आम आदमी पार्टौ और विवादों का चोली-दामन का साथ है। अपने पांच साल के अस्तित्व में आम आदमी पार्टी ने समकालीन राजनीति में इतने प्रयोग नहीं किए हैं, जितना वह विवादों में उलझी रही है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर दिल्ली के उप-राज्यपाल और अब मुख्य सचिव से उलझना तो जैसे आप का टॉप एजेंडा हैं। और इसे यूं भी कहा जा सकता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार की बाहें मरोडना केन्द्र में सत्तारुढ भाजपा सरकार का फेवरेट पास्टटाइम है। विवाद भाजपा ने पैदा किया या कांग्रेस ने, मगर अंततोगत्वा, नुकसान अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का ही हुआ है। मंगलवार को दिल्ली के मुख्य सचिव ने अपनी ही पार्टी की सरकार पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की उपस्थिति में पिटाई का आरोप लगाया। मुख्य सचिव अंशु प्रकाश का आरोप है कि मुख्यमंत्री के निवास पर बुलाई गई बैठक में आप विधायक अमानातुल्लाह ने उन्हें कॉलर से पकड कर पीटा। मुख्य सचिव का यह भी आरोप है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आप विधायकों की अफसरों से बदसलूकी लंबे समय से चल रही है। वैसे अमानातुल्लाह पहले भी विवादों में रह चुके हैं। उधर, आम आदमी पार्टी का आरोप है कि मुख्य सचिव यह सब भाजपा के इशारे पर कर रहे हैं। आप नेता दिल्ली पांडेय ने आने पोस्ट में आरोप लगाया है कि अढाई लाख लोगों को पिछले माह राशन नहीं मिलने पर बैठक में स्पष्टीकरण मांगा गया था। मुख्य सचिव ने इस पर यह कहकर जवाब देने से इंकार कर दिया कि वे केवल उप-राज्यपाल के प्रति जवाबदेह हैं। पोस्ट में यह भी आरोप लगाया है कि मुख्य सचिव ने न केवल विधायकों के खिलाफ अपशब्द कहे, अलबत्ता बगैर जवाब दिए बैठक से निकल गए। आप विधायक सौरभ भारद्धाज ने मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि “दिल्ली में राशन व्यवस्था बर्बाद करने की सुपारी किसने ली है तो यह क्यों न मान लिया जाए कि वो अपने आप को बचाने के लिए झूठा नाटक कर रहे हैं। कौन सच्चा है और कौन झूठा, यह तो कोर्ट ही तय करेगा“। बहरहाल, दिल्ली सरकार के कर्मचारी और आईएएस एसोसिएशन ने इस मामले में मुख्य सचिव का साथ देते हुए हडताल पर जाने की धमकी दी है। दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटिव सब-ऑडिनेट सर्विसेज एसोसिएशन (दास) ने तो ताजा मामले को संवैधानिक संकट जैसा बताया है। कर्मचारियों की एकता भी यही संदेश दे रही है कि दिल्ली की आप सरकार लगातार अपनी क्रेडिब्लिटी खोती जा रही है। मुश्किलों के एक के बाद दूसरे भंवर में फंस कर आम आदमी पार्टी का बंटाधार होने से रहा। विवादों में उलझ कर आम आदमी पार्टी स्वंय विरोधी दलों की मदद कर रही है। देश की सियासत में कुछ अलग करने के जज्बे से जन्मी आम आदमी पार्टी उत्साही युवाओं को उनकी मंजिल तक ले जाने में बुरी तरह से विफल रही है। आम आदमी पार्टी भ्रष्ट व्यवस्था, घिसी-पिटी सियासत और दागी नेताओं से ऊब चुके लोगों की उम्मीद की किरण थी मगर तीन साल के कार्यकाल में आप ने जनता को भारी निराश किया है। पांच साल से भी कम समय में अरविंद केजरीवाल के आंदोलनकारी सहयोगी, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव उनका साथ छोड गए हैं। कुमार विश्वास बागी हो गए हैं। जब कभी आप मजबूत होती नजर आती है, पार्टी विवादों में उलझ जाती है। निसंदेह, दिल्ली सरकार की उपलब्धियों को भी नकारा नहीं जा सकता। दिल्ली में स्वास्थय सेवाएं पहले से कहीं बेहतर हैं। सरकार की “मोहल्ला क्लीनिक“ योजना और शिक्षा सुधार योजना के सकारात्मक परिणाम निकले हैं। मुफ्त बिजली-पानी ने भी आम आदमी को लुभाया है। पार्टी ने पिछले एक साल से बयानबाजी छोडकर काम करने पर ज्यादा ध्यान दिया है मगर ताजा विवाद से पार्टी को नुकसान हो सकता है।
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