महंगाई मार गई
मोदी सरकार के राज में भी महंगाई आम आदमी की कमर तोड रही है। विपक्ष में रहते भाजपा मनमोहन सिंह सरकार को महंगाई के लिए कोसा करती थी और इस पर काबू पाने की डींगे हांका करती थी। मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के शासन को “ सर्वनाश का दश क ( डिकेड ऑफ डिके)“ बताते हुए भाजपा ने आम आदमी के लिए “सौ दिन में अच्छे दिन“ लाने का वायदा किया था। चुनावी सभाओं में 56 इंच का सीना ठोंककर कहा जाता था कि “ जमाखोरी और कुप्रबंध के कारण देश को महंगाई झेलनी पड रही है। मोदी सरकार के आते ही महंगाई पर अविलंब नियंत्रण पा लिया जाएगा। मोदी सरकार को सत्ता में आए 600 से ज्यादा दिन हो गए हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री 30 से ज्यादा विदेशी यात्राएं कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमते 11 आल के न्यूनतम स्तर पर है। पेट्रोल और डीजल पर शुल्क लगाकर मोदी सरकार अच्च्छी खासी कमाई करके माला-माल हो रही है। व्यापारी, ट्रांसपोटर और अन्य कारोबारी भी सस्ते पेट्रोल-डीजल का फायदा उठा रहे हैं। मगर आम आदमी है कि सस्ते पेट्रोल-डीजल के जमाने में भी उसे अधिक यात्री भाडा चुकाना पड रहा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हुई है। आसमान को छूती कीमतों के कारण दालें आम आदमी की रसोई से बाहर हो गई हैं । मौसमी सब्जियों और फल सस्ती होने का नाम नहीं ले रही हैं। बाजार में पिछले डेढ साल के दौरान न तो दालों के दामों में गिरावट आई और न ही फल सब्जी के दाम गिरे हैं मगर सरकार के आंकडे पिछले माह (अक्टूबर) तक कह रहे थे कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित थोक मुद्रा स्फीति शून्य से नीचे चली गई है । यानी देश में थोक वस्तुओं के दामों में जबरदस्त गिरावट आई है। अब नवंबर माह में प्याज और दालों की कीमतें बढने से थोक मूल्य सूचकांक में 1.82 फीसदी का उछाल आया है मगर अभी भी यह शून्य से नीचे ही है और पिछले तेरह माह से लगातार शून्य से नीचे टिका हुआ है। अक्टूबर में जहां थोक मूल्य सूचकांक माइनस 3. 81 फीसदी था, नवंबर में यह बढकर माइनस 1.99 फीसदी था। रिटेल मुद्रा स्फीति में भी उछाल आया है और नवंबर में यह बढकर 14-माह के उच्च स्तर 5.41 फीसदी पहुंच गई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के कारण नवंबर में रिटेल मुद्रा स्फीति और थोक मुद्रा स्फीति दोनों में इजाफा हुआ है। आकंडों के अनुसार खाद्य वस्तुओं की कीमतें निरंतर बढ रही हैं। नवंबर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 2. 3 फीसदी का इजाफा हुआ। अगस्त से अक्टूबर की तिमाही में खाद्य वस्तुओं के दामों में लगातार वृद्धि हुई है। भारतीय मुद्रा रुपया डॉलर की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। इस समय रुपया 27-माह के न्यूनतम स्तर को छू रहा है।इससे साफ है तेल की कीमतों में निरंतर गिरावट और अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार के कारण जो अपेक्षाकृत एडवांटेज मिल रही है, वह अब हाथ से फिसलती जा रही है। इस बात में शक नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार की तुलना में मोदी सरकार के शासन में देश की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत स्थायित्व से निवेशकों का भरोसा बढा है पर देश में व्याप्त असहिष्णु मौहाल ने सब गुड-गोबर कर दिया है। टकराव की राजनीति के चलते संसदीय कार्य भी सुचारु रुप से नहीं चल रहा है। गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल का पारित होना देश हित में है। इससे महंगाई कम हो सकती है मगर राजनीतिक दल इस मामले में भी आम सहमति नहीं बना पा रहे हैं। बहरहाल, आम आदमी को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। उसकी सरकार से ज्यादा अपेक्षा नहीं रहती है। महंगाई आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। सरकारी आंकडे नीति निर्धारण के लिए तो उपयोगी हो सकते हैं मगर इनसे आम आदमी के पल्ले कुछ भी नहीं पडता है। बाजार में अगर दाल-सब्जियां, दूध-घी और आटा-चावल सस्ता है तो उसके अच्छे दिन हैं। और अगर ये सब चीजें महंगी हैं, तो सरकार की स्वच्छ और उज्जवल छवि एव भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन भी उसके किसी काम का नहीं।
