उत्तर प्रदेश के कासगंज में गणतंत्र दिवस पर हुई सांप्रदायिक हिंसा से देश आहत हुआ है। हिंसा की वजह गणतंत्र दिवस पर निकाली गई तिरंगा यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान हिंसक झडप में एक व्यक्ति की मौत हो गई और एक व्यक्ति गंभीर रुप से घायल हो गया था। तिरंगा यात्रा के मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरने पर दंगा फूटा। मुस्लिम समुदाय ने भगवा संगठनों की तिरंगा यात्रा पर आपत्ति जताई और इस बात पर दो समुदाय में झडप हो गई। नौबत गोलीबारी तक पहुंच गई। गोलियां चलने से दो युवक घायल हो गए और बाद में एक की मौत हो गई। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। इस दुखद घटना को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। स्थिति बिगडती देख प्रशासन को धारा 144 लगानी पडी और लगभग दो दर्जन लोगों को हिरासत मे लेना पडा। इस घटना के पांच दिन बाद बुधवार को हिंसा फैलाने के प्रमुख आरोपी को गिरफ्तार किया जा सका। तरह-तरह की अफवाहों के फैलने के कारण प्रसाशन को इंटरनेट सेवाएं तक बंद करनी पडी। कासगंज अभी भी सांप्रदायिक हिंसा में झुलस रहा है। शरारती तत्व कासगंज को ही नहीं, पूरे राज्य को सांप्रदायिक हिंसा की भठ्ठी ंमें झोंकने पर आमदा है। कासगंज की घटना ने इस कडवी सच्चाई को फिर उजागर किया है कि कटटरवादी और शरारती तत्व देश में सांप्रदायिक सौहार्द को छिन्न-बिन करने का कोई अवसर नहीं छोडते हैं। कासगंज बेहद शांतिप्रिय शहर है और सालों से यहां सांप्रदायिक सौहार्द बना हुआ है। सांप्रदायिक हिंसा जैसी कोई घटना तो सालों से नहीं हुई। यह क्षेत्र अन्य पिछडा बहुल क्षेत्र है और वर्षों से हिंदू और मुसलमान मिल जुल कर रह रहे हैं। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि शांति प्रिय कासगंज का सांप्रदायिक सौहार्द देश के 69वें गणतंत्र दिवस पर बिखर गया? दोनों ही पक्ष हिंसा के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे है। तिरंगा यात्रा के पक्षधरों का आरोप है कि उनकी यात्रा को रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय ने जानबूझ कर हिंसा फैलाई। घटना भी यही बयां करती है। हिंसा के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगना उस बात का प्रमाण है। भाजपा के सीनियर नेताओं ने कासगंज की हिंसा के लिए पाकिस्तान समर्थक तत्वों को जिम्मेदार माना है। मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि भगवा संगठनों ने सांप्रदायिक सौहार्द भंग करने की मंशा से ही तिरंगा यात्रा निकाली थी। यात्रा में तिरंगे कम, भगवा झंडे कही ज्यादा थे। और यह सब मुसलमानों को चिढाने के लिए किया गया था। हिंसा भडकते ही यात्रा निकालने वाले घटनास्थल से चुपचाप निकल लिए। बहरहाल, इस मामले में संबंधित पक्षों से ज्यादा प्रशासन दोषी है। मुस्लिम बहुल इलाके में भगवा संगठनों की तिरंगा यात्रा निकलने से सांप्रदायिक सौहार्द छिन्न-बिन होगा, इस बात की पूरी संभावना थी। फिर इस यात्रा की अनुमति क्यों दी गई़? अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यात्रा निकालने की अनुमति दी भी गई थी या नहीं। कासीगंज की घटना के बाद आगरा प्रशासन ने बुधवार को बडी चतुराई से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की तिरंगा यात्रा को शुरू र होते ही संभाल लिया। यही काम कासगंज जिला प्रशासन भी कर सकता था। यह स्थिति बेहद दुखद है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में सांप्रदायिक सौहार्द कायम नहीं रह पाया है और अगर कहीं कायम है तो सरकार और प्रशासन इसे संभाल नहीं पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार के सत्ता में आने के बाद से राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को छिन्न-बिन करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलना, लखनऊ में वक्फ बोर्ड की दीवारों पर भगवा रोकने पोतना और हर राष्ट्रवादी मुसलमानों को पाकिस्तान समर्थक के ताने देना जैसी घटनाएं सांप्रदायिक तनाव के लिए काफी है। कासगंज की स्थिति फिर न पनपे, उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को राज धर्म निभाने पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
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