“तू चाय बेच“, यह आदमी तो बडा नीच है, राहुल गाधी खिलजी की औलाद“, “पप्पू“ जैसी उदंड और गंवारु भाषा का इस्तेमाल करके समकालीन सियासी नेताओं ने राजनीतिक असभ्याचार की इंतहा कर दी है। हमारे दुश्मन पडोसी मुल्क भी भारतीय नेताओं के निम्न स्तर के आचरण से हैरान है। टवीटर पर हमारा मखौल उडाया जा रहा है। जो देश अपनी समृद्ध संस्कृति और सभ्यता पर खूब इतराता है, वहां अगर सियासी नेताओं का आचरण ऐसा हो, तो लानत है ऐसी संस्कृति पर ? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर की उदंड भाषा ने तो राजनीतिक सभ्याचार की सारी मर्यादाएं ही लांघ ली हैं। वीरवार को दिल्ली में अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर के उदघाटन पर प्रधानमंत्री मोदी के राहुल गांधी पर कसे तंज से तिलमिलाए मणि शंकर अय्यर ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उस पर राहुल गांधी को भी टवीट करके फौरन स्पष्टीकरण जारी करना पडा। उनके स्टेट्स वाले दिग्गज नेता से इस तरह की उडंड शब्दों की उम्मीद नहीं की जा सकती। मणि शंकर अय्यर गैर-हिन्दी भाषी का बहाना बनाकर अब सफाई दे रहे हैं और उन्होंने माफी भी मांग ली है मगर उनकी इस उदंडता से कांग्रेस को कपिल सिब्बल के अयोध्या वाले बयान से भी ज्यादा नुकसान हो सकता है। देश के प्रधानमंत्री को “गाली“ देना पूरे देश को गाली देने जैसा है। मणि शंकर अय्यर को संभवतय इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री के लिए उदंड शब्दों का प्रयोग करके उन्होंने पार्टी का गुजरात में कितना नुकसान किया है। इससे पहले 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान भी अय्यर मोदी को “चाय बेचने वाला“ कह कर अपमानित कर चुके हैं। इससे भी कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पडा था। भाजपाई नेताओं ने फौरन इस प्रकरण को लपकते हुए काग्रेस पर ताबडतोड हमले शुरु कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान मणि शंकर अय्यर के इस बयान को खूब भुनाया। गुजरात में पहले चरण का चुनाव प्रचार आज सांय समाप्त हो गया है। पहले चरण के मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री के अपमान पर गुजरात में तीखी प्रतिक्रियाएं स्वभाविक है और इससे कांग्रेस को चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है। इससे पहले मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने अयोध्या मामले की सुनवाई को 2019 के लोकसभा चुनाव तक टालने की मांग करके कांग्रेस के लिए मुसीबत खडी कर दी थी। सिब्बल के इस बयान पर भाजपा को कांग्रेस को हिंदु विरोध बताने का हथियार मिल गया है। सिब्बल के इस स्टैंड से भडके साक्षी महाराज ने राहुल गांधी के खिलाफ “खिलजी की औलाद“ जैसी उदंड भाषा का प्रयोग कर डाला। पिछले सप्ताह गुजरात यात्रा के दौरान सोमनाथ मंदिर के विजिटर रजिस्ट्रर में राहुल गांधी को गैर-हिन्दू बताकर कांग्रेस के “सॉफ्ट हिंदुत्वः की हवा निकल गई थी। इस पर कांग्रेस और राहुल गांधी को सफाई देनी पडी कि वे तो जनेऊधारी हिंदू है। बहरहाल, गुजरात के चुनाव प्रचार में मूल मुद्दे गायब हो गए हैं और “ राम मदिर“, हिन्दुत्व, जात-पात और चरित्र हनन का सहारा लेकर मतदाताओं को भ्रमित किया जा रहा है। भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव “विकास“ पर लडा था और पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला था। 2014 का लोकसभा चुनाव भी भाजपा ने “ गुजरात के विकास मॉडल“ पर लडा था और इस पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला था। मगर इस बार गुजरात चुनाव प्रचार में विकास की बातें पीछे छूट गई हैं। समकालीन नेताओं के लिए हर हाल में चुनाव जीतना एकमात्र लक्ष्य रह गया है और इसके लिए अगर उन्हें लोकतांत्रिक मर्यादाएं तोडनी पडे, वे ऐसा करने में जरा भी हिचकते नहीं है। लोकतंत्र में निर्भीक , स्वतंत्र चुनाव और स्वस्थ मर्यादाएं ज्यादा मायने रख्ती हैं। मर्यादाएं तोडकर चुनाव जीतने से लोकत्त्र कमजोर होता है।
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