बुधवार, 2 दिसंबर 2015

Dirt in Our Minds

                          मन-मस्तिष्क  में कूडा-कचरा  

देश  में व्याप्त असहिष्णुता के माहौल पर संसद के अंदर और बाहर जारी चर्चा देशहित में कम राजनीतिक रंगत में डूबी ज्यादा  लग रही है। सियासी दल असहिष्णुता पर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। बुद्धिजीवी, कलाकार और साहित्यकार असहिष्णुता के विरोध में खडे तो हुए हैं मगर इस मामले में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। वामपंथी खुलकर कुछ ज्यादा ही बोल रहे हैं। दक्षिणपंथी दबी जुबान में भी  असहिष्णुता का मुखर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इस बात में दो राय नहीं हो सकती की   असहिष्णुता  देश  की अखंडता और एकता के लिए सबसे बडी चुनौती है। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत में जब कभी भी  असहिष्णुता व्याप्त रही, देश  की अखंडता पर करारी चोट हुई। इतिहास हमें यह सीख भी देता है कि  असहिष्णुता ने  दुनिया में किसी भी मुल्क को सामाजिक-आर्थिक रुप से फलने-फूलने नहीं दिया।  और दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक मुल्क में तो  असहिष्णुता के लिए कोई जगह नहीं होनी  चाहिए । मोदी सरकार में  वरिष्ठ मंत्री वेंकैया नाडु ने भी सोमवार को  लोकसभा में माना कि देश  में इस समय असहिष्णुता  का माहौल है। भाजपा ने अब जाकर अपने सांसदों को नसीहत  दी है कि वे असहिष्णुता  पर आग उगलने वाली बयानबाजी से बचेॅ। इससे जाहिर है कि सतारूढ दल भी मान रहा है कि देश  में असहिष्णुता  है। बावजूद इसके सियासी दल माहौल को और तल्ख बनाने में लगे हुए  हैं। सोमवार को संसद में असहिष्णुता पर चर्चा  के दौरान मूल मुद्दे को दरकिनार कर सांसदों ने एक-दूसरे पर सिर्फ दोषारोपण किया। माकर्सवादी पार्टी (माकपा-सीपीएम) सांसद मोहम्मद सलीम के सदन में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हवाले से  “800 साल बाद भारत में हिंदू शासक“ संबंधी बयान पर हंगामा तो होना ही था। संसद की अपनी गरिमा होती है और गरिमापूर्ण संसदीय आचरण का तकाजा है कि  देश  के इस पावन मंच को अनर्गल आरोप लगाकर अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए। माकपा सांसद ने  भाजपा पर निशाना साधने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित जिस खबर को आधार बनाया था, वह पहले ही सफाई  दे चुकी थी कि खबर एकदम गलत थी और राजनाथ सिंह ने ऐसा कोई भी बयान नहीं दिया। वैसे भी देश  के गृहमंत्री के हवाले से इतनी महत्वपूर्ण बात का पता दिनभर खबर सूंघने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को न लगे, इस पर सहज में विश्वास  नहीं किया जा सकता। भारत में मीडिया की जबरदस्त पैठ है और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के जमाने में इस तरह की महत्वपूर्ण खबर छूट ही  नहीं सकती। इस बात का ख्याल करते हुए मात्र एक पत्रिका में छपी खबर की विश्वश्नीयता  पर संदेह होता है। इतना ही नहीं, किसी पत्रिका अथवा अखबार या न्यूज चैनल की खबर के आधार पर देश  के गृहमंत्री पर “कीचड“ नहीं उछाला जा सकता। इस प्रकरण से स्पष्ट  होता है कि सियासी दल असहिष्णुता जैसे गंभीर मुद्दे को भी राजनीति हित के लिए भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी के इस कथन से जनमानस पूरी तरह सहमत है कि “गंदगी और कूडा-कचरा देश  की गलियों में नही, बल्कि हमारे मन-मस्तिष्क  में है और जब तक यह पूरी तरह से निकल नहीं जाता; संकीर्णता, भय और अविश्वास  का घुप अंधेरा हमारे अंदर घर करता रहेगा। सर्वप्रथम इस कचरे को  मन-मस्तिष्क  से खदेडने की जरुरत है।  बहरहाल,  असहिष्णुता लिए कौन दोषी  है और कौन पाक दामन, यह संसद में चर्चा  का विषय  नहीं होना चाहिए। अलबत्ता, देश  को  असहिष्णुतासे कैसे मुक्त रखा जाएगा, इसके लिए सभी सियासी दलों को मिलजुल कर काम करना चाहिए। संसद में सर्वसम्मति से  असहिष्णुता फैलाने वालों की भर्त्सना के लिए प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। इससे जनमानस आश्वस्त  हो सकता है़।