बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

नए कानून की तैयारी

सरकारी बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाकर विदेष भागने वाले “आर्थिक अपराधियों“ पर नकेल डालने के लिए अविलंब सख्त कानून की जरुरत है। विजय माल्या के बाद, नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेषनल बैंक समेत सात बैंकों को 12 हजार करोड रु से भी ज्यादा का चूना लगाने के “कारनामे“  ने देष में बैंकिंग व्यवस्था की चूलें  हिला दी है। अभी इस घोटाले की आग  ठंडी भी नहीं पडी थी कि रोटोमैक पैन बनाने वाली कंपनी का फर्जीवाडा सामने आ गया।  सरकारी बैंकों में   घोटाला-दर-घोटाले से चौकन्नी मोदी सरकार  मौजूदा बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में “ आर्थिक अपराधी बिल“ लाने की तैयारी में है। आर्थिक अपराधियों की परिसंपत्तियां जब्त करके कर्जा  वसूली के लिए नया कानून का मसौदा तैयार है।  विजय माल्या  9600 करोड रु का कर्जां दबाने के बाद विदेष में ऐष कर रहे हैं,  सरकार और प्रॉसिक्यूषन एजेंसियां  हाथ मलती रह गई है। कानून में व्याप्त खामियों का फायदा उठाते हुए “आर्थिक अपराधी“ विदेष भाग जाते हैं। फरवरी, 2017 में प्रस्तावित कानून  को विधि मंत्रालय ने अपनी स्वीकृति भी दे दी थी । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में नया कानून बनाने की घोशणा की थी। वित्त मंत्रालय ने प्रस्तावित कानून का मसौदा तैयार करके पिछले साल ही विधि मंत्रालय को भेज दिया था। लालफीताषाही वाली व्यवस्था में हर काम में विलंब होना निष्चित है। प्रस्तावित कानून 100 करोड रु से ज्यादा का “फ्राड“ करने वालों पर ही लागू होगा और यह  विजय माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी जैसे देष छोडने वाले “आर्थिक अपराधियों “ के मामलों को सामने रखकर तैयार किया गया है।  भगोडा आर्थिक अपराधी, बिल (फ्यूजिटिव इकॉनानिक आफेंडर्स बिल) के तहत आर्थिक अपराध करके गिरफ्तारी से बचने के लिए विदेष भाग गए और कानून और सजा से बचने के लिए स्वदेषी नहीं लौटने वाले को “भगोडा अपराधी” माना गया है। बहरहाल, प्रस्तावित कानून से आर्थिक अपराधियों को देष छोडने और उनकी परिसंपत्तियां कुर्क  करके बैकों का कर्जा  वसूलने में आसानी तो होगी मगर अभी भी कुछ खामियां हैं। अपराधी का षातिर दिमाग कानून को तोडना-मरोडना बखूबी जानता है। आर्थिक अपराधी विदेषों में परिसंपत्तियां खडी करके नए कानून से बच सकते हैं। जिस तरह विदेषों में जमा विषाल काले धन को स्वदेष लाना आसानी से सरकार के वष में नहीं है, उसी तरह आर्थिक अपराधियों की विदेषी परिसंपत्तियों  का पता लगाना और जब्त करना बेहद कठिन है। बेंकों में लगातार हो रहे घोटाले और बढते बैड लोंस से चिंतित कॉर्पोरेट जगत ने सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत की है। इस बात में दो राय नहीं है कि सरकारी बैंक राजनीतिक दवाब में काम करते हैं और सियासी दखलादांजी के कारण ही सरकारी बैंकों में भ्रश्टाचार बढा है। सरकारी बैंकों में टॉप लेवल की नियुक्तियां में व्याप्त भाई-भतीजावाद ने इनकी कार्यषैली को खासा प्रभावित किया है। तथापि, सच्चाई यह भी है कि 1969 में बैंकों के राश्ट्रीयकरण के बाद इंक्लुसिव बैंकिग का तेजी से विस्तार हुआ है। राश्ट्रीयकरण से पहले जहां देष में 8000 से भी कम बैंक षाखाएं थीं, वहां अब 80,000 से ज्यादा षाखाएं हैं और बैंकों का जाल अब दूर-सदूर  इलाकों तक फैला है। कृशि और किसानों को कर्जे देने में भी सरकारी बैंक कहीं आगे हैं। देष में सीमांत और लघु उधोगों को सस्ते और आसान किस्तों में कर्ज  उपलब्ध करवाकर सरकारी बैंकों की औधोगिक उत्पादन बढाने में अहम भूमिका रही है। लंबी अवधि के कर्ज  भी सरकारी बैंक ही देते हैं। कुल मिलाकर सरकारी बैंको ने राश्ट्रीय जरुरतों को पूरा किया है। समस्या बैकों के राश्ट्रीयकरण अथवा निजीकरण की नहीं है। सरकारौ बैंको में निगरानी, सतर्कता और इंस्पेक्षन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरुरत है।  सजा के डर से आज तक अपराध कम नहीं हुए है।