कन्या कब ब्याही जाए?
कन्या कब ब्याही जानी चाहिए? क्या नाबालिग लडकी को भी अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने और उससे ब्याह करने का मौलिक अधिकार है और क्या हिंदू मेरिज एक्ट विवाह के तहत 18 साल की आयु से पहले लडकी को अपनी मर्जी से ब्याह करने से रोकना उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं है? देश में पिछले कई सालों से लडकी की बाली उमर (विवाह योग्य) को लेकर बहस जारी है। कानून के तहत लडकी के 18 साल पूरा होने पर ही उसे बालिग माना जाता है और यही उसकी विवाहयोग्य उमर भी तय की गई है। 18 साल की उमर से पहले नाबालिग लडकी से शादी करना और यौन संबंध रखना गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर संबंधित व्यक्ति को अपहरण और बलात्कार के संगीन अपराध में कडी सजा दी जाती है। नाबालिग लडकी को स्वेच्छा से शादी करना अथवा यौन संबंध बनाने का भी हक नहीं है। मोहाली की अदालत द्वारा गर्भवती नाबालिग लडकी को अपने पति और ससुराल के साथ रहने की अनुमति देकर यह बहस फिर गरमा गई है। मोहाली से पहले इसी साल सितंबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भी नाबालिग लडकी के विवाह को वैध मानते हुए उसे पति के साथ रहने की अनुमति दी थी। अपनी पसंद के लडके से शादी करने पर लडकी उच्च न्यायालय की शरण में गई थी। निचली अदालत ने लडकी की नाबालिग उमर के दृष्टिगत उसे नारी निकेतन भेज दिया था क्योंकि शादी के बाद वह अपने माता-पिता के घर नहीं रहना चाहती थी। न्यायालय ने माना कि लडकी की इच्छा के विरुद्ध उसे नारी निकेतन में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत स्वंत्रतता की भावना के खिलाफ है। अदालत का मानना था कि शादी को इस बिला पर अवैध करार नहीं दिया जा सकता कि लडकी नाबालिग है। अदालत ने इस नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दिया। इससे पहले अक्टूबर, 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय और फरवरी, 2006 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय भी नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दे चुकी हैं। इन दोनों मामलों में न्यायालय ने आरोपी व्यक्तियों (पति) को अपहरण और बलात्कार के आरोपों से भी बरी कर दिया था। जुलाई, 2013 में देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है कि “लडकी को कब ब्याह जाए, यह तय करना आसान नहीं है। व्यायालय ने व्यवस्था दी कि दिल्ली और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं में कोई खामी नहीं है और दोनों न्यायालय अपनी जगह सही हैं। वैसे 2012 तक कानून के तहत स्वेच्छिक सेक्स के लिए कन्या की आयु 16 साल रखी गई थी। मणिपुर में लडकी को 14 में ही बालिग माना जाता है और उसे स्वेच्छिक सेक्स का अधिकार भी दिया गया है। 2013 में केन्द्र सरकार ने भी लडकी के लिए स्वेच्छिक सेक्स (कंसेन्सुअल सेक्स) की आयु 16 करने का बिल संसद में लाया था मगर कुछ लोगों के कडे विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया। यानी न्यायालय तो न्यायालय, सरकार भी मानती है कि लडकी 16 तक व्यस्क हो जाती है, इसलिए उसे स्वेच्छिक सेक्स ( कंसेन्सुअल सेक्स) का अधिकार दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के अलावा मुसलमानों में लडकी को 15 साल अथवा उसके यौवन की दहलीज पर (पीरियड) कदम रखते ही विवाह योग्य माना जाता है। बहरहाल, देश में मेरिज को लेकर अलग-अलग कानून है। और न्यायालय भी इस मामले में अलग-अलग व्यवस्थाएं दे रहे हैं। इस स्थिति का ख्याल करते हुए, लडकी कब ब्याही जाए, इसका फैसला लडकी पर छोड देना चाहिए। बाल विवाह 1929 से पूरी तरह से प्रतिबंधित है मगर देश में आज भी यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है। गरीब और आर्थिक तौर पर पिछडे तबकों में अपनी लडकी को बेचने का चलन है। इस बात का ख्याल करते हुए लडकी का ब्याह मां-बाप के विवेक पर छोडना भी खतरे से खाली नहीं है। नारी सशक्तिकरण का जमाना है और आधुनिक नारी को अपने मनपंसद का जीवन साथी चुनने और इससे कब और कैसे ब्याह करने की पूरी छूट होनी चाहिए। ऐसे कानून का कोई मतलब नहीं जो मानव की आजादी ही छीन ले।
