मुस्लिम महिलाओं 1400 साल पुरानी सामंती गुलामी से बाहर निकालने के लिए प्रस्तावित तीन तलाक पर जमकर सियासत की जा रही है। पीडित महिलाओं की चिंता हो न हो मगर मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जरुर है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए जब कभी भी कानून बनाने की बात आती है, मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी और निहित स्वार्थी सियासी दल खूब राजनीति कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने जिस दिन तीन तलाक पर कानून बनाने की मंजूरी दी, उसी दिन से ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका मुखर विरोध कर रहा है। इस साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को संवैधानिक करार दिया था। वीरवार को तीन तलाक से संबंधित बिल को लोकसभा में पेश किया गया और पारित भी हो गया । इस पर भी सदन में खासा हंगामा हुआ। सरकार ने बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजने की विपक्ष की मांग खारिज कर दी। बिल को पेश करते हुए केन्द्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने एक रोचक किस्सा सुनाते हुए कहा कि आज सुबह ही मैने अखबार में यह समाचार पढा कि उत्तर प्रदेश के रामपुर में एक महिला को इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि वह सुबह देर से उठी थी। इससे पता चलता है कि देश में मुस्लिम महिलाओं को तलाक के नाम पर कितना प्रताडित किया जा रहा है। इस साल अब तक 300 तलाक हो चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 100 तलाक। इससे साफ जाहिर होता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी परिस्थितियां नहीं बदली है। तलाक-ए-बिद्दत में समझौते तक की गुजाइंश नहीं है। बस शौहर ने तीन बार तलाक कह दिया और पत्नी को दर-दर की ठोकरे खाने के लिए छोड दिया। तीन तलाक को लेकर भारत में ऐसे-ऐसे मामले सामने आए हैं जिनसे मानवीयता भी शर्मसार हो जाती है। किसी ने व्हाट्सप्प पर एसएमएस भेजकर तो किसी ने मेल भेज कर तलाक-तलाक कह दिया और पत्नी को छोड दिया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम नेता भले ही सफाई देते रहे हैं कि इस तरह का तलाक अवैध है मगर बोर्ड ने इस तरह के मामलों का कभी त्वरित संज्ञान तक नहीं लिया। भारत के पडोसी इस्लामिक देश पाकिस्तान और बांग्ला देश में भी तीन तलाक को बहुत पहले प्रतिबंधित किया जा चुका है। 1961 में पाकिस्तान में पारित कानून के अनुसार पत्नी को तलाक देने के लिए शौहर को लिखित में देना होता है और अगर वह ऐसा नहीं करता है तो उसे एक साल की कैद और पांच हजार तक जुर्माना हो सकता है। यही कानून बांग्लादेश में भी लागू है। इस्लामिक दे मले शिया, इंडोनेशिया, मोरक्को और मिस्त्र समेत 22 मुल्कों में भी तीन तलाक की प्रथा को प्रतिबंधित अथवा नियंत्रित किया जा चुका है जिससे महिलाओं को पीडित न होना पडा। मगर भारत में आजादी के सात दशक तक भी तीन तलाक की कुप्रथा को नियंत्रित नहीं किया जा सका । इसकी सबसे बडी वजह है कि समकालीन सरकारें अपने सियासी फायदे के लिए ताकतवर कट्टरपंथियों को नाराज नही करना चाहती थी। और आज भी राजनीतिक दल निहित स्वार्थी सियासी हितों की खातिर तीन तलाक के बिल में खामियां गिना रहे हैं। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्यीन औवेसी तो यहां तक कह रहे हैं कि संसद को तो तीन तलाक पर कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल अगस्त में अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि तीन तलाक की कुप्रथा संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आती ही नहीं है और यह इस्लाम का अंतरंग हिस्सा नहीं है। संसद में पेश बिल के अनुसार तीन तलाक देने वाले को तीन साल तक की कैद हो सकती है। तीन तलाक बिल पर षिक्षित मुस्लिम महिलाएं सरकार के साथ है।
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