बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

सजायाफ्ताओं की नेतागिरी

सजायाफ्ता नेताओं को  अगर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व करने, पार्टी टिकट बांटने और यह तय करने कि किसे मंत्री बनाया जाए की कानूनन  छूट हो तो मान लेना चाहिए कि देश  की सियासत बुरे दिन से गुजर रही है। और क्या यह लोकतंत्र  का मजाक नहीं है?  सोमवार को मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय बेंच ने सजायाफ्ता नेताओं को ताउम्र चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जब सजा याफ्ता नेता खुद चुनाव नहीं लड सकता, फिर वह  पार्टी का मुखिया कैसे रह सकता है और उसे प्रत्याशियों को चुनने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट में सजा याफ्ता नेताओं को आजीवन चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने के लिए जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुपीम कोर्ट  ने केन्द्र से इस मामले में अपना स्टैंड स्पष्ट  करने के लिए कहा है। यह याचिका भाजपा के नेता द्वारा दायर की गई है और इसमें कहा गया है कि कानून में स्पष्ट  प्रावधान नहीं होने के कारण कई सजायाफ्ता नेता सियासत और सत्ता का सुख भोग रहे हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मार्च  को होगी। इस याचिका के जवाब में निर्वाचन आयोग का कथन है कि उसके पास ऐसी कोई पॉवर नहीं जिससे सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद संभालने से रोका जा सके।  इस मामले में  आयोग ने सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रदद करने का अधिकार मांगा है। कानून में व्याप्त खामियों की वजह से सजायाफ्ता नेता राजनीतिक दल बनाकर अपने समर्थको से चुनाव लडाकर सता में काबिज हो जाते हैं।  सुप्रीम कोर्ट  अगर सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद ग्रहण करने से प्रतिबंधित कर देता है, तो इसका सीधा असर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री इनेलो नेता ओम प्रकाश  चौटाला और राष्ट्रीय  जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पर पडेगा। दोनों नेता सजायाफ्ता हैं और इस समय जेल में बंद हैं। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है,  अक्सर सजायाफ्ता नेता जनादेश  की बात कहकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। मगर जनादेश  भी कानून के दायरे को लांघ नहीं सकता। देश  में गाहे-बगाहे चुनाव सुधारों की चर्चा होती रही है मगर क्रांतिकारी चुनाव सुधार आज तक नहीं लाए जा सके  हैं। इसके विपरीत सरकार  ऐसे कानून बनाती है, जिससे सजायाफ्तता  अथवा जेल में बंद  नेताओं की मदद हो सके। 2013 में संप्रग सरकार ने जन प्रतिनितिधि (पीआर)  एक्ट 1951 में संशोधन करके जेल में बंद नेताओं को राहत प्रदान की थी। तब सरकार का कथन था कि अक्सर किसी नेता  को चुनाव लडने से रोकने के लिए उस पर झूठा आपराधिक मामला दर्ज  करवाकर चुनाव लडने से रोका जाता है। सरकार ने पीआर एक्ट में इस बात का प्रावधान किया कि जेल में बंद व्यक्ति भले ही  मतदान नही कर पाए, पर अगर मतदाता सूची में उसका नाम  दर्ज  है, तो वह जेल से भी चुनाव लड सकता है। इससे पहले 2013 में ही सुप्रीम कोर्ट  ने जेल में बंद अथवा पुलिस हिरासत में रखे गए नेताओं के  विधान सभा चुनाव लडने से रोक लगा थी। शीर्ष  अदालत ने व्यवस्था दी थी कि जेल अथवा पुलिस हिरासत में बंद व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता और क्योंकि वह वोट नहीं डाल सकता, इसलिए वह चुनाव नहीं लड सकता। विधानसभा चुनाव लडने के लिए वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य  है। इस फेसले की काट के लिए यह संशोधन किया गया था।  देश  के लिए यह  र्म की बात है कि लोकतंत्र को सशक्त करने वाले चुनाव सुधारों के लिए भी न्यायपालिका को ही पहल करनी पड रही है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा चुनाव सुधारों को लेकर बडी-बडी बातें करती थी मगर चार साल बीत जाने पर भी इस मामले में कुछ विशेष  नहीं हो पाया है। सजायाफ्ता नेताओं को सियासत से बाहर रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए नितांत जरुरी  है।