पांच साल पहले 2013 में लोकपाल की स्थापना के लिए समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन को भाजपा ने बढ-चढ कर समर्थन किया था और सत्ता में आने पर तुरंत लोकपाल नियुक्त करने का वायदा किया था। अब कहां है भ्रश्टाचार को मिटाने वाला यह “जादूगर“ (ओम्बड्समैन)। संसद मे 2014 में लोकपाल की नियुक्ति के लिए बाकायदा कानून भी पारित हो चुका है। मगर इसके बावजूद मोदी सरकार चार साल में भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई है। षुक्रवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी कि पहली मार्च को लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति की बैठक हो रही है। देष की षीर्श अदालत में एक स्वंयसेवी संस्था द्वारा लोकपाल की नियुक्ति के लिए दायर याचिका पर मोदी सरकार ने यह जानकारी दी। लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीष के अलावा विपक्ष के नेता भी हैं। मगर संसद में कोई भी अधिकृत विपक्षी नेता नहीं है, इसलिए सरकार को लोकपाल की नियुक्ति टालने का वाजिब बहाना मिल गया। पिछले साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि विपक्ष का अधिकृत नेता नहीं होने से लोकपाल की नियुक्ति को टाला नहीं जा सकता। कोर्ट ने निर्देष दिए थे कि लोकपाल चयन समिति की बैठक बगैर विपक्षी नेता के भी आयोजित की जा सकती है। इस बात को भी लगभग साल हो गया है मगर बैठक फिर नहीं हुई। और अब सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान कहीं जाकर सरकार ने सूचना दी है कि पहली मार्च को चयन समिति की बैठक हो रही है। इन सब बातों से यही लगता है कि मोदी सरकार भी संप्रग सरकार की तरह जब तक संभव हो, लोकपाल की नियुक्ति को टालती रही है। आखिर देष को हर छोटी-बडी बात के लिए न्यायपालिका की षरण में ही क्यों जाना पडता है़? चार साल में मोदी सरकार विपक्ष के अधिकृत नेता संबंधी नियमों में संषोधन तक नहीं कर पाई है। नियमानुसार जिस पार्टी के पास लोकसभा की कुल सदस्यता के कम-से-कम दस फीसदी सांसद हैं, उसी दल को अधिकृत विपक्षी दल की मान्यता दी जा सकती है। लोकसभा के 545 सदस्य हैं और अधिकृत विपक्षी नेता की मान्यता के लिए किसी भी दल को कम-से-कम 55 सदस्यों की जरुरत है। लोकसभा में सबसे बडी पार्टी कांग्रेस के पास केवल 44 सांसद हैं, इसलिए पार्टी नेता को अधिकृत विपक्ष दल का दर्जा नहीं मिल पाया है। कांग्रेस नेता को अधिकृत नेता का दर्जा देने के लिए संबंधित नियमों में संषोधन की जरुरत है मगर सरकार यह भी नहीं कर पाई है। सुप्रीम कोर्ट की टीका-टोकी के बाद मोदी सरकार ने लोकसभा में सबसे बडे चिपक्षी दल को लोकपाल चयन समिति और सीबीआई प्रमुख चयन समिति में षामिल जरुर कर लिया। भाजपा ने भ्रश्टाचार उन्मूलन को लोकसभा चुनाव प्रचार का प्रमुख मुददा बनाया था। संप्रग सरकार के षासन में फैले कथित व्यापक भ्रश्टाचार मामलों को भी भाजपा ने खूब उछाला था और लोगों को भ्रश्टाचार से निजात दिलाने का वायदा किया था। हाल ही में पंजाब नेषनल बैंक से हीरा कारोबारी नीरव मोदी की धोखाधडी और रोटोमैक कंपनी के मालिक के घोटालेे से सरकार की छवि पर छींटे पडे हैं। वीरवार को ट्रंासपेरेंसी इंटरनेषनल की रिपोर्ट में भारत को फिर दुनिया के भ्रश्टतम देषों की श्रेणी में षुमार किया गया है। ग्लोबल करप्षन पर्सेपषन इंडेक्स में भारत इस बार दो पायदान फिसला है। यानी भारत में भ्रश्टाचार कम होने की बजाए और बढा है। यही नहीं रिपोर्ट में भारत को पत्रकारिता और स्वंयसेवी संस्थाओं के लिए काफी असुरक्षित बताया गया है। रिपोर्टं में भारत की फिलिपींस और मालदीव से तुलना और भी अपमानजनक है। इसका मतलब यह है कि मोदी सरकार फिलिपींस की रोड्रिगो दुतेर्ते और मालदीप के यामीन अब्दुल यमीन जैसी बदनाम है। संभवतय, लोकपाल की नियुक्ति के बाद स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
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