सरकारी बैंकों को लूटने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। पंजाब नेशनल बैंक को 11,500 करोड रु का चूना लगाने वाले ज्वैलरी व्यापारी नीरव मोदी के मामले की आग अभी ठंडी भी नहीं पडी थी कि सरकारी बैकों के लगभग 3700 करोड रु न लौटाने का एक और मामला सामने आया है। ताजा मामले में रोटोमैक पेन निर्माता कंपनी के मालिक बिक्रम कोठारी के खिलाफ सात सरकारी बैंकों का 3700 करोड रु दबाने के लिए सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की है। सोमवार को सीबीआई ने कानपुर में बिक्रम कोठारीज़ उनकी पत्नी और पुत्र से पूछताछ भी की। बिक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक ऑफ बडौदा (बीओबी) ने धोखाधडी की शिकायत की है। सीबीआई ने इसी शिकायत के बाद यह कार्रवाई की। बैंक आफ बडौडा के साथ-साथ बिक्रम कोठारी ने बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ महाराश्ट्र, इंडियन औवरसीज बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के 3695 करोड रु दबा रखे हैं। फरवरी, 2017 में बिक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित किया गया था। इस पर बिक्रम कोठारी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और उन्हें राहत भी मिल गई मगर बैंकों का पैसा नहीं लौटाया। इसके बाद बैंकों ने अपना पैसा वसूलने के लिए उनकी संपत्ति कुर्क की मगर सात बैंको का अभी भी लगभग 3700 करोड रु बकाया है। बिक्रम कोठारी मशहूर ”पान पराग“ बनाने वाले घराने से है। 1973 में मनसुख भाई कोठारी ने अपने दो पुत्र बिक्रम और दीपक के साथ पान पराग के नाम से पान मसाला बनाना शुरु किया था और यह जल्द ही हाथों-हाथ बिकने भी लगा। पान पराग की लोकप्रियता का इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अस्सी के दशक में अग्रणी बालीवुड अभिनेता अशोक कुमार और शम्मी कपूर पान पराग के विज्ञापन में नजर आते थे। तब “बारातियों का स्वागत पान पराग से करें“ खासा लोकप्रिय हुआ था। मगर पान मसाले के कारण मुख के कैंसर के बढते मामले सामने आने से इसकी खपत एकदम घट गई। 1992 में बिक्रम कोठारी ने पान पराग से अलग होने के बाद रोटोमैेक नाम से पेन बनाने का कारखाना खोला। नब्बे के दशक में मशहूर अभिनेत्री रवीना टंडन ने रोटोमैक के विज्ञापन में नजर आती थी। बहरहाल, बिक्रम कोठारी के मामले में गनीमत यह है कि वे अभी भी देश में ही है हालांकि पहले खबर आई थी कि वे भी विदेश भाग गए हैं। ताजा मामले से यह कडवी सच्चाई फिर उजागर हुई है कि सराकारी बैकों की कार्यशैली में भारी खामियां हैं और भ्रष्टाचार ने सारी हदें पार ली हैं। पंजाब नेशनल बैंक में घूसखोर के कारण ही इतना बडा घोटाला हुआ है। इससे पहले सरकारी बैंक आईडीआईबी ने नियमों को दर किनार कर शराब कारोबारी विजय माल्या को भरी -भरकम कर्जा दिया था। जाहिर है यह इस मामले में संबंधित अधिकारियों की मुठ्ठी गर्म की गई थी। राजनीतिक हस्तक्षेप और घूसखोरी ने सरकारौ बैकों की लुटिया डूबो कर रख दी है। पीएनबी मामले में न तो इंटरनल ऑडिट, न ही सतर्कता अधिकारी और न ही आरबीआई की इंस्पेक्शन टीम लंबे समय से जारी फर्जीवाडे को डेटेक्ट कर पाई। सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंको का निगरानी और जांच पडताल सिस्टम कहीं ज्यादा फुलप्रूफ है। सरकार को रिकैपटिलाइजेषन की बजाय सरकारी बैंको में अऔर ज्यादा निजी हिस्सेदारी बढानी चाहिए। आंकडे इस बात के गवाह है कि सतर के दशक में बेंकों के निजीकरण के बाद इनमें फर्जीवाडे के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी मानते हैं कि सरकारी बैकों में निगरानी, जांच पडताल और सख्त रेगुलेशन की कमी के कारण ही फर्जीवाडी के मामले बढ रहे हैं। सरकारी बैकों को बचाना है तो इनमें भी निजी हिस्सेदारी बढानी होगी।
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