मोदी सरकार के राज में भी महंगाई आम आदमी की कमर तोड रही है। विपक्ष में रहते भाजपा मनमोहन सिंह सरकार को महंगाई के लिए कोसा करती थी और इस पर काबू पाने की डींगे हांका करती थी। मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के शासन को “ सर्वनाश का दश क ( डिकेड ऑफ डिके)“ बताते हुए भाजपा ने आम आदमी के लिए “सौ दिन में अच्छे दिन“ लाने का वायदा किया था। चुनावी सभाओं में 56 इंच का सीना ठोंककर कहा जाता था कि “ जमाखोरी और कुप्रबंध के कारण देश को महंगाई झेलनी पड रही है। मोदी सरकार के आते ही महंगाई पर अविलंब नियंत्रण पा लिया जाएगा। मोदी सरकार को सत्ता में आए 600 से ज्यादा दिन हो गए हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री 30 से ज्यादा विदेशी यात्राएं कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमते 11 आल के न्यूनतम स्तर पर है। पेट्रोल और डीजल पर शुल्क लगाकर मोदी सरकार अच्च्छी खासी कमाई करके माला-माल हो रही है। व्यापारी, ट्रांसपोटर और अन्य कारोबारी भी सस्ते पेट्रोल-डीजल का फायदा उठा रहे हैं। मगर आम आदमी है कि सस्ते पेट्रोल-डीजल के जमाने में भी उसे अधिक यात्री भाडा चुकाना पड रहा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हुई है। आसमान को छूती कीमतों के कारण दालें आम आदमी की रसोई से बाहर हो गई हैं । मौसमी सब्जियों और फल सस्ती होने का नाम नहीं ले रही हैं। बाजार में पिछले डेढ साल के दौरान न तो दालों के दामों में गिरावट आई और न ही फल सब्जी के दाम गिरे हैं मगर सरकार के आंकडे पिछले माह (अक्टूबर) तक कह रहे थे कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित थोक मुद्रा स्फीति शून्य से नीचे चली गई है । यानी देश में थोक वस्तुओं के दामों में जबरदस्त गिरावट आई है। अब नवंबर माह में प्याज और दालों की कीमतें बढने से थोक मूल्य सूचकांक में 1.82 फीसदी का उछाल आया है मगर अभी भी यह शून्य से नीचे ही है और पिछले तेरह माह से लगातार शून्य से नीचे टिका हुआ है। अक्टूबर में जहां थोक मूल्य सूचकांक माइनस 3. 81 फीसदी था, नवंबर में यह बढकर माइनस 1.99 फीसदी था। रिटेल मुद्रा स्फीति में भी उछाल आया है और नवंबर में यह बढकर 14-माह के उच्च स्तर 5.41 फीसदी पहुंच गई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के कारण नवंबर में रिटेल मुद्रा स्फीति और थोक मुद्रा स्फीति दोनों में इजाफा हुआ है। आकंडों के अनुसार खाद्य वस्तुओं की कीमतें निरंतर बढ रही हैं। नवंबर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 2. 3 फीसदी का इजाफा हुआ। अगस्त से अक्टूबर की तिमाही में खाद्य वस्तुओं के दामों में लगातार वृद्धि हुई है। भारतीय मुद्रा रुपया डॉलर की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। इस समय रुपया 27-माह के न्यूनतम स्तर को छू रहा है।इससे साफ है तेल की कीमतों में निरंतर गिरावट और अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार के कारण जो अपेक्षाकृत एडवांटेज मिल रही है, वह अब हाथ से फिसलती जा रही है। इस बात में शक नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार की तुलना में मोदी सरकार के शासन में देश की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत स्थायित्व से निवेशकों का भरोसा बढा है पर देश में व्याप्त असहिष्णु मौहाल ने सब गुड-गोबर कर दिया है। टकराव की राजनीति के चलते संसदीय कार्य भी सुचारु रुप से नहीं चल रहा है। गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल का पारित होना देश हित में है। इससे महंगाई कम हो सकती है मगर राजनीतिक दल इस मामले में भी आम सहमति नहीं बना पा रहे हैं। बहरहाल, आम आदमी को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। उसकी सरकार से ज्यादा अपेक्षा नहीं रहती है। महंगाई आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। सरकारी आंकडे नीति निर्धारण के लिए तो उपयोगी हो सकते हैं मगर इनसे आम आदमी के पल्ले कुछ भी नहीं पडता है। बाजार में अगर दाल-सब्जियां, दूध-घी और आटा-चावल सस्ता है तो उसके अच्छे दिन हैं। और अगर ये सब चीजें महंगी हैं, तो सरकार की स्वच्छ और उज्जवल छवि एव भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन भी उसके किसी काम का नहीं।






