मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

कावेरी जल बंटवारा

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों  से जूझ रही दुनिया में अगला महायुद्ध जल को लेकर हो सकता है, पर्यावरणविद इस बात पर सहमत है। 2025 तक दुनिया की 4 से 5 अरब आबादी को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पडेगा। नासा सैटेलाइट से उपलब्ध तस्वीरों से साफ पता चलता है कि  विश्व  के एक-तिहाई से भी ज्यादा भूगर्भीय जल स्त्रोत (एक्वीफर) सूख चूके हैं और बाकी भी सूखने की कगार पर हैं। बचे-खुचे जल स्त्रोतों के लिए राज्यों और लोगों मे मारी-मारी होना तय है। भारत में तो  इस तरह का परिदृश्य  पहले से ही चल रहा है। नदियों के जल बंटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों में घमासान जारी है। रावी-ब्यास जल बंटवारे पर  पंजाब, हरियाणा अरसे से  एक-दूसरे  के खिलाफ  लामबंद हैं। दक्षिण भारत के दो राज्यों तमिल नाडु और कर्नाटक (तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर राज्य) में कावेरी जल विवाद 19वीं  शताब्दी से चला हुआ है। कालान्तर में केरल और पुडुचेरी भी इस विवाद में  शामिल हो गए। 1976 में चारों राज्यों के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे पर समझौता भी हुआ था मगर इसका पालन नहीं किया गया। कोई भी राज्य अपने हिस्से का एक बूंद पानी भी छोडने को तैयार नहीं है। गत  शुक्रवार को स्ुप्रीम कोर्ट ने  कर्नाटक को बिलगुंडलू डैम से तमिल नाडु को 177.25 टीएमसी (थॉउजेंड मिलियन क्यूबिक) फीट पानी छोडने का आदेश  दिया । 2007 में कावेरी पंचाट  ने तमिल नाडु को 192 टीएमसी पानी दिया था। इस अवार्ड को तमिल नाडु, केरल और कर्नाटक तीनों ने सुप्रीम कोर्ट  में चुनौती दी थी। तमिल नाडु के हिस्से में 14.75 टीएमसी की कटौती को डीएमके समेत राज्य के राजनीतिक दलों ने ताजा फैसले को लोगों से “धोखा“ करार दिया है, मगर किसान संगठन फैसले से संतुश्ट हैं। तमिल नाडु कावेरी डेल्टा फॉरमर्स  वेल्फेयर ऐसोसिएषन की प्रतिक्रिया है कि राज्य के हिस्से में की गई कटौती को बेहतर जल प्रबंधन से पूरा किया जा सकता है। केरल और पुडुचेरी के हिस्से में चूंकि कोई कटौती नहीं की गई है, लिहाजा दोनों राज्य ताजा फैसले से संतुश्ट हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में कावेरी रिवर वाटर मेनेजमेंट बोर्ड गठित करने के भी आदेष दिए हैं। इससे जल प्रबंधन और बेहतर हो सकते है। कोर्ट ने ताजा फैसले के खिलाफ  अपील करने की संभावना को बंद कर दिया है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित राज्यों को फैसला अविलंब लागू करने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। 800 किलोमीटर लंबी कावेरी नदी कर्नाटक, तमिल नाडु और केरल राज्य से बहते हुए समुद्र में मिलने से पहले पुडुचेरी के कराइकल से भी गुजरती है। कावेरी नदी में चार राज्यों के नदी-नालों से भी पानी डाला जाता है। लगभग 740  टीएमसी पानी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। कर्नाटक से कावेरी में 462 टीएमसी पानी डाला जाता है मगर इसे 270 टीएमसी पानी ही मिलता है। तमिल नाडु 227 टीएमसी पानी डालता है मगर राज्य को  419 टीएमसी पानी के इस्तेमाल की अनुमति है। कर्नाटक को सबसे ज्यादा इसी बात का गिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कर्नाटक को कुछ राहत मिली है। बहरहाल, कावेरी जल विवाद के निपटान से हरियाणा सरकार की उम्मीदें जगी है। 34 साल से भी ज्यादा समय से रावी-ब्यास के जल बंटवारे का मामला लटका हुआ है। तीन बार सुप्रीम कोर्ट  के फैसले भी आ चुके हैं मगर हरियाणा को आज तक न्याय नही मिला है। न्याय मिलना तो दूर रहा,  रावी-ब्यास का पानी लाने के लिए प्रस्तावित नहर पर भी पंजाब में मिट्टी डाल दी गई है। नवंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने  हरियाणा के पक्ष में फैसला दिया था। इस पर भी अमल नहीं हो पाया है। मोदी सरकार जल विवादों के लिए स्थाई पंचाट स्थापित करने पर विचार कर रही है। षायद, इससे हरियाणा को न्याय मिले मगर पंजाब के लोग एक भी बूद देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में पंचाट भी क्या कर सकता है।