राष्ट्रीय स्वमसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के सेना संबंधी बयान पर गैर-भाजपाई नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं आना अपेक्षित है। भारत में इस समय राष्ट्रीय स्वंय सेवक सबसे बडा एवं ताकतवर सामाजिक संगठन है। संघ ने कांग्रेस के सेवा दल और काडर-बेेस्ड वाम पंथी दलों को कहीं पीछे छोड दिया है। भाजपा को केन्द्र और राज्यों की सत्ता में लाने में भी संघ की अहम भूमिका रही है। इस स्थिति में जाहिर है आरएसएस गैर-भाजपाई दलों की आंख की सबसे बडी किरकिरी है। संघ के खालिस दक्षिणपंथी एवं हिंदुवादी सोच भी गैर भाजपाई दलों के लिए चिंता का विशय है। इसीलिए, संघ नेताओं की किसी भी छोटी-बडी बात पर गैर-भाजपाई दलों को देष की अखंडता पर प्रहार लगती है। रविवार को बिहार में स्वंयसेवकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अगर देष को जरुरत पडी और संविधान इस बात की अनुमति दे, तो संघ तीन दिन में अपनी सेना खडी कर सकता है। भागवत का यह कथन यहां तक तो आलोचकों को भी स्वीकार्य हो सकता है मगर संघ प्रमुख ने यह कहकर आग में घी डाल दिया है कि सेना को सैनिकों को प्रशिक्षित करने में छह-छह माह लग जाते हैं, संघ यह काम तीन में पूरा कर सकता है। इसके यह मायने लगाए जा रहे हैं कि संघ सैनिकों को प्रशिक्षित करने में सेना से ज्यादा सक्षम है। भारत में “बात का बतगंड“ बनाने और “बाल की खाल खींचने“ की बुरी परंपरा है। संघ प्रमुख का यह कहना भर ही था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार सुबह टवीट करके भागवत के इस कथन को षहीदों और सैनिकों का घोर अपमान करार दे दिया। राहुल के अलावा आलोचकों ने इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि संघ प्रमुख का यह बयान जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक से लड रही सेना का भी अपमान है और उन्हें हतोत्साहित कर सकता है। सोमवार को संघ प्रवक्ता मनमोहन वैद्य को इस पर स्पश्टीकरण भी देना पडा। वैसे इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि संघ प्रमुख की नीयत में कोई खोट नहीं है। उन्होंने यह बयान मौजूदा हालात को सामने रखकर दिया है। जम्मू-कश्मीर के हालात बेहद खराब हैं और सेना की तैनाती के बावजूद स्थिति दिन-ब-दिन बद-से-बदतर होती जा रही है। सुरक्षा कर्मियों के षिविरों पर आए रोज हो रहे आतंकी हमलों में सैनिकों की षहादत पर देषवासियों का खून खौल रहा है। हर हमले के बाद आतंकियों के आका पाकिस्तान को सबक सिखाने की डींगे हांकी जाती है मगर आतंकी हमले रुके नहीं रुक पा रहे हैं। पूरी दुनिया में इस जमीनी हकीकत को माना जाता है कि सेना को आंतरिक मामलों में बहुत लंबे समय तक तैनात नहीं किया जाना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह है कि आर्मी दुष्मनों से बहादुरी से लड सकती है मगर अपने लोगों से नहीं लड सकती। मोदी सरकार की कष्मीर नीति में भी खोट है कि कष्मीर में बंदूक थामने वाला हर युवक पाकिस्तानी “आतंकी“ है। सच्चाई यह भी है कि बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से बदहाल युवक आसानी से आतंकी संगठनों के चंगुल में फंस जाते हैं। बहरहाल, कष्मीर के मौजूदा हालात में यक्ष प्रष्न यह भी है कि कष्मीर जैसे हालात से निपटने के लिए अलग से सेना जैसी प्रषिक्षित आर्मी का गठन किया जाना चाहिए। मगर भारत में “बनाना“ आर्मी का खडा किया जाना तरह-तरह की समस्याएं पैदा कर सकता है। वैसे भी रोबोट और आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस (एआई) के जमाने में “लठठ चालने वाले“ सैनिकों की कोई ज्यादा अहमियत नहीं है। रणभूमि में कई ऐसे काम है जो रोबोट और एआई मानव सैनिक से कहीं ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। देष की समस्या प्रषिक्षित सैनिकों और रसद की कमी नहीं है, अलबत्ता आंतरिक अषांत स्थिति से निपटना बडा सिरदर्द है। इससे कैसे निपटा जाए, संघ इस मामले में मोदी सरकार की मदद कर सकता है।
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