हालात की नजाकत देखकर भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना भी जीएसटी बिल पर अपना विरोध दर्ज किया है। शिवसेना का कहना है कि जीएसटी से मुंबई महानगर पालिका जैसी समृद्ध स्थानीय निकाओं को खासा राजस्व का नुकसान हो सकता है। मुबंई महानगरपालिका (मनपा) को इस समय चुंगी से ही सालाना 8000 करोड रु का राजस्व मिल रहा है। इस नुकसान की भरपाई कैसे होगी, शिवसेना इस पर स्पष्ट व्यवस्था की पक्षधर है। बहरहाल, संसद का शीतकालीन सत्र 23 दिसंबर को समाप्त हो रहा है और तब तक अगर कांग्रेस इसी तरह संसद की कार्यवाही बाधित करती रही, तो जीएसटी बिल का पारित होना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के अगले वित्तीय साल से लागू नहीं होने की स्थिति में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी का नुकसान हो सकता है। कांग्रेस को यह बात समझनी होगी।






