गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

ब्रिटेन, फ्रांस से आगे भारत

आर्थिक तरक्की में भारत एक और बडी छलांग लगाने जा रहा है। सेंटर फॉर इकानॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च (सीबीईआर)  की  ग्लोबल इकानॉमी पर ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे-मोटे लटके-झटकों के बावजूद भारत अगले साल (2018 मे)  ब्रिटेन और फ्रांस को पछाड कर  दुनिया  की पांचवी बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी और जीएसटी ने भारतीय  अर्थव्यवस्था की तेज रफ्ताार पर ब्रेक लगा दी थी मगर 2017 में इसने फिर  रफ्तार पकड ली है। इस रिपोर्ट के बाद मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में तेजी व्याप्त रही और सेंसेक्स पहली बार 34,000 के स्तर को पार कर गया। बुधवार को हालांकि सेंसेक्स और निफ्ट में गिरावट दर्ज हुई मगर  थोडी-बहुत घट-बढत के बावजूद भारतीय इक्विटी बाजार 2017 में पूरे साल गुलजार बना रहा। केन्द्र में स्थिर सरकार और प्रधानमंत्री के अच्छे कामों के कारण यह सब हुआ। इस साल सेंसक्स और निफ्टी में कुल मिलाकर 21 से 24 फीसदी की बढत हुई है। विदेशी  निवेशकों ने अब तक लगभग 7 अरब  डॉलर से ज्यादा के शेयर खरीदे हैं। 2016 में विदेशी  निवेशकों ने 200 करोड रु से भी कम के  शेयर्स  खरीदे थे। इससे साफ जाहिर है कि 2017 में विदेशी  निवेशकों का भारतीय बाजार में भरोसा बढा है। अक्टूबर में जारी वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की रिपोर्ट में भी मोदी सरकार के कामों की तारीफ की गई थी और भारत ने रैंकिंग में तेज छलांग लगाई थी। फोरम की रिपोर्ट  में भारत 40वंे स्थान पर था जबकि तीन साल पहले वह 71वे नंबर पर था। फोरम की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत के आधारभूत ढांचे में अपेक्षित सुधार हुआ है। शिक्षा एवं प्रशिक्षण और  बेहतर हुए हैं। स्कूलों में इंटरनेट का प्रयोग बढा है और तकनीकी तैयारियां तेज हुईं हैं। यहीं नहीं सार्वजनिक खर्चों में निपुणता बढी है। इन सब उपायों के कारण ही भारत की रैकिंग में सुधार हुआ है। मगर इस फोरम ने तब यह आशंका भी जताई थी कि  भ्रष्टाचार   की मजबूत जडें भारत में निवेश  के माहौल को बिगाड सकता है। इसके अलावा भारत में अभी भी वित्तीय विकल्पों की कमी है और अस्थिर टैक्स व्यवस्था मुक्त निवेश  को रोक रही है।  हाल ही की कुछ घटनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है। और इनमें कच्चे तेल की लगातार बढती कीमतें चिंता का विषय है। अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार को पहली बार तेल की ऊंची कीमतो से वास्ता पड सकता है। तेल की कीमतें बढने से महंगाई बढ सकती है। ताजा आंकडें भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। जून में रिटेल महंगाई 1.46 फीसदी के निचले स्तर पर थी मगर नवंबर आते-आते यह आठ माह के उच्चतम स्तर 4.88 फीसदी तक पहुंच गई थी। ऊंची तेल कीमतों के अलावा, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों  को लागू करने से भी महंगाई बढ सकती है। अगले साल रिटेल मुद्रा स्फीति के 4-4.5 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है। इससे अगले साल ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं क्षीण हो सकती हैं। अगले साल भारतीय बाजार 2017 की तरह गुलजार रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अमेरिका की कडी मौद्रिक नीति का सीधा असर विदेशी  निवेश  पर पडता है। अगले साल अमेरिका अपनी मौद्रिक नीति को और सख्त कर सकता है। बहरहाल, भारत के लिए सुखद स्थिति यह है कि 2017 में भी भारत की आर्थिक ग्रोथ एव़ं लंबी अवधि की वृद्धि दर चीन से बेहतर है। भारत पिछले चार सालों में  चीन के मुकाबले तेजी से आगे बढा है। वैश्विक  प्रतिस्पर्धा रैंकिंग में भारत ने चार साल में 20 अंक हासिल किए हैं। चीन जहां पहले था, वहीं है। और अगर यह गति रही तो भारत 2030 से पहले ही जापान और जर्मनी को पछाड कर  दुनिया  की तीसरी बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।