गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

इक्विटी मार्केट और भाजपा

गुजरात और हिमाचल प्रदेश  में भाजपा की जीत से देश  का इक्विटी मार्केट गुलजार है। सोमवार को मार्केट के खुलते ही पहले दो घंटों में  सेंसेक्स में जबरदस्त 1200 अंकों की फिसलन दर्ज  हुई। यह गिरावट उस समय आई जब  शुरुआती  मतगणना में कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई थी। मगर जैसे ही गुजरात में भाजपा की जीत निश्चित  हो  गई, सेंसेक्स स्मार्ट रिक्वरी करते हुए सेशन के अंत में अंकों की 135 अंकों की बढत से बंद हुआ। मंगलवार को पूरे दिन इक्विटी मार्केट में तेजी बनी रही और अंत में 235 अंकों की बढत से बंद हुआ। बुधवार को बाजार में तेजी बनी रही हालांकि अंत में गिरावट से बंद हुआ मगर मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में वृद्धि जारी रही। बैकों के साढे आठ लाख  करोड के भारी-भरकम बेड लोंस  आंकडों की रिपोर्ट ने बाजार की तेजी को ब्रेक लगा  दी  है। इस जुलाई में  राष्ट्रीय  सूचकांक निफ्टी पहली बार दस हजारी बना और तब से दस हजार के ऊपर बरकरार है। बुधवार को सेंसेक्स 34,000 के स्तर के निकट आ पहुंचा था। सेंसेक्स और निफ्टी की चाल-ढाल से यही निष्कर्ष   निकलता है कि देश  की इक्विटी मार्केट को कांग्रेस की तुलना में भाजपा से ज्यादा अपेक्षाएं हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से बाजार में आया अप्रत्याशित उछाल इस बात का प्रमाण है। पिछले तीन साल के दौरान सेंसेक्स में 12,000 अंकों से ज्यादा का उछाल आया है। मई 2014 में सेंसेक्स 22,000 के आसपास था। दिसंबर, 2017 में सेंसेक्स 34,000 के आसपास है। इसकी सबसे बडी वजह राजनीतिक स्थिरता और अर्थव्यवस्था के मजबूत फंडामेंटल्स हैं। नोटबंदी से पहले मोदी सरकार के  शासन में ग्रोथ रेट 7 फीसदी से ज्यादा दर्ज हो रही थी। नोटबंदी और जीएसटी ने इसे अल्पावधि के लिए पटरी से उतारा जरुर  है मगर अब ग्रोथ ने फिर रफ्तार पकड ली है और अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों का भी आकलन है कि अगले वित्तीय साल से भारतीय अर्थव्यवस्था फिर तेज रफ्तार पकड लेगी। जीएसटी के लागू होने से ग्रोथ को और गति मिलेगी, आलोचक भले ही इस बात को न माने। मुद्रा-स्फीति मेंबडी गिरावट सबसे बडी राहत है। जून, 2014 में रिटेल मुद्रा-स्फीति 8.33 फीसदी थी। अप्रैल, 2017 में यह घटकर 2.33 फीसदी रह गई थी। कर्जा  भी सस्ता हुआ है, पिछले तीन साल में ब्याज दरों में दो फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। यह बात दीगर है कि बैंकों ने ब्याज दरों में कटौती को पूरी तरह से कस्टमर्स तक नहीं पहुंचाया है। 2017 में विदेशी  निवेश  में भी खासा इजाफा हुआ है। इस साल विदेषी निवेशकों ने 30 अरब डॉलर (दो लाख करोड रु से भी ज्यादा) की विदेशी  मुद्रा का भारत में निवेश  किया है और इस मेंसे 8 अरब डॉलर का इक्विटी मार्केट में लगाया गया है। यह रकम पिछले दो सालों में आए विदेषी निवेश  से कहीं ज्यादा है। इससे साफ है कि निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा बढा है। इस साल विदेशी  संस्थागत निवेशकों ने  शेयर बाजार में 55,000 करोड रु का निवेश  किया है। यह दो पिछले दो साल से लगभग दोगुना है। 2015 में  विदेषी संस्थागत निवेषकों ने भारतीय बाजार में 15,000 करोड रु और 2016 में 20,500 करोड रु का निवेष किया था। मगर यह अभी भी 2012 के  1.28 लाख करोड, 2013 के  1,13 और 2014 के   97,000 हजार करोड रु से काफी कम है। तथापि, सुखद स्थिति यह है कि  विदेशी  निवेशकों ने भारतीय ऋण बाजार में 2017 के दौरान अब तक 1.5 लाख करोड का निवेश  किया है। यही सिलसिला 2018 में जारी रहने की उम्मीद है। मोदी सरकार की राजनीतिक स्थिरता, एक के बाद दूसरी चुनावी सफलता और उदार आर्थिक नीतियिं के कारण बाजार अपेक्षाकृत गुलजार रहा है। यही क्रम अगले साल भी बदस्तूर जारी रह सकता है।