शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

भाजपा को जोर का झटका

प्रचलित जुमला है, “काठ की हंाडी बार-बार नही चढती“। यह कहावत राजस्थान में भाजपा के संदर्भ में सौ फीसदी चरितार्थ होती दिख रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 मेंसे 25 सीटों पर विजय फताका फहराने वाली भगवा पार्टी का उप चुनाव में कांग्रेस ने सुपडा ही साफ कर दिया। राज्य की दोनों लोकसभाई सीटों और एक विधानसभाई हलके में कांग्रेस को जबरदस्त जीत मिली है और पार्टी के प्रत्याशी  रिकार्ड  मतों से जीते हैं। भाजपा की हार इतनी  शर्मनाक है कि पार्टी के प्रदेश  प्रभारी अविनाश  राय खन्ना ने इसे “रहस्यमय“ करार दिया है। इसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उप-चुनाव में भाजपा की करारी हार से दीवारों पर लिखी इबारत  साफ-साफ  पढ़ी  जा सकती है।   धार्मिक धु्रवीकरण की आड लेकर मतदाताओं को लंबे समय तक पटाया नहीं जा सकता। जनता ठोस कम और जवाबदेही चाहती है। अजमेर लोकसभाई हलके के परिणाम यही संकेत दे रहे हैं। अजमेर गो-रक्षा और हिंदुत्व के मुद्दो को लेकर खासी चर्चा  में रहा है और भाजपा ने इन्हें भरपूर भुनाने की कोशिश  भी  की। न तो हिंदुत्व और न ही  संगठन कौशल और जाति समीकरण भाजपा के काम आए। कांग्रेस ने  81,000 से भी अधिक मतों के अंतर से यह सीट भाजपा से छीन ली। अलवर लोकसभा हलके में कांग्रेस की जीत का अंतर 1 लाख 11 हजार से भी ज्यादा है। भाजपा ने उप-चुनाव में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को भी भुनाने के लिए  मोदी का बाडमेर दौरा भी करवाया। बाडमेर में प्रधानमंत्री के हाथों ऑयल रिफाइनरी का काम  शुरु करवाया गया। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कामकाज की तारीफ भी की मगर मतदाताओं को यह भी रास नहीं आया।  मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद प्रचार की कमान संभाल रखी थी और दोनों लोकसभाई हलके, भीलवाडा विधनसभाई हलके में उन्होंने धुंआधार प्रचार भी किया। मतदाताओं को लुभाने के लिए  वसुंधरा राजे ने जातिवर समूह बनाकर विभिन्न लोगों  से अलग-अलग मुलाकात भी की मगर उनका यह प्रयोग भी नहीं चला। इससे साफ है कि मतदाताओं में भाजपा के प्रति जबरदस्त रोष  है और उप-चुनाव में उनका गुस्सा फूटा है। कांग्रेस को तो बैठे-बिठाए सब कुछ मिल गया है। पिछले चार साल में पार्टी ने कोई बडा जन संघर्ष  नहीं किया और न ही कोई ऐसा ज्वलंत मुद्दा उठाया जिससे पार्टी का जनाधार और ज्यादा सषक्त होता। कांग्रेस को एंटी-इंकूबेंसी का पूरा फायदा मिला है। मतदाताओं में बेरोजगारी, करप्शन , कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की उपेक्षा से सरकार के प्रति भारी गुस्सा है। हर बार यही हो रहा है। 1977 से 1980 की करीब अढाई साल की अवधि को छोडकर 1990 तक राजस्थान की सत्ता पर कांग्रेस का एकाधिकार रहा है। 1977 में जनता पार्टी की प्रचंड लहर ने पहली बार राजस्थान से कांग्रेस राज को उखाडा था और भैरो सिंह षेखावत राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे। शेखावत  कद्दावर नेता थे और 1990 से 1998 तक (दिसंबर 1992 से दिसंबर 1993 के राश्ट्रपति  शासन को छोडकर) फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। 1998 के बाद कांग्रेस के अशोक  गहलोत और भाजपा की वसुंधरा राजे बारी-बारी दो-दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं मगर दोनों ही लगातार दूसरी बार फिर से सत्ता पर काबिज नहीं हो पाए। राजस्थान के ताजा उपचुनाव नतीजे भी यही कह रहे हैं कि भाजपा फिर से सत्ता में लौटती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस राजस्थान के उपचुनाव नतीजों पर खूब इतरा रही है मगर पश्चिम  बंगाल में पार्टी का  प्रदर्शन  बेहद खराब रहा है। पश्चिम  बंगाल की एक लोकसभाई और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई है। भाजपा का प्रदर्शन  कांग्रेस से बेहतर रहा है।   2019 के लोकसभा चुनाव में अगर पार्टी को अच्छा  प्रदर्शन  करना है, तो कांग्रेस को पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश  जैसे बडे राज्यों  मैं  अपना जनाधार बढाना होगा।