नेपाल की अवाम ने इस बार संसद (प्रतिनिधि सभा) और प्रांतीय सभाओं के चुनाव में वामपंथियों को दिल खोलकर जनादेश दिया है। 2008 में नेपाल के गणतंत्र बनने के बाद पहली बार वामपंथियों को इतना प्रचंड जनादेश मिला है और नेपाली कांग्रेस की इतनी दुर्गति हुई है। 265 वाली सीटों वाली प्रतिनिधि सभा में 165 सीटों के लिए हुए प्रत्यक्ष चुनाव ( फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट) में नेकपा-एमाले (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) को 76 और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) को 38 सीटें मिली है। नेकपा (एमाले) ने 103 और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) ने 60 सीटें लडीं थी। दोनों ने मिलकर चुनाव लडा था। अब तक वामपंथी 114 सीटें जीत चुके हैं और 8 पर उनकी बढत है। नेपाली कांग्रेस मात्र 21 सीटें ही जीत पाईं है जबकि पार्टी ने 151 उम्मीदवार चुनाव में उतारे थे। आठ प्रदेशों के चुनाव में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के फार्मूले के अनुसार वामपंथियों को कुछ और सीटें मिल सकती हैं। सात मेंसे छह प्रदेशों में वामपंथियों की सरकार बननी तय है। हिंदुवादी एवं राजतंत्र समर्थक पार्टियों को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को मात्र एक सीट मिली है और राजतंत्र एव हिंदू राष्ट्र के प्रबल समर्थक कमल थापा चुनाव ही हार गए हैं। गणतंत्र बनने के बाद आज तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। पहली बार नेपाल में किसी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला है। इससे नेपाल में पहली बार स्थिर सरकार बनने की उम्मीद है। नेकपा (एमाले) नेता के पी ओले के नेतृत्व में अगली सरकार का पदस्थ होना तय है। भारत के लिए नेपाल में वामपंथी सरकार का सत्ता में आना शुभ संकेत नहीं है। नई दिल्ली में दक्षिणपंथी भगवा पार्टी की सरकार है और हालिया घटनाओं ने वामपंथियों को मोदी सरकार से काफी दूर कर दिया है। ताजा नतीजों से मोदी सरकार की नेपाल के प्रति खोखली नीति की कलई भी खुल गई है। नेपाल एक संप्रभु देश है और उसके आंतरिक मामले में बाहरी दखल वहां की जनता को जरा भी गवारा नहीं है। वामपंथियों का आरोप है कि भारत की दक्षिणपंथी सरकार ने नेपाल के आंतरिक मामलों में खासा दखल दिया और मधेस का मुद्दा भी इसी मकसद से उछाला गया था। सितंबर 2015 में भारत के विदेश सचिव जयशंकर ने नेपाल जाकर राजनीतिक दलों से मधेस समस्या का हवाला देकर संविधान को स्थगित करने के लिए दबाव डाला था। नई दिल्ली ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल “प्रचंड“ से नेपाल के संविधान से “धर्मनिरपेक्ष“ को हटाने के लिए भी कहा था। भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी ने एक इंटरव्यू में माना था कि विदेश ंमत्री के साथ उन्होंने प्रचंड से ऐसा करने को कहा था। चुनाव से पहले अक्टूबर में जब नेकपा-एमाले (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) ने मोर्चा बनाया था, तब भारत समर्थक ताकतों ने इसे तोडने की भरपूर कोशिश की थी। वामपंथियों ने नई दिल्ली पर इस मोर्चे को तोडने का आरोप भी लगाया था। मधेसियों द्वारा नेपाल की नाकेबंदी से भी वहां की जनता भारत से क्षुब्ध है और इसी नाकेबंदी की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी ओले को चीन की शरण में जाना पडा था। नाकेबंदी से नेपाल को दवाओं समेत जरुरी वस्तुओं की कमी से जूझना पडा था। भारत से हर रोज लगभग 5000 ट्रक सामान लेकर नेपाल पहुंचते हैं। इन सब घ्टनाओं ने नेपाल के चुनाव पर खासा असर डाला है और भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस की लुटिया डूबोई है। नेपाल भारत के अलावा दुनिया का एकमात्र हिंन्दु राष्ट्र है और अब तक भारत का आल वैथर मित्र रहा है। एक छोर पर ड्रेगन, तो दूसरे पर पाकिस्तान पहले ही भारत की अखंडता के लिए बहुत बडी चुनौती है। अब अगर एकमात्र हिन्दु राष्ट्र नेपाल भी भारत से छिटक कर चीन के पाले में चला जाता है, नई दिल्ली में भगवा पार्टी की सरकार के खिलाफ एक और फ्रंट खुल जाएगा।
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