कन्या कब ब्याही जानी चाहिए? क्या नाबालिग लडकी को भी अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने और उससे ब्याह करने का मौलिक अधिकार है और क्या हिंदू मेरिज एक्ट विवाह के तहत 18 साल की आयु से पहले लडकी को अपनी मर्जी से ब्याह करने से रोकना उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं है? देश में पिछले कई सालों से लडकी की बाली उमर (विवाह योग्य) को लेकर बहस जारी है। कानून के तहत लडकी के 18 साल पूरा होने पर ही उसे बालिग माना जाता है और यही उसकी विवाहयोग्य उमर भी तय की गई है। 18 साल की उमर से पहले नाबालिग लडकी से शादी करना और यौन संबंध रखना गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर संबंधित व्यक्ति को अपहरण और बलात्कार के संगीन अपराध में कडी सजा दी जाती है। नाबालिग लडकी को स्वेच्छा से शादी करना अथवा यौन संबंध बनाने का भी हक नहीं है। मोहाली की अदालत द्वारा गर्भवती नाबालिग लडकी को अपने पति और ससुराल के साथ रहने की अनुमति देकर यह बहस फिर गरमा गई है। मोहाली से पहले इसी साल सितंबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भी नाबालिग लडकी के विवाह को वैध मानते हुए उसे पति के साथ रहने की अनुमति दी थी। अपनी पसंद के लडके से शादी करने पर लडकी उच्च न्यायालय की शरण में गई थी। निचली अदालत ने लडकी की नाबालिग उमर के दृष्टिगत उसे नारी निकेतन भेज दिया था क्योंकि शादी के बाद वह अपने माता-पिता के घर नहीं रहना चाहती थी। न्यायालय ने माना कि लडकी की इच्छा के विरुद्ध उसे नारी निकेतन में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत स्वंत्रतता की भावना के खिलाफ है। अदालत का मानना था कि शादी को इस बिला पर अवैध करार नहीं दिया जा सकता कि लडकी नाबालिग है। अदालत ने इस नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दिया। इससे पहले अक्टूबर, 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय और फरवरी, 2006 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय भी नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दे चुकी हैं। इन दोनों मामलों में न्यायालय ने आरोपी व्यक्तियों (पति) को अपहरण और बलात्कार के आरोपों से भी बरी कर दिया था। जुलाई, 2013 में देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है कि “लडकी को कब ब्याह जाए, यह तय करना आसान नहीं है। व्यायालय ने व्यवस्था दी कि दिल्ली और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं में कोई खामी नहीं है और दोनों न्यायालय अपनी जगह सही हैं। वैसे 2012 तक कानून के तहत स्वेच्छिक सेक्स के लिए कन्या की आयु 16 साल रखी गई थी। मणिपुर में लडकी को 14 में ही बालिग माना जाता है और उसे स्वेच्छिक सेक्स का अधिकार भी दिया गया है। 2013 में केन्द्र सरकार ने भी लडकी के लिए स्वेच्छिक सेक्स (कंसेन्सुअल सेक्स) की आयु 16 करने का बिल संसद में लाया था मगर कुछ लोगों के कडे विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया। यानी न्यायालय तो न्यायालय, सरकार भी मानती है कि लडकी 16 तक व्यस्क हो जाती है, इसलिए उसे स्वेच्छिक सेक्स ( कंसेन्सुअल सेक्स) का अधिकार दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के अलावा मुसलमानों में लडकी को 15 साल अथवा उसके यौवन की दहलीज पर (पीरियड) कदम रखते ही विवाह योग्य माना जाता है। बहरहाल, देश में मेरिज को लेकर अलग-अलग कानून है। और न्यायालय भी इस मामले में अलग-अलग व्यवस्थाएं दे रहे हैं। इस स्थिति का ख्याल करते हुए, लडकी कब ब्याही जाए, इसका फैसला लडकी पर छोड देना चाहिए। बाल विवाह 1929 से पूरी तरह से प्रतिबंधित है मगर देश में आज भी यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है। गरीब और आर्थिक तौर पर पिछडे तबकों में अपनी लडकी को बेचने का चलन है। इस बात का ख्याल करते हुए लडकी का ब्याह मां-बाप के विवेक पर छोडना भी खतरे से खाली नहीं है। नारी सशक्तिकरण का जमाना है और आधुनिक नारी को अपने मनपंसद का जीवन साथी चुनने और इससे कब और कैसे ब्याह करने की पूरी छूट होनी चाहिए। ऐसे कानून का कोई मतलब नहीं जो मानव की आजादी ही छीन ले।






