बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

मालद्धीपः भारत की अग्नि परीक्षा

मालद्धीप के  मौजूदा  हालात में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण  मानी जा रही है। पिछले कई महीनों से  मालद्धीप में भारी राजनीतिक उठापटक चल रही है। बढते राजनीतिक गतिरोध के बीच राष्ट्रपति  अब्दुल्ल्ला यमीन ने 15 दिन के लिए देश  में इमरजेंसी लगा दी है। राष्ट्रपति ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के बाद उठाया है। मालद्धीप के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने के आदेश  दिए थे। राष्ट्रपति ने अदालत के आदेश  मानने से इंकार कर दिया है।  इतना ही नहीं सेना ने राष्ट्रपति के आदेश  पर फैसला सुनाने वाले चीफ जस्टिस अब्दुल्ल सईद और एक और जज को गिरफ्तार भी कर लिया है। इससे मालद्धीप की जनता सडकों पर उतर आई  हे और लोगों और पुलिस के बीच जगह-जगह झडपें जारी रहने की खबर है। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को अपदस्थ  करने के बाद से राष्ट्रपति अब्दुल्ल्ला यमीन लगातार देश  की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सत्ता को पूरी तरह से अपनी मुठ्ठी में कैद करने की कोशिश  करते रहे हैं। इस क्रम में यमीन ने अपने सभी विरोधियों और आलोचकों को जेल में डाल दिया।  मोहम्मद नसीद   देश  के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति थे ।  नशीद   ने 2008 में तीस साल से सत्तासीन तत्कालीन राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल ग्य्यूम को हराया था। 2012 में नशीद  ने रहस्समय परिस्थियों में राष्ट्रपति पद छोड दिया। तब नशीद का कहना था कि उन्हें पद छोडने पर विवश  किया गया।  मार्च, 2015 में नशीद  को मालद्धीप के “ आतंक-निरोधी कानून“ के तहत एक जज को गिरफ्तार करवाने के अपराध में 13 साल की जेल की सजा चुनाई गई। तब एमनेस्टी इंटरनेशल ने  इस फैसले को “ राजनीतिक  द्धेषपूर्ण “ बताया था। अमेरिका ने भी ट्रायल के दौरान निष्पक्ष  पद्धति का पालन नहीं किए जाने पर रोष  जताया था।  नशीद को ब्रिटेन ने राजनीतिक शरण दे रखी हैै। मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति नशीद   ने भारत से “मालद्धीप के “बिगडते हालात“ में तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। भारत को नसीद   का समर्थक माना जाता है। यमीन-नशीद के बीच की रस्साकशी  में भारत पीछे से अपनी भूमिका निभा रहा था। 2008 में  मालद्धीप में पहली लोकतांत्रिक सरकार के अपदस्थ किए जाने पर भारत की भूमिका पर सवाल उठाया गया था। तब पर्यवेक्षकों का मानना था कि भारत को खुलकर नशीद का समर्थन करना चाहिए था। मगर भारत किस भी संप्रभु राश्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करता है। इसलिए न तो तब और न ही अब भारत खुलकर किसी भी पक्ष का समर्थन करेगा और तटस्थ ही रहेगा। ताजा हालात में मालद्धीप में मानवाधिकारों के हनन और “ दमनकारी“ कार्रवाईयों पर भारत, अमेरिका समेत अंतरराश्ट्रीय दबाव बढ सकता है। राश्ट्रपति अब्दुल्ल्ला यमीन चीन के ज्यादा करीब हैं, इसलिए वे बीजिंग से ताजा मामले में भी खुले समर्थन की उम्मीद रखते है। मगर चीन ने आज तक किसी भी मामले में वैष्विक ताकतों के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला है और न ही किसी देष का समर्थन किया है। उत्तर कोरिया का मामला इसकी मिसाल है।  भारत के ताजा हालात में तटस्थ रहने पर मालद्धीप चीन के और करीब जा सकता है।  नषीद तो भारत के समर्थक थे ही, राश्ट्रपति मॉमून अब्दुल ग्य्यूम के समय मे भी मालद्धीप चीन की अपेक्षा भारत के ज्यादा करीब रहा है। मग्गर पिछले एक दषक से भारत मालद्धीप को लेकर कुछ ज्यादा ही तटस्थ रहा है। इसका सीधा फायदा चीन को मिला है। चीन ने भारत को चौतरफा घेर रहा है। दक्षिण एषियाई मुल्कों में भारत, चीन के बढते प्रभाव के समक्ष उतरोत्तर कमजोर पडता नजर आ रहा है। आर्थिक हो या सामरिक मदद, भारत की तुलना में चीन अधिक स्मार्ट साबित हो रहा है। भारत इस स्थिति को कैसे संभालता है, यही भारतीय कूटनीति की अग्नि परीक्षा है।