मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

क्या मार्केट के अच्छे दिन गए?

पहली फरवरी को बजट पेश  होने के बाद से देश  के  शेयर बाजार में हाहाकार मची हुई है। सोमवार को लगातार पांचवे दिन बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट जारी रही। सोमवार को सेंसेेक्स 309 अंक की गिरावट के साथ 34,757 पर बंद हुआ। शुक्रवार को सेंसेक्स और निफ्टी में 15 माह की सबसे बडी 2 फीसदी की गिरावट आई थी। सोमवार को कारोबार के दौरान सेंसेक्स 545 और निफ्टी 173 अंक तक टूट चुका था मगर बाद में कुछ संभला। बाजार में लगातार गिरावट से टाटा कंसल्टेंसी  को एक  ही दिन में 21251 करोड़ रु का नुक्सान उठाना पड़ा  है। बजट में लॉन्ग टर्म  केपिटल गेन टैक्स (एलटीसीजी) के लगने से मार्केट में बिकवाली और  प्रॉफिट बुकिंग का जोर है हालांकि सरकार  एलटीसीजी को गिरावट का प्रमुख कारण मानने से बच रही है। सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त सचिव हंसमुख अढिया दोनों ने जोर देकर कहा कि शेयर बाजार में बिकवाली के लिए  लॉन्ग टर्म  केपिटल गेन टैक्स नही, अलबत्ता ग्लोबल फेक्टर्स  जिम्मेदार है। वैश्विक  बाजार में इन दिनों खासी उठापटक चल रही है। अमेरिकी फेडेरल रिजर्व द्वारा  एक फरवरी को ब्याज दरें यथावत रखे जाने के कारण  बांड यील्ड बढने की संभावना से  शुक्रवार को ग्लोबल मार्केट मे भी भारी गिरावट आई। शुक्रवार को डॉउ जोन्स में 666 अंक गिरा। बांड यील्ड में वृद्धि को ब्याज दर बढने के संकेत माने जाते हैं। ग्लोबल मार्केट में  शुक्रवार की गिरावट का असर सोमवार को एशिया की मार्केटस में देखने को मिला। जापान का बेंचमार्क  इंडेक्स नेक्कई 222 अंक गिरा। शुक्रवार को नेक्कई में 565 अंक की गिरावट आई थी। पूरे वैश्विक  बाजार में यही स्थिति है। बाजार में मंदी को देखते हुए  वित्त मंत्री की इस बात में वजन है कि भारतीय शेयर बाजार की गिरावट के लिए वैश्विक  बाजार की मंदी जिम्मेदार है। मगर मार्केट एक्सपर्ट इस बात से सहमत नहीं है।  लॉन्ग टर्म  केपिटल गेन टैक्स के अलावा  और भी कई कारण हैं। बजट में प्रस्तावित 3.5 फीसदी राजकोषीय  घाटा भी  बाजार में उथल-पुथल के लिए पर्याप्त हैं। घाटे की यह सीमा बाजार को निराश  कर रही है क्योंकि इससे मुद्रा स्फीति बढने की पूृरी-पूृरी संभावना है। बाजार  3.2 फीसदी (जीडीपी का) राजकोषीय   घाटे की उम्मीद कर रहा था। वित्त मंत्री  का भी पहले यही लक्ष्य था मगर फार्म सेक्टर के लिए विशाल 14 लाख करोड रु का बजट और दुनिया की सबसे बडी हैल्थकेयर योजना के लिए अतिरिक्त संसाधन की दरकार है।  चुनावी साल में इसे और ज्यादा टेक्स लगाकर भरा नहीं जा सकता था। इसलिए बजट घाटा और ज्यादा बढ सकता है। किसानों को उनके उत्पाद का लागत से डेढ गुना दाम मुहैया कराने के वायदे ने भी बाजार को भयभीत कर रखा है। इससे कीमतें बढने की जबरदस्त संभावना है। इससे भी शेयर मार्केट परेशान  है। रिजर्व बैक भी मुद्रा-स्फीति के बढने की आषंका जता चुका है। भारत में भी 10-वर्षीय  बांड यील्ड में जुलाई 2017 से अब तक 80 फीसदी का उछाल आ चुका है। इससे ब्याज दरें बढने की संभावना बनी हुई है।  इसी सप्ताह आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा करने जा रहा है और मौजूदा स्थिति में ब्याज दरों को यथावत रखे जाने की उम्मीद जताई जा रही है। मगर अगली मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरें बढ सकती हैं। पिछले दो साल के दौरान आरबीआई ब्याज दरों (रेपो रेट) में दो फीसदी की कटौती कर चुका है और इस समय रेपो रेट 6 फीसदी के न्यूनतम स्तर ओअर है। अब और ज्यादा की कोई गुंजाइश  नहीं है। आरबीआई का मार्च, 2018 तक मुद्रा स्फीति को चार फीसदी से नीचे रखना का लक्ष्य भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में मुद्रा स्फीति को मार्च, 2018 तक 4 फीसदी से नीचे लाने का सपना दिखाया गया था। मगर किसानों के कर्ज माफी योजना, सरकारी बैंकों के खराब (एनपीए) कर्जे और अब बजट के लोक-लुभावने वायदों से मुद्रा स्फीति का बढना तय है। इस स्थिति में अच्छे दिन तो  आने से रहे़।