नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण-एनजीटी) द्वारा अमरनाथ गुफा में मंत्रोच्चारण और जयकारों पर प्रतिबंध लगाए जाने से भक्तों का क्षुब्ध होना स्वभाविक है। मंत्रोच्चारण, पूजा अर्चना और जयकारों के बगैर कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। और अगर अमरनाथ गुफा में मंत्रोच्चारण और पूजा अर्चना ही न हो, तो इस पवित्र यात्रा के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। एनजीटी ने बुधवार को पोलुशन रोकने के लिए एक निश्चित स्थान से आगे पूजा-अर्चना करने पर भी रोक लगा दी है। अमरनाथ गुफा को “साइलेंस जोन“ घोषित किया गया है। इसका मतलब है कि गुफा में न तो मंत्रोच्चारण किए जा सकते हैं और न ही जयकार। एनजीटी ने यह कदम अमरनाथ गुफा को हिमस्खलन से बचाने और इसके मौलिक स्वरुप को कायम रखने के लिए उठाया है। ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ श्रद्धालुओं के लिए समुचित प्रबंध करने के भी निर्देश दिए हैं ताकि उन्हें दर्शन से वंचित न होना पडे। एनजीटी का गठन ही पर्यावरण संरक्षण के मकसद से किया गया है और यह अपना काम बखूबी कर रहा है। प्रकृति की सार्वभौमिक विधि में मानव का दखल अवांछित माना जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अमरनाथ गुफा में श्रद्धालुओं की उतरोतर बढती संख्या से शिवलिंग का आकार घटता जा रहा है। श्रद्धालुओं के शोर-शराबे, लाउड स्पीकर की आवाज, घोडे-खच्चर से गुफा के आस-पास खासा पोलुशन फैल रहा है। हिम विज्ञानियों का भी यही कहना है कि पहाडों में शोर-शराबे अथवा ध्वनि प्रदूषण से हिमस्खलन का खतरा बढ जाता है। इससे शिवलिंग के सतत निर्माण पर प्रतिकूल असर पड रहा है और यह विलुप्त होने की कगार पर है। इससे पहले एनजीटी ने हिमाचल प्रदेश में रोहतांग दर्रे को बचाने के लिए कडे कदम उठाए थे। एनजीटी ने रोहतांग दर्रे पर कमर्शियल गतिविधियों और पेट्रोल-डीजल के वाहनों के आवागमन पर रोक लगा दी थी। इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं। एनजीटी प्रतिबंध के एक साल बाद रोहतांग पास न केवल अपेक्षाकृत साफ-सुथरा है, अलबत्ता और अधिक खूबसूरत और खुला-खुला नजर आ रहा है। बहरहाल, एनजीटी की इस कार्रवाई पर राजनीति की जा रही है। भाजपा समेत हिंदू संगठनों ने एनजीटी के इस फैसले को “ हिंदू“ विरोधी बताया है। भक्तों का कहना है कि मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का अहम हिस्सा है और इस पर प्रतिबंध आस्था पर पहरा लगाने जैसा है। इसी मुखर विरोध के कारण वीरवार को एनजीटी को अपने ताजा फैसले को लेकर स्पष्टीकरण भी देना पडा। एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि न तो अमरनाथ गुफा को “साइलेंस जोन“ घोषित किया गया है और न ही गुफा में मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना पर रोक लगाई गई है। अमरनाथ हिंदुओं के लिए बेहद पावन यात्रा है। भोले बाबा के भक्तों की असीम आस्था का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्र्द्धालु लगभग पांच दिन तक 48 किलोमीटर पैदल चल कर गुफा पहुंचते हैं। अमरनाथ गुफा के लिए कश्मीर के सोनमर्ग से कम दूरी (16 किमी) वाला रास्ता भी है मगर खडी चढाई होने के कारण यह बहुत कठिन माना जाता है। 12,756 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा सारी साल बर्फ से ढकी रहने के कारण बंद रहती है। गर्मियों में कुछ समय के लिए यह खुलती है और इसी दौरान गुफा के लिए यात्रा का आयोजन किया जाता है। बहरहाल, अमरनाथ गुफा ”साइलेंस जोन” घोषित किए जाने वाला एकमात्र धार्मिक स्थल नहीं है। दक्षिण भारत के तिरुपति मंदिर का दर्शन स्थल और अक्षरधाम में भी “साइलेंट जोन“ हैं। यह दोनों मंदिर श्रद्धालुओं के लिए सारी साल खुले रहते हैं। भक्तों की इस बात में दम है भारत में मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना अनादि काल से प्रचलित है। पर्यावरण को षुद्ध करने के लिए भारत में हवन-यज्ञ करने की परंपरा है। यह भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है। इसे हिमस्खलन अथवा ध्वनि प्रदूषण से नहीं जोडा जाना चाहिए।
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