गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

कब सुलझेगा अयोध्या विवाद?

 अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाए 25 साल गुजर गए हैं और मंदिर निर्माण का मामला सात दशकों से लटका हुआ है मगर  इतन लंबा समय बीत जाने के बाद भी विवाद हल होता नजर नहीं आ रहा है। आए दिन कोई-न-कोई बखेडा खडा हो जाता है।  अब सारी उम्मीदें देश  की  शीर्ष  अदालत पर टिकी हुईं है। 6 दिसंबर, 1992 को भगवा संगठनों के कार सेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी  और सुश्री उमा भारती इन कार सेवकों की अगुवाई कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए अडवानी, जोशी  और उमा भारती पर आपराधिक साजिश  के तहत मुकदमा चलाने के आदेश  दिए थे। मंगलवार  को सुप्रीम कोर्ट  में अयोध्या मामले की सुनवाई हुई और रोजाना सुनवाई के लिए आठ फरवरी की तारीख मुकर्रर की है। विवाद इस बात पर है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर पहले मंदिर था या नहीं और मुगल  शासक बाबर ने मंदिर को ध्वस्त कर यहां बाबरी मस्जिद बनाई थी़? राम भक्तों की दलील है कि 1528 तक  अयोध्या में राम मंदिर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश  पर पुरातत्व विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की  पुष्टि  की है  कि दसवीं शताब्दी तक अय्योध्या की विवादित जगह पर राम मंदिर था और 13वीं  सदी  तक वहां पूजा-र्अ्चना हुआ करती थी। मुस्लिम संगठनों ने हालांकि इस रिपोर्ट  को न्यायालय में चुनौती दी मगर हाई कोर्ट  ने रिपोर्ट को सही माना। इतिहास भी  इस बात को प्रमाणित करता है कि 1525 में बाबर द्वारा भारत पर हमला करने के  तीन साल बाद उसके सेनापति मीर बागी ने अयोध्या में राम मंदिर को ध्वस्त करके यहां मस्जिद बनाई थी। 1949 में बाबरी मस्जिद की मुख्य गुम्बज में राम की मूर्ति को स्थापित किया गया। एक साल बाद राम भक्तों ने  बाबरी मस्जिद में स्थापित मूर्ति की पूजा-अर्चना के लिए  फैजाबाद की अदालत में याचिका दायर की। बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद 1993 में उतर प्रदेश  सरकार ने विवादित स्थल के आस-पास 67 एकड जमीन का अधिग्रहण करके न्यायालय में याचिका डालकर पूछा कि क्या बाबरी मस्जिद से पहले वहां मंदिर था? राम मंदिर में पुजारी तैनात करने और नियमित पूजा-अर्चना जारी रखने के लिए  1993 में ही राज्य सरकार ने अयोध्या एक्ट पारित किया। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित बाबरी मस्जिद साइट को निर्मोही अखाडा, राम लल्ला और उत्तर प्रदेश  सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच  बराबर तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया।  वक्फ बोर्ड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी और अदालत ने इस फैसले पर स्थगन आदेश  जारी कर यथा स्थिति के आदेश  दे रखे है।ं फिलहाल मामला पहले की तरह लटका हुआ है। इन सारी घटनाओं से साफ है कि मामला बेहद जटिल है और कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है मगर सभी अदालत का फैसला मानने के लिए बाध्य हैं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है मगर भाजपा और भगवा संगठन अभी से जीत का जश्न   मनाने लग पडे हैं। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता डाक्टर सुब्रामनयम स्वामी तो बार-बार का रहे हैं कि फैसला उनके पक्ष में ही आना है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला  आने में समय लग सकता है मगर यह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले   आता  है  तो  भाजपा को इसका तगडा चुनावी फायदा हो सकता है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने  शायद इसी आशंका से ग्रस्त होकर कोर्ट से सुनवाई 2019 चुनाव तक स्थगित करने की गुजारिश  की थी। यह बात दीगर है कि उनका यह दांव कांग्रेस के लिए उल्टा पड गया है। भाजपा इसे खूब भुना रही है। इस प्रकरण से अयोध्या विवाद के राजनीतिक रंगत का अनुमान  लग जाता है।