कांग्रेस के “युवराज“ राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना निश्चित है। महज औपचारिक घोषणा बाकी है। मंगलवार को पार्टी ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए राहुल एकमात्र उम्मीदवार हैं। 11 दिसंबर को नाम वापस लेने की आखिरी तारीख समाप्त होते ही यह यह घोषणा भी कर दी जाएगी। उन्हें सोनिया गांधी का उतराधिकारी बनाने के लिए कांग्रेसियों में होड लगी हुई है। राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए कांग्रेस के छोटे से बडे है हर नेता ने दनादन उनके नामांकन का अनुमोदन किया। कांग्रेस की यही संस्कृति रही है। दिग्गज कवि मुक्तिबोध की एक पंक्ति है,“ गलत समय पर झगडा करते हैं और गलत समय पर झुक जाते हैं, इसलिए सारी गडबडियां होती है“। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष चुनने के लिए कांग्रेस ने जो समय चुना है, उस पर राजनीतिक पंडितों को आश्चर्य हो रहा हैे। कांग्रेस किसे पार्टी अध्यक्ष चुनती है और कब, यह उसका अंदरुनी मामला है मगर देश की ग्रांड ओल्ड पार्टी से करोडों लोगों की अपेक्षाएं जुडी है, इसलिए लोकतांत्रिक सरोकारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता और पार्टी के हर काम की बारीकी से मुआयना जरुरी है। राहुल गांधी की ताजपोशी के मात्र एक सप्ताह बाद हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणाम आने हैं। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है और अगर वह फिर से सत्ता में नहीं आती है तो पार्टी के “हाथ“ से एक और राज्य भाजपा के पाले में चला जाएगा। गुजरात में राहुल गांधी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा रखा है। हिमाचल प्रदेश की तुलना में राहुल का सारा जोर गुजरात पर रहा है। गुजरात में अगर कांग्रेस को बहुमत मिलता है, तो राहुल गांधी के लिए यह बहुत बडा प्लेटफार्म बन जाएगा। जीत का पूरा श्रेय राहुल गांधी को ही जाएगा। इस स्थिति में उनकी ताजपोशी और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती। और अगर पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं भी मिलता है, तो भी राहुल गांधी की ताजपोशी और अधिक तार्किक हो सकती थी। पार्टी कह सकती थी कि राहुल गांधी की ताजपोशी से पार्टी अब् नई रणनीति के साथ मैदान में उतरेगी। भाजपा इस जमीनी सच्चाई को अच्छी तरह जानती है कि देश में कांग्रेस ही उसका एकमात्र विकल्प है और यही पार्टी उसे सता से हटा सकती है। राहुल गांधी प्रधानंमत्री नरेन्द्र मोदी से अपेक्षाकृत युवा हैं और लंबे समय तक पार्टी को लीड कर सकते हैं। इसीलिए भजपा और उसे जुडे भगवा संगठनों का पूरा जोर राहुल गांधी को कमजोर करने पर रहता है। गुजरात में राहुल गांधी ने धुंआधार र प्रचार करके भाजपा के नाको दम कर रखा है। इसके सुखद नतीजे सामने भी आ रहे हैं। एक न्यूज चैनल के ओपिनियन पोल से पता चलता है कि गुजरात में मौसम और मिजाज दोनों ही बदल रहे हैं। नवंबर के आखिरी सप्ताह कें कराए गए इस ओपिनियन पोल के अनुसार गुजरात में कांटे की टक्कर है और इस समय दोनों पार्टियों को बराबर के वोट मिल रहे हैं। भाजपा के ग्राफ में चार प्वांइट की गिरावट आई है और कांग्रेस को दो-प्वांइट की बढत मिली है। यह पोल चुनाव प्रचार शुरु होने के समय किया गया था। इसके बाद प्रचार और तेज हो गया है और मतदान तक स्थिति बदल सकती है। अगस्त में इसी तरह के ओपियन पोल में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने की संभावना जताई गई थी और कांग्रेस का सुपडा साफ होता बताया गया था। चार माह में अगर चुनावी बयार कांग्रेस के पक्ष में बह रही है, तो इसका सारा श्रेय राहुल गांधी को जाता है। बहरहाल, राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद कडी चुनौतियों का सामना करना पड सकता है/ उनमें वह स्पार्क नहीं है जो उनकी दादी इंदिरा गांधी में था। अगले साल (2018) कर्नाटक, मध्य प्रदेश , राजस्थान, छत्तीसगढ समेत आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने है। यह राहुल गांधी की सबसे बडी अग्नि परीक्षा होगी।
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